बैठा हूँ इस केन किनारे – केदारनाथ अग्रवाल | हिन्दी कविता

दोनों हाथों में रेती है,...नीचे, अगल-बग़ल रेती है,...होड़ राज्य-श्री से लेती है.......मोद मुझे रेती देती है

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