प्रथम संस्करण का वक्तव्य
हिन्दी कवियों का एक वृत्त-संग्रह ठाकुर शिवसिंह सेंगर ने सन् 1883 ईसवी में प्रस्तुत किया था। उसके पीछे सन् 1889 में डॉक्टर (अब सर) ग्रियर्सन ने ‘Modern Vernacular Literature Of Northen Hindustan’ के नाम से एक वैसा ही बड़ा कवि-वृत्त-संग्रह निकाला। काशी की नागरी-प्रचारिणी सभा का ध्यान आरंभ ही में इस बात की ओर गया कि सहस्त्रों हस्तलिखित हिन्दी-पुस्तकें देश के अनेक भागों में राज-पुस्तकालयों तथा घरों में अज्ञात पड़ी हैं। अतः सरकार की आर्थिक सहायता से उसने सन् 1900 से पुस्तकों की खोज का काम हाथ में लिया और सन् 1911 तक अपनी खोज की आठ रिपोर्टों में सैकड़ों अज्ञात कवियों तथा ज्ञात कवियों के अज्ञात ग्रंथों का पता लगाया। सन् 1913 में इस सारी सामग्री का उपयोग करके मिश्रबंधुओं (श्रीयुत् पंडित श्यामविहारी मिश्र आदि) ने अपना बड़ा भारी कवि-वृत्त-संग्रह ‘मिश्रबंधु विनोद’, जिसमे वर्तमान काल कवियों और लेखकों का भी समावेश किया गया, तीन भागों में प्रकाशित किया।
इधर जब से विश्वविद्यालयों में हिन्दी की उच्च शिक्षा का विधान हुआ तब से उसके साहित्य के विचार-शृंखला-बद्ध इतिहास की आवश्यकता का अनुभव छात्र और अध्यापक दोनों कर रहे थे। शिक्षित जनता की जिन-जिन प्रवृत्तियों के अनुसार हमारे साहित्य के स्वरूप में जो-जो परिवर्तन होते आए हैं, जिन-जिन प्रभावों की प्रेरणा से काव्यधारा की भिन्न-भिन्न शाखाएं फूटती रही हैं उन सबके सम्यक् निरूपण तथा उनकी दृष्टि से किए हुए सुसंगत काल-विभाग के बिना साहित्य के इतिहास का सच्चा अध्ययन कठिन दिखाई पड़ता है। सात-आठ सौ वर्षों की संचित ग्रंथराशि सामने लगी हुई थी; पर ऐसी निर्दिष्ट सरणियों की उद्भावना नहीं हुई थी जिनके अनुसार सुगमता से इस प्रभूत सामग्री का वर्गीकरण होता। भिन्न-भिन्न शाखाओं के हजारों कवियों की केवल कालक्रम से गुथी उपर्युक्त वृत्तमालाएं साहित्य के इतिहास के अध्ययन में कहाँ तक सहायता पहुँचा सकती थीं ? सारे रचना-काल को केवल आदि, मध्य, पूर्व, उत्तर इत्यादि खंडों में आँख मूँदकर बाँट देना—यह भी न देखना कि किस खंड के भीतर क्या आता है, क्या नहीं— किसी वृत्त-संग्रह को इतिहास नहीं बना सकता।
पाँच या छ: वर्ष हुए छात्रों के उपयोग के लिए मैंने कुछ संक्षिप्त नोट तैयार किये थे जिनमे परिस्थिति के अनुसार शिक्षित जन-समूह की बदलती हुई प्रवृत्तियों को लक्ष्य करके हिन्दी-साहित्य के इतिहास के काल-विभाग और रचना की भिन्न-भिन्न शाखाओं के निरूपण का एक कच्चा ढांचा खड़ा किया गया था। ‘हिन्दी-शब्द-सागर’ समाप्त हो जाने पर उसकी भूमिका के रूप में भाषा और साहित्य का विकास देना भी स्थिर किया गया अतः एक नियत समय के भीतर ही यह इतिहास लिखकर पूरा करना पड़ा। साहित्य का इतिहास लिखने के लिये जितनी अधिक सामग्री मैं ज़रूरी समझता था उतनी तो उस अवधि के भीतर न इकट्ठी हो सकी, पर जहां तक हो सका आवश्यक उपादान सामने रखकर यह कार्य पूरा किया गया।
इस पुस्तक में जिस पद्धति का अनुसरण किया गया है उसका थोड़े में उल्लेख कर देना आवश्यक जान पड़ता है।
पहले काल-विभाग को लीजिए। जिस काल-खंड के भीतर किसी विशेष ढंग की रचनाओं की प्रचुरता दिखाई पड़ी है वह एक अलग काल माना गया है और उसका नामकरण उन्हीं रचनाओं के स्वरूप के अनुसार किया गया है। इस प्रकार प्रत्येक काल का एक निर्दिष्ट सामान्य लक्षण बताया जा सकता है। किसी एक ढंग की रचना की प्रचुरता से अभिप्राय यह है कि शेष दूसरे ढंग की रचनाओं में से चाहे किसी (एक) ढंग की रचना को लें वह परिमाण में प्रथम के बराबर न होगी; यह नहीं कि और सब ढंगों की रचनाएं मिलकर भी उसके बराबर न होंगी। जैसे, यदि किसी काल में पाँच ढंग की रचनाएं 10, 5, 6, 7 और 2 के क्रम से मिलती हैं तो जिस ढंग की रचना की 10 पुस्तकें हैं उसकी प्रचुरता कही जायेगी, यद्यपि शेष और ढंग की सब पुस्तकें मिलकर 20 हैं। यह तो हुई पहली बात। दूसरी बात है ग्रंथों की प्रसिद्धि। किसी काल के भीतर जिस एक ही ढंग के बहुत अधिक ग्रंथ प्रसिद्ध चले आते हैं उस ढंग की रचना उस काल के लक्षण के अंतर्गत मानी जायेगी, चाहे और दूसरे-दूसरे ढंग की अप्रसिद्ध और साधारण कोटि की बहुत-सी पुस्तकें भी इधर-उधर कोनों में पड़ी मिल जाया करें। प्रसिद्धि भी किसी काल की लोक-प्रवृत्ति की प्रतिध्वनि है। सारांश यह कि इन दोनों बातों में की ओर ध्यान रखकर काल-विभागों का नामकरण किया गया है।
आदिकाल का नाम मैंने ‘वीरगाथा-काल’ रखा है। उक्त काल के भीतर दो प्रकार की रचनाएँ मिलती हैं—अपभ्रंश की और देशभाषा (बोलचाल) की। अपभ्रंश की पुस्तकों में कई तो जैनों के धर्म-तत्व-निरूपण-संबंधी हैं जो साहित्य-कोटि में नहीं आतीं और जिनका उल्लेख केवल यह दिखाने के लिये ही किया गया है कि अपभ्रंश भाषा का व्यवहार कब से हो रहा था। साहित्य-कोटि में आनेवाली रचनाओं में कुछ तो भिन्न-भिन्न विषयों पर फुटकल दोहे हैं जिनके अनुसार उस काल की कोई विशेष प्रवृत्ति निर्धारित नहीं की जा सकती। साहित्यिक पुस्तकें केवल चार हैं—
- विजयपालरासो
- हम्मीररासो
- कीर्तिलता
- कीर्तिपताका
देशभाषा-काव्य की आठ पुस्तकें प्रसिद्ध हैं—
- खुमानरासो
- बीसलदेवरासो
- पृथ्वीराजरासो
- जयचंद-प्रकाश
- जयमयंक-जस-चंद्रिका
- परमालरासो (आल्हा का मूलरूप)
- ख़ुसरो की पहेलियाँ आदि
- विद्यापति-पदावली
इन्हीं बारह पुस्तकों की दृष्टि से ‘आदि काल’ का लक्षण-निरूपण और नामकरण हो सकता है इनमें से अंतिम दो तथा बीसलदेवरासो को छोड़ शेष सब ग्रंथ वीरगाथात्मक ही हैं। अत: आदि काल का नाम ‘वीरगाथा-काल’ ही रखा जा सकता है। जिस सामाजिक या राजनीतिक परिस्थिति की प्रेरणा से वीरगाथाओं की प्रवृत्ति रही है उसका सम्यक् निरूपण पुस्तक में कर दिया गया है।
मिश्रबंधुओं ने इस ‘आदि काल’ के भीतर इतनी पुस्तकों की और नामावली दी है—
- भगवद्गीता
- वृद्ध नवकार
- वर्त्तमाल
- संमतसार
- पत्तलि
- अनन्य योग
- जंबूस्वामी रासा
- रैवतगिरि रासा
- नेमिनाथ चउपई
- उवएस-माला (उपदेशमाला)
इनमें से नंबर 1 तो पीछे की रचना है, जैसा कि उसकी इस भाषा से स्पष्ट है—
तेहि दिन कथा कीन मन लाई। हरि के नाम गीत चित आई।।
सुमिरौं गुरु गोविंद के पाऊँ। अगम अपार है जाकर नाऊँ।।
जो वीररस की पुरानी परिपाटी के अनुसार कहीं वर्णों का द्वित्व देखकर ही प्राकृत भाषा और कहीं चौपाई देखकर ही अवधी या बैसवाड़ी समझते है, जो भाव को ‘Thought’ और विचार को ‘Feeling’ कहते हैं वे यदि उद्धृत पद्यों को संवत् 1000 के क्या संवत् 500 के भी बताएँ तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पुस्तक की संवत्-सूचक पंक्ति का यह गड़बड़ पाठ ही सावधान करने के लिए काफ़ी है—‘सहस्त्र सो संपूरन जाना’।
अब रहीं शेष नौ पुस्तकें। उनमें नं. 2, 7, 9 और 10 जैन धर्म के तत्व-निरूपण पर हैं और साहित्य-कोटि में नहीं आ सकतीं। नं. 6 योग की पुस्तक है। नं. 3 और नं. 4 केवल नोटिस मात्र हैं; विषयों का कुछ भी विवरण नहीं है। इस प्रकार केवल दो साहित्यिक पुस्तकें बचीं जो वर्णनात्मक (Descriptive) हैं— एक में नंद के ज्योनार का वर्णन है, दूसरी में गुजरात के रैवतक पर्वत का। अत: इन पुस्तकों की नामावली से मेरे निश्चय में किसी प्रकार का अंतर नहीं पड़ सकता। यदि ये भिन्न-भिन्न प्रकार की नौ पुस्तकें साहित्य भी होतीं तो भी मेरे नामकरण में कोई बाधा नहीं डाल सकती थीं; क्योंकि मैंने नौ प्रसिद्ध वीरगाथात्मक पुस्तकों का उल्लेख किया है।
एक ही काल और एक ही कोटि की रचना के भीतर जहां भिन्न-भिन्न प्रकार की परम्पराएं चली हुई पाई गई हैं वहाँ अलग-अलग शाखाएं करके सामग्री का विभाग किया गया है। जैसे, भक्तिकाल के भीतर पहले तो दो काव्य-धाराएं—निर्गुण धारा और सगुण धारा—निर्दिष्ट की गई हैं। फिर प्रत्येक धारा की दो-दो शाखाएं स्पष्ट रूप से लक्षित हुई हैं—निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी और प्रेममार्गी (सूफ़ी) शाखा तथा सगुण धारा की रामभक्ति और कृष्णभक्ति-शाखा। इन धाराओं और शाखाओं की प्रतिष्ठा यों ही मनमाने ढंग पर नहीं की गई हैं और देखते ही ध्यान में भी आ जायँगी।
रीतिकाल के भीतर रीतिबद्ध रचना की जो परंपरा चली है उसका उपविभाग करने का कोई संगत आधार मुझे नहीं मिला। रचना के स्वरूप आदि में कोई स्पष्ट भेद निरूपित किए बिना विभाग कैसे किया जा सकता है ? किसी काल-विस्तार को लेकर यों ही पूर्व और उत्तर नाम देकर दो हिस्से कर डालना एतिहासिक विभाग नहीं कहला सकता। जब तक पूर्व और उत्तर के अलग-अलग लक्षण न बताए जाएंगे तब तक इस प्रकार के विभाग का कोई अर्थ नहीं। इस प्रकार थोड़े-थोड़े अंतर पर होनेवाले कुछ प्रसिद्ध कवियों के नाम पर अनेक काल बांध चलने के पहले यह दिखाना आवश्यक है कि प्रत्येक काल-प्रवर्तक कवि का यह प्रभाव उसके काल में होने वाले सब कवियों में सामान्य रूप से पाया जाता है। विभाग का कोई पुष्ट आधार होना चाहिए। रीतिबद्ध ग्रंथों की बहुत गहरी छानबीन और सूक्ष्म पर्यालोचना करने पर आगे चलकर शायद कोई विभाग का कोई आधार मिल जाय, पर अभी तक मुझे नहीं मिला है।, पर अभी तक मुझे नहीं मिला है। रीतिकाल के भीतर दो बातें और कहनी हैं। इस काल के कवियों के परिचयात्मक वृत्तों की छानबीन में मैं अधिक नहीं प्रवृत्त हुआ हूँ, क्योंकि मेरा उद्देश्य अपने साहित्य के इतिहास का एक पक्का और व्यवस्थित ढांचा खड़ा करना था, न कि कवि-कीर्तन करना। अतः कवियों के परिचयात्मक विवरण मैंने प्रायः ‘मिश्रबंधु विनोद’ से लिए हैं। कहीं-कहीं कुछ कवियों के विवरणों में परिवर्धन और परिष्कार भी किया है; जैसे, ठाकुर, दीनदयाल गिरि, राम सहाय और रसिक गोविंद के विवरणों में यदि कुछ कवियों के नाम छूट गए या किसी कवि की किसी मिली हुई पुस्तक का उल्लेख नहीं हुआ तो इससे मेरी कोई बड़ी उद्देश्य-हानि नहीं हुई। इस कल के भीतर मैंने जितनी कभी लिए हैं या जितने के नाम दिए हैं उतने ही ज़रूरत से ज़्यादा मालूम हो रहे हैं।
रीतिकाल या और किसी काल के कवियों की साहित्यिक विशेषताओं के संबंध में मैंने जो संक्षिप्त विचार प्रकट किए हैं वे दिग्दर्शन मात्र के लिए। इतिहास की पुस्तक में किसी कवि की पूरी क्या अधूरी आलोचना भी नहीं आ सकती। किसी कवि की आलोचना लिखनी होगी तो स्वतंत्र प्रबंध या पुस्तक के रूप में लिखूंगा। बहुत प्रसिद्ध कवियों के संबंध में ही थोड़ा विस्तार के साथ लिखना पड़ा है पर वहां भी विशेष-विशेष प्रवृत्तियों का ही निर्धारण किया गया है। यह अवश्य है कि उनमें से कुछ प्रवृत्तियों को मैंने रसोपयोगी और कुछ को बाधक कहा है।
आधुनिक काल में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान साहित्यिक घटना है। इसलिए उसके प्रसार का वर्णन विशेष विस्तार के साथ करना पड़ा है। इस थोड़े-से काल के बीच में हमारे साहित्य के भीतर जितनी अनेकरूपता का विकास हुआ है उतनी अनेकरूपता का विधान कभी नहीं हुआ था। पहले मेरा विचार आधुनिक काल को ‘द्वितीय उत्थान’ के आरंभ तक लाकर उसके आगे की प्रवृत्तियों का सामान्य और संक्षिप्त उल्लेख करके ही छोड़ देने का था; क्योंकि वर्तमान लेखकों और कवियों के संबंध में कुछ लिखना अपने सिर एक बला मोल लेना ही समझ पड़ता था। पर जी न माना। वर्तमान सहयोगियों तथा उनके अमूल्य कृतियों का उल्लेख भी थोड़े-बहुत विवेचन के साथ डरते-डरते किया गया।
वर्तमान काल के अनेक प्रतिभा संपन्न और प्रभावशाली लेखन और कवियों के नाम जल्दी में या भूल से छूट गए होंगे। इसके लिए उनसे तथा उनसे भी अधिक उनकी कृतियों से विशेष रूप में परिचित महानुभावों से क्षमा की प्रार्थना है। जैसा पहले कहा जा चुका है, यह पुस्तक जल्दी में तैयार करनी पड़ी है इससे इसका जो रूप मैं रखना चाहता था वह भी इसे पूरा-पूरा नहीं प्राप्त हो सका है। कवियों और लेखकों के नामोल्लेख के संबंध में एक बात का निवेदन और है। इस पुस्तक का उद्देश्य संग्रह नहीं था। इससे आधुनिक काल के अंतर्गत सामान्य लक्षणों और प्रवृत्तियों के वर्णन की ओर ही अधिक ध्यान दिया गया है। अगले संस्करण में इस काल का प्रसार कुछ और अधिक हो सकता है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि हिंदी-साहित्य का यह इतिहास ‘हिंदी शब्द सागर’ की भूमिका के रूप में ‘हिंदी साहित्य का विकास’ के नाम से सन् 1929 के जनवरी महीने में निकल चुका है। इस अलग पुस्तकाकार संस्करण में बहुत-सी बातें बढ़ाई गई हैं—विशेषत: आदि और अंत में। ‘आदि काल’ के भीतर अपभ्रंश की रचनाएं भी ले ली गई हैं क्योंकि वह सदा से ‘भाषा-काव्य’ के अंतर्गत ही मानी जाती रही हैं। कवि-परंपरा के बीच प्रचलित जनश्रुति कई ऐसे प्राचीन भाषा-काव्यों के नाम गिनती चली आई है जो अपभ्रंश में हैं—जैसे, कुमारपालचरित और शारंगधर कृत हम्मीररासो। ‘हम्मीररासो’ का पता नहीं है। पर ‘प्राकृत-पिंगल-सूत्र’ उलटते-पलटते हुए मुझे हम्मीर के युद्धों के वर्णनवाले कई बहुत ही ओजस्वी पद्य छंदों के उदाहरण में मिले। मुझे पूर्ण निश्चय हो गया है कि ये पद्य शारंगधर के प्रसिद्ध ‘हम्मीररासो’ के ही हैं।
आधुनिक काल के अंत में वर्तमान काल की कुछ विशेष प्रवृत्तियों के वर्णन को थोड़ा और पल्लवित इसलिए करना पड़ा जिसमें उन प्रवृत्तियों के मूल का ठीक-ठाक पता केवल हिंदी पढ़नेवालों को भी हो जाय और वे धोखे में न रहकर स्वतंत्र विचार में समर्थ हों।
मिश्रबंधुओं के प्रकांड कविवृत्त-संग्रह ‘मिश्रबंधु विनोद’ का उल्लेख हो चुका है। ‘रीतिकाल’ के कवियों के परिचय लिखने में मैंने प्रायः उक्त ग्रंथ से ही विवरण लिए हैं अतः आधुनिक शिष्टता के अनुसार उसके उत्साही और परिश्रमी संकलन-कर्ताओं को धन्यवाद देना मैं बहुत ज़रूरी समझता हूं। हिंदी पुस्तकों की खोज की रिपोर्टें भी मुझे समय-समय पर—विशेषतः संदेह के स्थल आने पर–उलटनी पड़ी हैं। राय साहब बाबू श्यामसुंदरदास बी. ए. की ‘हिंदी-कोविद-रत्नमाला’, श्रीयुत् पंडित रामनरेश त्रिपाठी की ‘कविता कौमुदी’ तथा श्रीवियोगी हरि जी के ‘व्रजमाधुरी-सार’ से भी बहुत कुछ सामग्री मिली है, अतः उक्त तीनों महानुभावों के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूं। ‘आधुनिक का’ के प्रारंभिक प्रकरण लिखते समय जिस कठिनता का सामना करना पड़ा उसमें मेरे बड़े पुराने मित्र पंडित केदारनाथ पाठक ही काम आए। पर न आज तक मैंने उन्हें किसी बात के लिए धन्यवाद दिया है, न अब देने की हिम्मत कर सकता हूं। ‘धन्यवाद’ को वे ‘आजकल की एक बदमाशी’ समझते हैं।
इस कार्य में मुझसे जो भूलें हुई हैं उनके सुधार की, जो त्रुटियां रह गई हैं, उनकी पूर्ति की और जो अपराध बन पड़े हैं उनकी क्षमता की पूरी आशा करके ही मैं अपने श्रम से कुछ संतोष-लाभ कर सकता हूं।
काशी
आषाढ़ कृष्ण पांच संवत 1986
रामचंद्र शुक्ल
संशोधित और प्रवर्धित संस्करण के संबंध में दो बातें
कई संस्करणों के उपरांत इस पुस्तक के परिमार्जन का पहला अवसर मिला, इससे इसमें कुछ आवश्यक संशोधन के अतिरिक्त बहुत-सी बातें बढ़ानी पड़ीं।
‘आदिकाल’ के भीतर वज्रयानी सिद्धों और नाथपंथी योगियों की परंपराओं का कुछ विस्तार के साथ वर्णन यह दिखाने के लिए करना पड़ा कि कबीर द्वारा प्रवर्तित निर्गुण संत-मत के प्रचार के लिए किस प्रकार उन्होंने पहले से रास्ता तैयार कर दिया था। दूसरा उद्देश्य यह स्पष्ट करने का भी था कि सिद्धों और योगियों की रचनाएं साहित्य-कोटि में नहीं आतीं और योग-धारा काव्य और साहित्य की कोई धारा नहीं मानी जा सकती।
‘भक्तिकाल’ के अंतर्गत स्वामी रामानंद और नामदेव पर विशेष रूप से विचार किया गया है; क्योंकि उनके संबंध में अनेक प्रकार की बातें प्रचलित है।
‘रीतिकाल’ के ‘सामान्य परिचय’ में हिंदी के अलंकार-ग्रंथों की परंपरा का उद्गम और विकास कुछ अधिक विस्तार के साथ दिखाया गया है। घनानंद आदि कुछ मुख्य-मुख्य कवियों का आलोचनात्मक परिचय भी विशेष रूप में मिलेगा।
‘आधुनिक काल’ के भीतर खड़ी बोली के गद्य का इतिहास इधर जो कुछ सामग्री मिली है उसकी दृष्टि से एक नए रूप में सामने लाया गया है। हिंदी के मार्ग में जो-जो विलक्षण बाधाएं पड़ी हैं उनका भी सविस्तार उल्लेख है। पिछले संस्करणों में वर्तमान अर्थात् आजकल चलते हुए साहित्य की मुख्य-मुख्य प्रवृत्तियां का संकेत मात्र करके छोड़ दिया गया था। इस संस्करण में समसामयिक साहित्य का अब तक का आलोचनात्मक विवरण दे दिया गया है जिससे आज तक के साहित्य की गतिविधि का पूरा परिचय प्राप्त होगा।
आशा है कि इस संशोधित और प्रवर्धित रूप में यह इतिहास विशेष उपयोगी सिद्ध होगा।
अक्षय तृतीया संवत 1997
रामचंद्र शुक्ल
