बैठा हूँ इस केन किनारे – केदारनाथ अग्रवाल | हिन्दी कविता

 

बैठा हूँ इस केन किनारे
(Baitha Hun Is Ken Kinare)

बैठा हूँ इस केन किनारे!

दोनों हाथों में रेती है,
नीचे, अगल-बग़ल रेती है
होड़ राज्य-श्री से लेती है
मोद मुझे रेती देती है

रेती पर ही पाँव पसारे
बैठा हूँ इस केन किनारे।

धीरे-धीरे जल बहता है
सुख की मृदु थपकी लहता है
बड़ी मधुर कविता कहता है
नभ जिस पर बिंबित रहता है

मैं भी उस पर तन-मन वारे
बैठा हूँ इस केन किनारे।

प्रकृति-प्रिया की माँग चमकती
चटुल मछलियाँ उछल चमकती
बगुलों की प्रिय पाँत चमकती
चाँदी जैसी रेत दमकती

मैं भी उज्जवल भाग्य निखारे
बैठा हूँ इस केन किनारे!

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