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पत्रकारिता की स्वतन्त्रता पर कसता अवांछित शिकंजा

देश-काल-संस्कृति के अनुरूप पत्रकारिता के गुण, धर्म और कार्यशैली में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, इसलिए वर्तमान एवं पूर्ववर्ती पत्रकारिता की तुलनात्मक समीक्षा औचित्यहीन होvkt-2_jpgnगी। पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सामाजिक घटनाओं, अच्छाई-बुराई एवं दैनिक गतिविधियों का प्रकाशन कर समाज को सार्थक दिशा में आगे बढ़ाना है। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्पराओं तथा उनकी मूल भावनाओं से अवगत कराना पत्रकारिता का एक अंग है।  हमारे आसपास घटित घटनाओं, विशेष अवसरों, विभिन्न परिस्थितियों के साथ ही आपन्न विपत्तियों में सम्पादकीय आलेखों के माध्यम से सचेतक का अहम कार्य भी पत्रकारिता का माना जाता है।  वर्षा, ग्रीष्म और शरद की परवाह किए बिना विस्तृत जानकारी के साथ समाचारों का प्रस्तुतीकरण इनकी ईमानदारी और कर्त्तव्यनिष्ठा का ही परिणाम है जो हम रोज देखते और पढ़ते आ रहे हैं। अखबारों के माध्यम से उठाई गई आवाज पर हमारा समाज चिन्तन-मनन करता है, प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। विश्व के महानतम परिवर्तन इसके उदाहरण हैं।

वर्तमान पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं से हम-आप सभी परिचित हैं। यदि खाली डेस्क पर बैठकर समाचारों का लेखन होता तो उनमें न ही प्रामाणिकता होती और न ही जीवन्तता। दर्द, खुशी और वास्तविकता का एहसास भी नहीं होता। प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार की अभिव्यक्ति ही अपने अखबार के प्रति सामाजिक विश्वास पैदा कराती है।

  इन सबके बावजूद आज के पत्रकार को शासकीय-अशासकीय उच्चाधिकारियों, नेताओं और  दबंगों के दबाव में काम करने हेतु बाध्य किया जा रहा है, जो कि अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार पर शिकंजा कसने जैसा है। सामाजिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों की वास्तविक जानकारी के अभाव में खोखले समाचारों से अखबार नहीं चला करते। पत्रकारों का सहयोग न करना, वास्तविकता को प्रकाशित न होने देने के लिए दबाव बनाना, आयोजनों में प्रवेश की अनुमति न देना अथवा अड़ंगे लगाना तथा पत्रकारों से अभद्रता जैसी वारदातें आज आम हो चली हैं।  पत्रकारिता पर आघात और अपमान का यह खेल तथाकथित वर्ग में चलन का रूप ले रहा है। आज दबंगों के रोब से सहमे  पत्रकार स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। दूसरों के लिए आवाज उठाने वाले स्वयं के लिए आन्दोलन, अनशन, बहिष्कार अथवा अन्याय के विरुद्ध मोर्चा खोलने को बाध्य होने लगेंगे तो क्या स्थिति बनेगी ?

 हमारे संविधान ने प्रत्येक भारतीय को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की है। इस पर अंकुश लगाना अथवा दबाव डालना निश्चित रूप से हमारे  मौलिक अधिकारों का हनन ही है।  इन परिस्थितियों में अब जनतंत्र के सिपहसालारों को चिन्तन कर ऐसे प्रभावी कदम उठाने ही होंगे जिससे कोई भी पत्रकारिता की स्वतन्त्रता  पर अवांछित शिकंजा कसने की हिमाकत न करे अन्यथा इनकी मनमर्जी देश को अवनति के रसातल में पहुँचाकर छोड़ेगी। 

– विजय तिवारी ‘किसलय’

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