गेहूँ – केदारनाथ अग्रवाल | हिन्दी कविता

 

गेहूँ
(Gehun)

 

आर-पार चौड़े खेतों में
चारों ओर दिशाएँ घेरे
लाखों की अगणित संख्या में
ऊँचा गेंहू डटा खड़ा है ।
ताकत में मुट्ठी बांधे है;
नोकीले भाले ताने है;
हिम्मत वाली लाल फौज-सा
मर मिटने को झूम रहा है ।

फागुन की मस्ती के झोंके
दौड़े आते हैं उड़-उड़ के
अंगों में, बाहों में कस के
उसकी मति को मंद बनाने;
और धूप की गरम गोद में
वैभव की चितवन के नीचे
मीठी मीठी नींद सुला के
उसका दृढ़ अस्तित्व मिटाने !

लेकिन गेहूं नहीं हारता
नहीं प्रेम से विचलित होता;
हँसिया से आहत होता है
तन की, मन की बलि देता है;
पौरुष का परिचय देता है;
सतत घोर संकट सहता है;
अंतिम बलिदानों से अपने
सबल किसानों को करता है।

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