बैठा हूँ इस केन किनारे – केदारनाथ अग्रवाल | हिन्दी कविता
दोनों हाथों में रेती है,...नीचे, अगल-बग़ल रेती है,...होड़ राज्य-श्री से लेती है.......मोद मुझे रेती देती है
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February 12, 2026
दोनों हाथों में रेती है,...नीचे, अगल-बग़ल रेती है,...होड़ राज्य-श्री से लेती है.......मोद मुझे रेती देती है
जल का जहाज़ जैसे पल-पल डोलता ........माँझी! न बजाओ बंशी मेरा प्रन टूटता......
फागुन की मस्ती के झोंके, .....दौड़े आते हैं उड़-उड़ के,...... अंगों में, बाहों में कस के,..............उसकी मति को मंद बनाने;
मलयानिल की परछाईं-सी,.....इस सूखे तट पर छिटक छहर!... कोमल चिर कंपन-सी......