बिहारी सतसई – बिहारी | भाग-2 | हिन्दी कविता
खेलन सिखए अलि भलैं चतुर अहेरी मार। कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार अर्थात ऐ सखी! चतुर शिकारी कामदेव ने कानों तक आने-जानेवाले
खेलन सिखए अलि भलैं चतुर अहेरी मार। कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार अर्थात ऐ सखी! चतुर शिकारी कामदेव ने कानों तक आने-जानेवाले
मेरी भव-बाधा हरौ राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँईं परैं स्यामु हरित दुति होइ॥1॥ अर्थात वही चतुरी राधिका मेरी सांसारिक बाधाएँ...
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।। तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई
हतभाग्य हिंदू जाति! तेरा पूर्वदर्शन है कहाँ? वह शील, शुद्धाचार, वैभव देख, अब क्या है यहाँ;
उन अग्रजन्मा ब्राह्मणों की हीनता तो देख लो, भू-देव थे जो आज उनकी दीनता तो देख लो।
साहित्य का विस्तार अब भी है हमारा कम नहीं; प्राचीन किंतु नवीनता में अन्य उसके सम नहीं।
बाहर शोरगुल मचा। डोड़ी ने पुकारा— “कौन है?” कोई उत्तर नहीं मिला। आवाज़ आई—“हत्यारिन! तुझे कतल कर दूँगा!”
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