कोसी का घटवार – शेखर जोशी | हिन्‍दी कहानी

Kosi Ka Ghatwar गुसाईं का मन चिलम में भी नहीं लगा। मिहल की छाँह से उठकर वह फिर एक बार घट (पनचक्की) के अंदर आया। अभी खप्पर में एक-चौथाई से भी

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गैंग्रीन (रोज़) – अज्ञेय | हिन्दी कहानी

Gaingreen Kahani- दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते हुए मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो, उसके वातावरण में

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लाल पान की बेग़म – फणीश्वर नाथ रेणु | हिन्दी कहानी

क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या? बिरजू की माँ शकरकंद उबाल कर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी अपने आँगन में। सात साल का लड़का बिरजू

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तीसरी क़सम उर्फ मारे गये ग़ुलफाम – फणीश्वर नाथ रेणु | हिन्दी कहानी

हिरामन गाड़ीवान की पीठ में गुदगुदी लगती है... पिछले बीस साल से गाड़ी हाँकता है हिरामन। बैलगाड़ी सीमा के उस पार मोरंगराज नेपाल से धान ..

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अपना-अपना भाग्‍य – जैनेन्द्र कुमार | हिन्दी कहानी

बहुत कुछ निरुद्देश्य घूम चुकने पर हम सड़क के किनारे की एक बेंच पर बैठ गए। नैनीताल की संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। रूई के रेशे-से भाप-से..

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आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद | हिन्‍दी कहानी

सामने जल-राशि का रजत शृंगार था। वरुण बालिकाओं के लिए लहरों से हीरे और नीलम की क्रीड़ा शैल-मालाएँ बन रही थीं और वे मायाविनी छलनाएँ अपनी

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उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी | हिन्‍दी कहानी

बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की ज़बान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्ट

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कानों में कंगना – राधिका रमण प्रसाद सिंह | हिन्‍दी कहानी

किरन अभी भोरी थी। दुनिया में जिसे भोरी कहते हैं, वैसी भोरी नहीं। उसे वन के फूलों का भोलापन समझो। नवीन चमन के फूलों की भंगी

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दुनिया का सबसे अनमोल रतन – मुंशी प्रेमचंद | हिन्‍दी कहानी

दिलफ़िगार एक कँटीले पेड़ के नीचे दामन चाक किए बैठा हुआ ख़ून के आँसू बहा रहा था। वह सौंदर्य की देवी यानी मलका दिलफ़रेब का सच्चा और जान देने

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एक टोकरी भर मिट्टी – माधवराव सप्रे | हिन्‍दी कहानी

किसी श्रीमान ज़मींदार के महल के पास एक ग़रीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी। ज़मींदार साहब को अपने महल का अहाता उस झोंपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई,

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