आत्मजयी – कुँवर नारायण | हिन्दी कविता

ओ मस्तक विराट, अभी नहीं मुकुट और अलंकार। अभी नहीं तिलक और राज्यभार। तेजस्वी चिन्तित ललाट। दो मुझको सदियों तपस्याओं में जी सकने की क्षमता।

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बैठा हूँ इस केन किनारे – केदारनाथ अग्रवाल | हिन्दी कविता

दोनों हाथों में रेती है,...नीचे, अगल-बग़ल रेती है,...होड़ राज्य-श्री से लेती है.......मोद मुझे रेती देती है

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हिन्‍दी साहित्‍य का इतिहास | प्रस्‍तावना | आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल

हिन्दी कवियों का एक वृत्त-संग्रह ठाकुर शिवसिंह सेंगर ने सन् 1883 ईसवी में प्रस्तुत किया था। उसके पीछे सन् 1889 में डॉक्टर (अब सर) ग्रियर्सन ने ‘Modern Vernacular Literature Of Northen Hindustan’ के नाम से एक वैसा ही बड़ा कवि-वृत्त-संग्रह निकाला।

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