अपना-अपना भाग्‍य – जैनेन्द्र कुमार | हिन्दी कहानी

बहुत कुछ निरुद्देश्य घूम चुकने पर हम सड़क के किनारे की एक बेंच पर बैठ गए। नैनीताल की संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। रूई के रेशे-से भाप-से..

0 Comments