प्रस्तुत ‘गोशाला’ शब्दचित्र रामवृक्ष बेनीपुरी जी द्वारा लिखित ‘गेहुँ और गुलाब’ रेखाचित्र संग्रह में संकलित है। इस संग्रह में कुल 31 शब्दचित्र हैं। इन शब्दचित्रों में बेनीपुरी कथात्मकता को और भी गौण कर देते हैं। अनेक रचनाओं में वे किसी भी एक दृश्य का शब्दचित्र खींचते हैं और उसके सहारे अपने विचार रखते हैं। बेनीपुरी जी ने स्वयं भी पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ‘ये शब्दचित्र पिछले शब्दचित्रों से भिन्न हैं- छोटे, चलते, जीवंंत! मैंने कहा, हैंड कैमरा से स्नैप शॉट।’ ‘गेहॅुं और गुलाब’ से तात्पर्य है जीवन-संघर्षों के बीच सौंदर्य की तलाश और उसकी अनिवार्यता।
गोशाला
उस दिन रिमझिम-रिमझिम वर्षा हो रही थी।
आज स्कूल नहीं जाना होगा; गुरुजी की उस हरी-हरी खजूर की छड़ी से ही छुट्टी नहीं मिली, कभी आँगन में जाकर नाचूँगा, नहाऊँगा; कभी पानी के बुल्लों से खेलूँगा, खुश होऊँगा; और उसके बाद, गरमागरम खिचड़ी खाकर काकी की गोद में सोऊँगा !
किंतु उस वर्षा में भी देखा, मेरे गाँव के रामफल काका कीचड़ ठेलते, सिर पर छाता ओढ़े, लेकिन ज्यादातर भीगते, बढ़े जा रहे हैं—मेरे पड़ोसी अक्कल के दरवाज़े की ओर !
रामफल काका—मेरे गाँव के सबसे धनी, किंतु कंजूस !
अक्कल—एक गरीब मज़दूर, किंतु हरफ़नमौला !
“अक्कल, ज़रा चलो, भानस घर के खपड़े उघड़ जाने से समूचा घर पानी-पानी हो रहा है, खाना-पीना बन्द है; चलो, ज़रा खपड़ों को दुरुस्त कर दो—बाल-बच्चे भूखों छटपट कर रहे हैं।”
“मेरी तबीयत ठीक नहीं—माफ़ कीजिए; तबीयत अच्छी होती, तो हुकुम सिर-आँखों पर !”
अक्कल रामफल काका का काम प्रायः ही करता, किंतु उसे सबसे ज़्यादा तो इस बात की चिढ़ थी कि कंजूसी के मारे अच्छे दिनों में तो ये घर दुरुस्त नहीं कराते और इस आफ़त में जान लेने आये हैं, जैसे ग़रीब की देह देह ही नहीं ! और उसे सर्दी लग गई थी, वह रह-रहकर ढाँसता था, वह बात तो हम पड़ोसी जानते ही थे।
किंतु रामफल काका के शाम-दाम, दंड-भेद के सामने उसे झुकना ही पड़ा। फटी काली कमली ओढ़े अक्कल को मैंने रामफल काका के पीछे-पीछे जाते देखा !
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अक्कल। पाँच हाथ का लम्बा जवान। रंग—वही भारत के आदिनिवासियों का। विदेशी आर्यों के रक्त मिश्रण का प्रभाव रंग पर न पड़कर आकार पर ही पड़ा था। हट्टा-कट्टा !
जिस खेत की कोड़नी में अक्कल पहुँचा, उसके खर-पात अक्कल के नाम पर रोयें। उसकी कुदाल क्या थी—परशुराम और बलराम के कुठार और हल की खिचड़ी थी ! ऐसा ‘महीन’ जोतनेवाला हलवाहा कहाँ मिलेगा? घर बनाने-छाने में तो उस्ताद। गाँव में जितने अच्छे मकान हैं, चाहे उनकी दीवाल बनाने में या छप्पर छाने में अक्कल का कुशल हाथ ज़रूर है। रामफल काका का वह शानदार बँगला अक्कल की वास्तुविद्या के अपार ज्ञान का एक उत्कृष्ट नमूना है। अपने इन गुणों के चलते अक्कल मज़दूर होकर भी काफ़ी ख़ुशामदें पाता रहा—पैसे भी।
उसके दो बेटे और एक बेटी थी। बेटों का लालन-पालन उसने औक़ात से ज़्यादा अच्छे ढंग पर किया और बेटी को तो वह इस शान से रखता कि गाँव की ‘बबुइयाँ’ भी मन-ही-मन चिढ़तीं।
अक्कल की उदारता की चर्चा भी होती। गाँव में कभी साधु-संत आते, तो उनकी सेवा अक्कल ज़रूर करता ! वह काम करने में राक्षस था। उसकी आमदनी साधारण मज़दूरों से ज़्यादा तो थी ही; एक गाय भी पाल रखी थी और दो-तीन बकरियाँ भी। इनसे भी काफ़ी पैसे आते !
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मैं अब शहरी जीव हूँ। कभी-कभी मन बहलाने को अपने गाँव में चला जाता हूँ।
एक दिन, अपने दरवाज़े पर बैठा, मैं एक विलायती मैगज़ीन पढ़ रहा था। एक छोटी-सी रूप-कथा थी। मैं सोचता, उफ़, ये विदेशी कलाकार कैसी जीवन्त तस्वीरें खींचते हैं ! कलम है या रंगीन कूची !
“सलाम बबुआ !”
आँखें न उठीं—मैं कुछ पढ़ने में ग़र्क़ था, कुछ ग़र्क़ होने का स्वाँग भर रहा था—कुछ उपेक्षा भी थी। दिन-भर इन देहातियो के मारे परेशान जो रहता हूँ।
फिर वही आवाज़—मैंने आँखें उठाईं। एक लकुटिया और दो सूखे पैरों के सहारे, तीन टाँग के जानवर-सा झुका एक आदमी दीख पड़ा। चेहरे पर ग़ौर किया—काले चेहरे को सुफ़ेद-सुफ़ेद बालों के ठूँठ और भयानक बना रहे। गर्दन लगातार हिल रही!
“मैं हूँ बबुआ, अक्कल !”
मैं चौंक पड़ा ! क्या वही अक्कल आज ऐसा हो गया ?
बेचारा अक्कल अब भीख माँगता है। जिसने गाँव-भर को घर दिया, वही बे-घर-बार का है। एक बच्चा जाता रहा, दूसरा, शादी होते ही अपनी ससुराल चल दिया। बेटी तो पराये की होती ही है ! उसकी प्यारी पत्नी बुधनी भी चल बसी है! कोई काम-धाम उससे बन पड़ता नहीं। इतनी कमाई तो कभी हुई नहीं कि इतना संग्रह कर पाता कि इन बुरे दिनों को सुख-चैन से काटता। सिवा भीख के दूसरा चारा क्या?
और, भीख भी क्या सदा मिलती ही है ? भूख-प्यास का मारा अक्कल यह हड्डी का ढाँचा बन रहा है !
“बबुआ, मैं आपसे भीख माँगने नहीं आया, एक नालिश करने आया हूँ—बबुआ, तुम्हीं निसाफ़ करो, तो हो; नहीं तो रामफल बाबू के ख़िलाफ़ कौन जीभ खोले ?”
अक्कल ने कथा सुनाई। किस तरह ज़िंदगी के उठान के समय उसने अपनी पूरी शक्ति रामफल बाबू को मज़दूरी में दी, किस तरह कितनी ही परती ज़मीन को उसने उनके लिए हरा-भरा खेत बना डाला; किस तरह उसने उनके पशुधन की वृद्धि की; किस तरह उसने उनके ये मकान बनाए, जिन पर पड़ोस के बड़े-बड़े बाबुओं को ईर्ष्या होती है, लेकिन—
लेकिन, और बातें जाएँ जहन्नुम में; अक्कल के साथ आज एक महान् अन्याय किया गया था। जाड़े का दिन—दिन नहीं, रात। न घर, न कपड़ा। रामफल काका के दरवाज़े पर एक बड़ा
‘घूर’ लगता है। बेचारा अक्कल दिन-भर भीख माँगता, रात में उनके पुआल के टाल में घुसकर सो जाता और जब कभी जाड़ा लगता, उनके घूर में जाकर आग तापता। किंतु आज रामफल काका ने उसे वहाँ से निकाल दिया है। क्यों ? क्योंकि वह रातभर ताप-तापकर आग ख़त्म कर देता है और खाँस-खाँसकर चारों ओर थूक-थूक कर डालता है !
“बबू, ज़िंदगी-भर उनकी सेवा की। इस बुढ़ापे में खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता, घर-दुआर देने से रहे, क्या घूर की आग से भी मुझे महरूम किया जाना चाहिए?” यह थी उसकी दलील। मैं क्या जवाब देता ? मेरी आँखों में बचपन का बरसात वाला वह दृश्य नाच उठा ! आँखों की बरसात ने शायद उत्तर देना चाहा !
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शहर में गोशाला का उत्सव था। मैं उसमें शामिल होकर, अपने गाँव की ओर जा रहा था।
मुझे ख़ुशी हो रही थी, गोशाला के संबंध में मेरे गाँव की भी चर्चा हुई थी। रामफल काका ने दो गाड़ी पुआल गोशाला के लिए दिया था। गोशाला के मंत्री ने इसका उल्लेख किया था।
गोशाला—बूढ़ी अपाहिज गौओं, बैलों की रक्षा के लिए कितना सुन्दर प्रबन्ध! चाहिए भी; भला जिन गौओं ने हमें ज़िंदगी-भर दूध और बछवे दिये, जिन बैलों ने अपनी हड्डियाँ घुलाकर ज़मीन को ज़र-खेज़, अन्न की राशियाँ दीं, उनके बुढ़ापे का तो कोई प्रबन्ध होना चाहिए ! गोशाला, मनुष्य की मनुष्यता का एक सुन्दर प्रतीक !
यों ही साइकिल सरसराता, सोचता चला जा रहा था कि रास्ते में एक झुकी हुई आदमी की सूरत-सी दीख पड़ी। यह अक्कल ! कहाँ चले अक्कल ?
“गाँव में अब गुज़र नहीं होती, बबुआ ! जा रहा हूँ, कहीं माँग-मूँगकर खाऊँगा और राम-नाम लेते…”
अक्कल की आँखों से बड़े-बड़े बिल्लौरी दाने गिर रहे थे ! वे धँसी आँखें मानो चिर-संचित मुक्ताओं को उगल रही थीं !
अक्कल अपने गाँव को सदा के लिए छोड़कर जा रहा है। कहाँ ? जहाँ कहीं भी उसे पेट के खड्ड भरने के लिए एक मुट्ठी अन्न और इस शरीर के पसारने के लिए तीन हाथ ज़मीन मिल जाए।
मनुष्य ने बूढ़े पशुओं के लिए गोशालाएँ बनवाईं; किंतु बूढ़े मनुष्यों के लिए? रामफल चाचा को बूढ़ी गायों से इतनी मुहब्बत और उस बूढ़े आदमी के लिए, जिसके…?

