अगम बहै दरियाव की पुस्‍तकीय समीक्षा | शिवमूर्ति | हिन्‍दी उपन्‍यास

अगम बहै दरियाव
पुस्तक समीक्षा

               समकालीन ग्रामीण जीवन के सशक्त और यथार्थ गाथा को साहित्य में बड़े ही बारीकी से पिरोने वाले ग्रामीण चेतना के लेखक शिवमूर्ति ने अपने कथा साहित्य में गाँव और गाँव की संस्कृति को जीवित रखने वाले किसानों को अपना नायक माना है। शिवमूर्ति जी स्वयं एक सरकारी अफसर रह चुके हैं लेकिन उन्होंने अपने हृदय के अंतर्मन में ग्रामीण अञ्चल को सँजोये हुए नौकरी की, परंतु उनके हृदय में बसे उनके खेत-खलिहान, फसल, हल, बैल गाय और उनके गाँव कभी धूमिल नहीं हुए। किसानों के प्रतिरोध और पीड़ा को जिस ढंग से शिवमूर्ति ने अपने साहित्य में दिखाया है, वह अत्यंत मार्मिक और यथार्थ है न कि कोरी कल्पना। उनके ग्रामीण जीवन के अनुभव ही उनके साहित्य में शब्दबद्ध होकर उतर आए हैं जिसका उदाहरण ‘अगम बहै दरियाव’ में बखूबी देखा जा सकता है। शिवमूर्ति जी उत्तर भारत के अवध प्रांत के एक गाँव में जन्मे और उसी मिट्टी में पले-बढ़े। उनकी जन्मभूमि उन्हें कितनी प्रिय है इसका उदाहरण तब देखा जा सकता है जब वे इस पुस्तक की रचना कर रहे होते हैं और इसे समर्पित करते हुए लिखते है “अपनी दुनिया के ऊसर-जंगल, नदी-ताल, खेत-खलिहान, पशु-पक्षी और लोग-लुगाइयों को तथा उस कालखंड को जिसकी दुनिया से मेरी निर्मिति हुई।” स्वतंत्र भारत में किसानों की स्थिति, आपातकाल, नसबंदी, जातिदंश, ग्रामीण जीवन में राजनीति का अतिक्रमण, बाहुबलियों का आतंक और स्त्रियों की दुर्दशा का चित्रण इस उपन्यास में बखूबी हुआ है। मुख्य रूप से किसानी जीवन को समर्पित इस उपन्यास के हर पृष्ठ पर जहां एक पड़ाव का अंत और दूसरे पड़ाव का आरंभ होता है उसके मध्य में हल जुआठा में बंधे दो बैल जिसे एक किसान हांक रहा है, का दृश्य अंकित है। पुस्तक के मुख्य पृष्ठ पर एक बूढ़े किसान का चित्र है जो गाँव की ओर मुख करके देख रहा है और इस दृश्य को गहरे लाल और काले रंगों में दिखाया गया है, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अवश्य ही गाँव पर कोई संकट है और किसान किसी घोर निराशा में डूबा है। उपन्यास में प्रसंगों के साथ बीच-बीच में लोकगीत और संगीतों की भरमार है जो लेखन में मिठास पैदा करती है और पाठक को भावुक करने में पूरा योगदान देती है। प्रारंभ से ही भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि रहा है। आज भी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15 प्रतिशत योगदान कृषि का है, जो कि पूर्व आंकड़ों की अपेक्षा कम है। इससे यह प्रतीत होता है कि कृषि दशा और कृषि कार्यों में तीव्र गति से गिरावट हुई है। जिसका कारण किसानों के पास फसल भंडारण, उपज के उचित दाम, कीटनाशकों और बी. टी. बीजों से उत्पन्न समस्याएं, कॉर्पोरेट जगत की मनमानी तथा रासायनिक खादों का दुष्प्रभाव आदि है। इस कारण आज की युवा पीढ़ी कृषि को अपनी पेशा मानने से कतराती है और जीविका हेतु शहरों में पलायन के मार्ग को अपना रही है। एक ऐसा वर्ग जो सदियों से किसानी तो कर रहा है लेकिन वह कभी किसी खेत का मालिक नहीं बन पाता और गाँव के ही कुछ शक्ति-सम्पन्न व्यक्ति अपने कब्जे में रखकर उनसे काम निकलवाते हैं। किसान की इसी मार्मिक इतिहास की गाथा है यह उपन्यास। वर्तमान समय में किसान आत्महत्या सामान्य बात हो गई है। पुस्तक के पिछले आवरण पर छपी परिचयात्मक टिप्पणी भी कुछ ऐसा ही कहती प्रतीत होती है—“इस कथा में समूचे उत्तर भारत के किसानों और मजदूरों की व्यथा समायी हुई है। इस दुनिया में सब शामिल हैं—अगड़े, पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक सब और सब इसमें बराबर के हिस्सेदार हैं। जिन्दगी के विविध रंगों, छवियों और गीत-संगीत से समृद्ध इस उपन्यास में ‘लोक’ की छटा कदम-कदम पर दृश्यमान है, और ग्रामीण जीवन की शान्त सतह के नीचे खदबदाती लोभ लालच, प्रेम-प्यार, छल-प्रपंच और त्याग- बलिदान की धाराएँ भी जो जमाने से बहती आ रही हैं।”

अगम बहै दरियाव में सामाजिक यथार्थ का चित्रण –

               प्राचीन काल से कृषि कार्य का अभिन्न हिस्सा बनी स्त्रियाँ जिन्हें कभी किसान माना ही नहीं गया जबकि कृषि कार्य का 70% कार्य स्त्रियों द्वारा ही सम्पन्न होता है चाहे वो मजदूर स्त्री हो या स्वयं घर की स्त्री। शिवमूर्ति के उपन्यासों में चित्रित स्त्रियाँ न कि केवल किसानी की सशक्त मिसाल हैं बल्कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं और कहीं कहीं तो पुरुषों से भी आगे होकर डटकर लोहा लेने वाली छवि में आती हैं। यही शिवमूर्ति जी का यथार्थबोध है जो उनको प्रासंगिक बनाता है। किसानी करती स्त्रियों की साक्षात परंपरा प्रेमचंद के गोदान से शुरू होती है, जहां धनिया, नोहरी, सिलिया आदि स्त्रियाँ कृषि कार्य करती हैं। यही परंपरा का निर्वहन शिवमूर्ति जी ने अगम बहै दरियाव में बखूबी किया है। उपन्यास की कथा कुल तेईस क्रमों में बँटी हुई है, जिसमे पहला क्रम ‘फौरन से पेशतर दफा हो जा’ है। कहानी का आरंभ आषाढ़ मास की शुरुआती बारिश से होती है, जब ‘बनकट’ गाँव का एक दलित किसान संतोखी का खेत ठाकुर छत्रधारी अचानक हथिया लेता है। संतोखी कुछ समझ नहीं पाता लेकिन जब छत्रधारी से पूछने जाता है तब पता चलता है कि उसके पिता रमेसर जो कि छत्रधारी के घर बहुत पहले से नौकरी (हरवाही) करते थे और उन्हीं के द्वारा पचास रुपये का कर्ज लेने का झूठा बहाना बताता है। कथावस्तु के केंद्र में इसी खेत के छुड़ाने की कथा है परंतु साथ-साथ अन्य कई कहानियां भी चलती है जिसमें चकबंदी, दलितों पर अत्याचार, आपातकाल के समय व्याप्त समस्या और नसबंदी कानून के शिकार बन रहे भोले-भाले ग्रामीण आदि भी हैं।

‘अगम बहै दरियाव’ कृषकों की महागाथा-

               लेखक जब किसानी समस्या पर लिख रहा होता है तब उसे जाति और लिंग से मुक्त कर देता है। उनकी दृष्टि में कृषक संरचना खेतिहर, मध्यम और निम्न व भूमिहीन किसान होते हैं, और यही एक यथार्थवादी लेखक का विशेष गुण है। इसमें अधिक निराश मझली और निम्न जोत के किसान होते हैं। आत्महत्या करने वाले अधिकांश किसान इसी वर्ग के होते हैं। कहानी के पात्र भगवत पांडे की आत्महत्या से इसे गहराई से समझ जा सकता है। उपज के पश्चात उचित मूल्य न मिलना और बिचौलियों द्वारा किसानों के साथ घूस और ज्यादती जो कि वर्तमान भारत की मूल समस्या है जिसे उपन्यास में कुछ इस प्रकार चित्रित किया गया है—पहलवान जब सरकारी क्रय केंद्र पर धान बेचने जाता है तभी सरकारी केंद्र पर पहुँचने से पहले उसे रास्ते में उसका कोई मित्र सेठ नथमल कांटा लगाए होता है। वह पहलवान से सरकारी केंद्र पर भीड़-भाड़ में जाने के बजाय अपने ही कांटे पर चार सौ अस्सी रुपये में धान बेचने को कहता है। पहलवान के न मानने पर वह पाँच रुपया और बढ़ाता है लेकिन पहलवान इनकार करके आगे बढ़ जाता है। परंतु वहाँ भीड़ और लंबी कतार, क्रेता और कर्मचारियों के बीच बहस देखकर परेशान हो जाता है। पहलवान देखता है कि किस प्रकार सेंटर के इंचार्ज प्रति कुंतल पर दस रुपये की दस्तूरी वसूल रहे हैं जो कि मनमानी रिश्वत है। इसपर पहलवान खीझकर बोलता है—“एक तो सरकार समर्थन मूल्‍य इतना कम तय करती है कि किसान की लागत नहीं निकलती, फिर आप मनमानी कटौती करके लूटते हैं।  सेंटर जब अपनी जेब भरने के लिए दस रुपये कुंटल हमसे लेता है तो फिर पाँच-छह किलों की कटौती क्यों करता है?” इसी प्रकार चीनी मिलों की कार्यप्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया है कि किस प्रकार किसानों से गन्ना उचित समय पर ले लिया जाता है लेकिन उसका मूल्य प्राप्त करने में किसानों को नाकों कहने चबाने होते हैं। किसानों के साथ मिल प्रबंधन कैसा मनमाना बर्ताव करता है इसका उदाहरण उपन्यास के इस प्रसंग को देखते हैं—“गन्ना पैदा करने से ज्यादा कठिन है, उसका भुगतान ले पाना। यह रोग दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। गन्ना मिलें गन्ना ले लेती हैं लेकिन उसका भुगतान करने में सौ अड़ंगे लगाती हैं। साल भर पहले गन्ना लिया। पेरकर चीनी बनाई और बेच दी लेकिन गन्ने की कीमत देने के बजाय हाई कोर्ट पहुँच गए। किसान अपनी खेती संभाले कि मुकदमे के पीछे-पीछे भागे।”

‘अगम बहै दरियाव’ ग्रामीण व्यवस्था में सत्ता की निर्मिति की महाकथा-

                ग्रामीण अञ्चल में कुछ कथित ऊंची जातियों का अपने से नीची जातियों पर सत्ता कायम होती है। स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में दलितों को एक नहीं बल्कि कई शासन के अधीन होकर रहना पड़ता है इसको प्रमाणित करते हुए उपन्यास के इस अंश को देखा जा सकता है—“छत्रधारी सिंह का मानना है कि मत्स्य-न्याय ही प्राकृतिक है। कमजोर हमेशा बलवानों का आहार बनता है। ठाकुर न पूजा-पाठ, कथा-भागवत बाँचकर ब्राह्मण की तरह आजीविका प्राप्त कर सकता है, न वैश्य की तरह व्यापार करके। खेती में हाड़तोड़ मेहनत करके आजीविका कमाना भी उसके वश में नहीं हैं।” यह तो हुई ठाकुरों के ठाठ की बात। कुछ यही हाल ब्राह्मणों की भी है हालांकि ब्राह्मणों में अधिकतर पूंजी की सत्ता कायम होती है, अर्थात जो धन-बल से सम्पन्न होता है ठाठ उन्ही के अधिक होते हैं, परंतु जातिगत सत्ता में तो वे सदैव सातवें आकाश पर विराजमान होते हैं। गाँव के एक पांडे परिवार के हलवाहे के बीमार पड़ जाने पर खेत जोतने के लिए जब घर का ही बेटा प्रभाकर हल-बैल लेकर खेत जोतने जाता है, तो उसकी पत्नी अपमान महसूस करती है—“प्रभाकर बहू नहीं चाहती थीं कि उनके भाई को प्रभाकर के हल जोतने की बात पता चले और उनके मायके वालों को कहने का मौका मिले कि पाठक का दामाद ‘हरजोता’ है। इस इलाके में किसी सवर्ण का हल की मुठिया थामना बहुत बुरा माना जाता है। यह काम जमाने से मेहनतकश जातियों के जिम्मे है।” इस मेहनतकश जातियों पर कितनी सत्ता कायम होती है इसका उदाहरण स्पष्ट है। प्रश्न ये उठता है कि इनकी राजनीतिक भागीदारी कम होती है जिससे अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाते। बनकटा गाँव में जब प्रधान पद की सीट आती है तो दलित महिला के लिए आरक्षित होती है जिसमें गाँव की एक शसक्त महिला दहबंगा प्रधान बनती है। दहबंगा फूलन देवी से प्रभावित होती है। तूफानी दहबंगा का बेटा है जो घर और समाज की तमाम प्रतिकूलताओं के बीच वकालत की पढ़ाई पूरी कर लेता है। वह दलित राजनीति का जुझारू कार्यकर्ता है। पार्टी के प्रति उसकी निष्ठा को देखकर पार्टी उसे जनजागरण और संगठन की जिम्मेदारी देती है। राजधानी में जब पार्टी की महारैली आयोजित होती है तो तूफ़ानी को दो बस लाने की जिम्मेदारी दी जाती है बस सवर्ण समाज के पास होती है इसलिए बस मालिक बस देने से इनकार कर देते हैं और कहते हैं—“हमारी ही बस में चढ़कर हमारे ही खिलाफ नारा लगाने जाओगे? लौटने के बाद हफ्ते भर तक बस गँधाती रहेगी अलग।” तूफ़ानी को उसकी पार्टी के प्रति जिम्मेदारी को देखते हुए उसे जिले का कॉर्डिनेटर बनाया जाता है। परंतु कुछ ही समय में तूफ़ानी पार्टी की सच्चाई से अवगत हो जाता है, जब पेरियर की मूर्ति  की स्थापना को बहन जी की सत्तारूढ़ पार्टी की सहयोगी – रामवादी पार्टी इसे हिंदू आस्था के लिए अपमान की बात मानती है और किसी समझौते के पश्चात मूर्ति की स्थापना के कार्यक्रम को मीडिया द्वारा फैलाई गयी ग़लतफ़हमी बताकर रद्द कर दिया जाता है। दूसरी बार उसे धक्का तब लगता है, जब पार्टी के एक विधायक की मृत्यु के कारण रिक्त सीट को एक रिटायर्ड कमिश्नर के हाथों बेच दिया जाता है और रातों रात उनकी पत्नी व पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी की मालकिन कमला चौधरी को विधायक बना दिया जाता है। अंततः तूफ़ानी पर विधायक कमला चौधरी के एक खाली पड़े घर पर कब्जे और नशीले पदार्थों से पैसा कमाने का आरोप लगाकर पार्टी से निष्काषित कर दिया जाता है।

कृषक स्त्रियों का सशक्त चित्र उकेरता अगम बहै दरियाव-

               भारतीय इतिहास यह सिद्ध कर चुका है कि कृषि का आविष्कारक स्त्रियाँ हैं लेकिन साहित्य और समाज में किसान के रूप में पुरुष शब्द रूढ हो चुका है। जबकि आज भी किसानी का अधिकतर कार्य स्त्रियाँ ही करती हैं। साहित्य के विशेष संदर्भ में बात की जाए तो प्रेमचंद के गोदान में कृषक स्त्रियों का सशक्त चित्रण दिखाई पड़ता है परंतु एक लंबे अंतराल के बाद समकालीन साहित्य में स्त्री किसानों का चित्रण होता आ रहा है। ‘अगम बहै दरियाव’ में किसानी करती स्त्रियों का दबंग चित्र उभरकर आया है। ये स्त्रियाँ न सिर्फ मजदूर और दलित समाज की हैं बल्कि सामंती या सवर्ण समाज की वे महिलाएं जो खेतों में काम करती हैं, पशुओं के बीच अपना समय बिताती हैं, वे सभी शिवमूर्ति की दृष्टि में एक समान हैं। क्योंकि इनमें से सभी को न्याय-अन्याय और अपने अधिकार का बोध है। क्योंकि समाज में यदि स्त्री अस्मिता को बरकरार रखना है तो स्त्रियों को अपने स्तर पर उस कार्य में भागीदारी करना होना जिससे उसे दूर रखा गया। दहबंगा, पहलवानिन, विद्रोही बहू, गजाधर बहू, सुनरा अइया और सोना इन सभी मेहनतकश स्त्रियों का एक गहरा इतिहास है, जिनमें उनका संघर्ष है। दहबंगा जब गाँव की प्रधान बनती है तब पूरे गाँव की मजदूर महिलाओं और पुरुषों के काम के लिए मजदूरी और समय को निर्धारित करती है। ऐसे ही गाँव की वृद्ध स्त्री सुनरा अइया जिसके कोई संतान न होने के कारण अपने पति का दूसरा विवाह कराती है लेकिन बयालीस साल की उम्र में ही विधवा हो जाती है। पति की मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी को बहन की तरह मान कर उसके बच्चों के लिए स्वयं को पति के स्थान पर रखकर घर, पशु-पहिया और खेत सब संभालती है। स्त्रियों के द्वारा गढ़ी गई इस दुनिया से सबसे बेदखल स्त्रियाँ ही हुई हैं चाहे घर से हो, जमीन का हक अथवा उसकी अपनी पहचान हो। सर्वप्रथम उनसे उनकी पहचान चुराई जाती है। एक लड़की जब तक मायके रहती है तब तक उसका नाम होता है लेकिन जैसे ही वह किसी की पत्नी बनकर ससुराल जाती है किसी की पत्नी, किसी की मां, किसी की भौजी, किसी की बहू बनकर रह जाती है न तो उसका नाम बचता है और न ही कोई घर क्योंकि पहला घर तो मायके, भायके या नैहर हो जाता है। स्त्रियाँ भले ही अपनी पहचान के बदलने को स्वीकार कर लेती हों  लेकिन बुद्धू वे कभी नहीं बनती। हाँ ये अलग बात होती है कि दुनिया सदियों से उन्हे बुद्धू समझती रही। दलित टोले की महिलायें जब रंग-बिरंगी साड़ी पहनकर झुंड में वोट देने निकलती हैं तो रास्ते में अन्य पार्टी के समर्थक रामनेवाज उन्हें कुछ रुपये देकर अपनी पार्टी को वोट देने की बात करते हैं इसपर उनका उत्तर होता है—“हमारा वोट बिकाऊ नहीं है।” रामनेवाज के जबरदस्ती करने पर सारी स्त्रियाँ मिलकर जमीन पर पटक देती हैं और लात-घूसों से उनके वोट याद करती हैं।

लोकगीत और संस्कृति की मिठास अगम बहै दरियाव –

               जिस देश में जन्म के समाचार से लेकर मृत्यु तक, बारह महीनों, सात ऋतुओं और हर पर्व का आरंभ और इति गीत से हो उस देश की संस्कृति अवश्य ही समृद्ध होगी। चूंकि कृषि संस्कृति का विराट स्वरूप भारत ही है, इसका कारण है—भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि का होना। ऐसे में कृषि संबंधी कार्यों में लोकगीतों की मिठास और किसानों की करुण गाथा तो मिल ही जाएगी। गीत एक ऐसी विधा है जिसपर सिर्फ मनुष्यों का आधिपत्य नहीं है, बल्कि मनुष्येतर प्राणी भी अधिक हर्ष अथवा विषाद के क्षण में गीत अर्थात एक विशेष राग के माध्यम से ही अपने मनोभाव प्रकट करते हैं। अगम बहै दरियाव भी किसानों का महागीत ही जिसके अंतर्गत उनके दुख-सुख, रीति-रिवाज लोकगीतों के माध्यम से अधिक स्पष्ट होते हैं। भूसी गड़रिया की पत्नी की मृत्यु के समय गाँव की अन्य महिलायें ‘निरगुन’ में विलाप करते हुए कहती हैं—

सैयां आए अनवार, लइके डोलिया कहार
मुंह ढाके चली जाबै हम चदरिया से

               ग्रामीण समाज में जब दलित, मजदूर, किसान या स्त्रियाँ जिसपर युगों से एक मजबूत वर्ग का दबाव रहा, वे अपनी शिकवा-शिकायतों को मुखर होकर कहने के अधिकार क्षेत्र से बाहर थे ऐसे में वे उसे कविता या गीत को ही कहन की परंपरा अपनाई। जैसे बनकट गाँव में संतोखी नाई पर अत्याचार करने वाले छत्रधारी सिंह और उनके पिता जो कई पीढ़ी से समकालीन पीढ़ी को अपने अत्याचारों में फँसाये हुए है, उनके बारे में संतोखी कहता है—

इंदर सिंह कै बखान
पंचौ सुनो लगा के कान
जेकरे पपवा से धरती रही गरुआन।

               भारत के हर त्योहार में कृषि संस्कृति मिली हुई है। उसका कारण है कि ग्रामीण समाज में खेत, बैल, जुआठा और उसके पशु ही उनकी संपत्ति होती थी जिससे उनके त्योहारों में उनके खेत और पशु के कल्याण की कामना होती थी। इसका यथार्थ वर्णन शिवमूर्ति जी ने इस पुस्तक में किया है—

“कार्तिक एकादशी! दलिद्दर खेदने का त्योहार।

घर में पीढ़ियों से जड़ जमाकर बैठे दलिद्दर को भगाने के लिए किसान का पूरा परिवार रात-दिन खेत में खटता है, लेकिन भगा नहीं पाता। इसलिए कार्तिक एकादशी की भोर में हर गृहिणी घर से दलिद्दर के भागने और इस्सर* के आने का आह्वान करती है।”

 

निष्कर्ष-

               यह उपन्यास स्वतंत्र भारत के चार दशकों जिसमें आपातकाल, उदारीकरण, बाजारवाद, नवसामंतवाद का एक ऐसा दस्तावेज है, जिसमें अन्याय, भ्रष्टाचार, प्रतिकार सब उपस्थित है। शिवमूर्ति जी ने बड़ी ही सूझ-बूझ के साथ भारतीय समाज के हर वर्ग को चित्रित किया है, शायद इसी कारण उपन्यास वृहदाकार हो गया है। अगम बहै दरियाव मानवीय जीवन की पीड़ा का एक वृहद संग्रह है। किसानी करती स्त्रियों की दबंग छवि और उनको कमजोर बनाने की लगातार हो रही साजिश का इस तरह नग्न चित्रण करना निश्चित ही साहस का कार्य है। गाँव-गँवई की हर पगडंडियों, मेंढ़ों पर चलकर शिवमूर्ति जी यह कहीं नहीं भूलते कि गाँव का संबंध नगरों से नहीं होता बल्कि, गांवों पर पड़ रहे तेजी से शहरों के प्रभाव का चित्रण भी बखूबी करते हैं। अञ्चल और संवैधानिक प्रक्रिया को ही नायक बनाकर लिखा गया यह उपन्यास किसी वर्ग, जाति, धर्म और लिंग आदि का पक्षपात न करके लगभग सभी समुदाय पर समान रूप से कलम चलाने का प्रयास है। हिन्दी साहित्य में खेतिहर समाज के विविध दृश्यों को उकेरता यह उपन्यास बनकट गाँव के बहाने  उत्तर भारत के हर गाँव की गलियों, खेतों की पगडंडियों, सावन के झूलों, फागुन के रंगों और कार्तिक की उँजाले से भरी अंधेरी रातों के उन स्वप्नलोकों में ले जाता है जहां हर्ष, रंग, उल्लास, विलास, करुणा, विषाद, न्याय-अन्याय और दुख की झांकी प्रस्तुत है।

संदर्भ 

1. अगम बहै दरियाव, शिवमूर्ति, 2023, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्‍ली।

 

-: लेखक :-
प्रियंका शुक्‍ला
शोधार्थी
हैदराबाद विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद

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    Priyanka Shukla

    विशेष धन्यवाद @hindisahityasangam.com मेरे इस लेख को अपने वेबसाइट पर स्थान देने के लिए 🙏🙏

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