तड़पती केन – केदारनाथ अग्रवाल | हिन्दी कविता

 

तड़पती केन
(Tadapti ken)

रवि के खरतर शर से मारी,
क्षीण हुई तन-मन से हारी,
केन हमारी तड़प रही है
गरम रेत पर, जैसे बिजली
बीच अधर में घन से छूटी
तड़प रही है ।

Leave a Reply