चंदनवा चैती गाता है
(Chandanawa Chaiti Gata Hai)
चंदनवा चैती गाता है
खुली हवा में।
काट चुका है फ़सल चना—
गेहूँ की भारी।
लाँक लढ़ी में ढोई है,
उसने माँड़ी।
घरवाली के साथ ओसाया
है समीर में।
दाने के ऊँचे पहाड़ को
खड़ा किया है।
अपनी मेहनत के जादू से
मोह लिया है।
दूर-दूर तक उसके श्रम का
अन्न गया है।
भूख-भूख से पीड़ित जन का
पेट भरा है।
चंदनवा चैती गाता है
खुली हवा में।
राजमहल में हारा राजा
सुस्त पड़ा है।
धीमी-धीमी श्वास-क्रिया
प्रश्वास-क्रिया है
अब राजा की चलाचली की
विश्वासी मंत्री हारे हैं,
डरे हुए हैं।
राज-दंड धरती की रज में
लोट रहा है।
इंक़लाब का सैलाबी स्वर
गूँज रहा है।
राजकीय बंधन टूटा है
जरामरण का।
चंदनवा चैती गाता है
खुली हवा में।
