मेरा संक्षिप्त परिचय

विजय तिवारीकिसलयका संक्षिप्त परिचय

 

1. पूरा नाम: विजय तिवारी “किसलय”
2 जन्म तिथि : 5 फरवरी 1958
3. शिक्षा : एम. ए. (समाज शास्त्र ), भारतीय विद्या भवन मुंबई से पी. जी. डिप्लोमा इन जर्नलिज़्म, इले. होम्योपैथी स्नातक, कंप्यूटर की बेसिक शिक्षा.
4. संप्रति: म. प्र. पॉवर जनरेटिंग कंपनी लिमि. जबलपुर के वित्त एवं लेखा.
5. दशकों से आकाशवाणी एवं टी. वी. चेनलों पर लगातार प्रसारण. एवं काव्य गोष्ठियों का संचालन.
6. कहानी पाठ तथा समीक्षा गोष्ठियों का आयोजन करने वाली संस्था ‘कहानी मंच जबलपुर’ के संस्थापक सदस्य. साथ ही पाँच वर्ष तक लगातार पढ़ी गयीं कहानियों के 5 वार्षिक संकलनों के प्रकाशन का सहदायित्व निर्वहन.
7. मध्य प्रदेश लेखक संघ जबलपुर के संस्थापक सदस्य.
8. विभिन्न ख्यातिलब्ध संस्थाओं के पदाधिकारी एवं सक्रिय सदस्य.
9. जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार स्व. हीरा लाल गुप्त की स्मृति एवं पत्रकारिता सम्मान समारोह का सन 1997 से लगातार आयोजन.
10. स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय लगभग दो दर्जन पुस्तकों की समीक्षा.
11. विभिन्न एकल, अनियमित तथा नियमित पत्रिकाओं का संपादन.
12. साहित्यिक गोष्ठियों में सहभागिता एवं संचालन.
13. अंतरराष्ट्रीय अंतराजाल (इंटरनेट) के ब्लागरों में सम्मानजनक स्थिति.
14. डॉ. काशीनाथ सिंह, डॉ. श्रीराम परिहार, प्रो.ज्ञान रंजन, आचार्य भगवत दुबे सहित ख्यातिलब्ध साहित्यकारों का सानिध्य एवं मार्ग दर्शन प्राप्त.
15. हिन्दी काव्याधारा की दुर्लभ काव्यविधा “आद्याक्षरी” में लगातार लेखन.
16. काव्य संग्रह ” किसलय के काव्य सुमन ” का सन 2001 में प्रकाशन. गद्य-पद्य की 2 पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य.
17. हिन्दी व्याकरण पर सतत कार्य एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार – प्रसार हेतु संकल्पित.
18. स्वतन्त्र पत्रकारिता एवं साहित्य लेखन के चलते लगभग 35 वर्ष से प्रकाशन.
19. कविताओं, कहानियों, लघुकथाओं, आलेखों, समीक्षाओं का सतत् लेखन .
20. “हिन्दी साहित्य संगम” अंतरजालीय ब्लाग पर नियमित लेखन एवं ‘हिन्दी साहित्य संगम’ के बेनर तले साहित्यिक कार्यक्रम, कार्यशालाएँ, समीक्षा गोष्ठियों के साथ लगातार साहित्य समागमों का आयोजन.
21. धर्मार्थ इले. होम्योपैथी चिकित्सा का सीमित संचालन.
22. सामाजिक संस्थाओं एवं निजी तौर पर समाज सेवा.
23. विदेशी डाक टिकटों का संग्रह, नवीन टेक्नोलॉजी एवं वैश्विक घटनाओं की जानकारी में रुचि.
24. बाह्य आडंबर, साहित्यिक खेमेबाजी, सहित्य वर्ग विभाजन (जैसे छायावाद, प्रगतिशील, दलित साहित्य आदि) से परहेज. क्योंकि साहित्य साहित्य होता है.

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