बिहारी सतसई – बिहारी | भाग-2 | हिन्दी कविता

बिहारी सतसई
(भाग-2)

बिहारी सतसई के दोहे (50 से 100 तक )

खेलन सिखए अलि भलैं चतुर अहेरी मार।
कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार॥51॥

अलि = सखी। अहेरी = शिकारी। मार = कामदेव। कानन-चारी = कानों तक आने-जानेवाले, वन में विहारनेवाले। नागर = चतुर, शहरी। नरनु = पुरुषों का।

ऐ सखी! चतुर शिकारी कामदेव ने कानों तक आने-जानेवाले (वन में विहार करने वाले) तुम्हारे नेत्र-रूपी हिरनों को चतुर नागरिक पुरुषों का शिकार करना भली भाँति सिखलाया है।

नोट: हिरनों से आदमियों का शिकार कराना-वह भी ठेठ देहाती गँवार आदमियों का नहीं, छैल-चिकनिये चतुर नागरिकों का!-कवि की अनूठी रसिकता प्रदर्शित करता है।

अर तैं टरत न बर परे दई मरक मनु मैन।
होड़ा-होड़ा बढ़ि चले चितु चतुराई नैन॥52॥

अर तैं = हठ से। टरत = टरते हैं, डिगते हैं। बर परे = बल पकड़ता है। दई = दिया हो। मरक = बढ़ावा। मैन = कामदेव। होड़ा-होड़ी = बाजी लगाकर, शर्त बदकर, प्रतिद्वन्द्विता, प्रतिस्पर्धा।

(नायिका के) चित्त की चतुराई और उसकी आँखें बाजी लगाकर बढ़ चली हैं-जिस प्रकार आँखें बड़ी-बड़ी होती जा रही हैं उसी प्रकार उसकी चतुराई भी बढ़ी चली जाती है। वे (चतुराई और आँखें) अपने हठ से नहीं डिगतीं, वरन् (वह हठ) और भी बल पकड़ता जाता है, मानो कामदेव ने उन्हें (इस प्रतिद्वन्द्विता के लिए) बढ़ा दे दिया हो, ललकार दिया हो।

सायक सम मायक नयन रँगे त्रिविध रँग गात।
झखौ बिलखि दुरि जात जल लखि जलजात लजात॥53॥

सायक = सायंकाल। मायक = माया जाननेवाला, जादूगर। त्रिबिध = तीन प्रकार। गात = शरीर। झखौ = मछली भी। विलखि = संकुचित या दुखी होकर। जलजात = कमल।

संध्याकाल के समान मायावी आँखें अपनी देहों को तीन रंगों में रँगे हुई हैं। उन्हें देखकर मछली भी संकुचित हो जल में छिप जाती है और कमल लज्जित हो जाते हैं।

नोट – नेत्रों में लाल, काले और उजले रंग होते हैं। देखिये –

अमिय हलाहल मद भरे, स्वेत स्याम रतनार।
जियत मरत झुकि-झुकि गिरत, जिहि चितबत इक बार॥

जोग-जुगुति सिरघए सबै मनो महामुनि मैनु।
चाहतु पिय-अद्वैतता काननु सेवतु नैनु॥54॥

जोग = मिलन, योग। मनो = मानों। जुगुतु = युक्ति, उपाय। मैनु = कामदेव। पिय = प्रीतम, ईश्वर। अद्वैतत = मिलन, अभेद-भाव, अभिन्नता। काननु = कानों, जंगल। सिखये = सिखा दिया।

मानो महातपस्वी कामदेव ने योग (मिलन) की सारी युक्तियाँ बता दी हैं। इसीसे (उस नायिका के नेत्र) प्रीतम (ईश्वर) से सदा मिले रहने के लिए कानों तक बढ़ आये हैं, (वियोग-रहित अनन्त मिलने के लिए) वन-सेवन कर रहे हैं।

वर जीते सर मैन के ऐसे देखे मैं न।
हरिनी के नैनानु तैं हरि नीके ए नैन॥55॥

बर = बलपूर्वक। मैन = कामदेव। मैं न = मैं नहीं।

इन नेत्रों ने कामदेव के (अचूक) बाणों को भी बलपूर्वक जीत लिया है। मैंने तो ऐसे नेत्र (कभी) देखे ही नहीं। हे कृष्ण! हरिणियों के नैन से भी ये नेत्र सुन्दर हैं।

नोट – खंजन कंज न सरि लहै बलि अलि को न बखान।
एनी की अँखिपान ते नीकी अँखियान। – शृंगार-सतसई

संगति दोपु लगै सबनु कहे ति साँचे बैन।
कुटिल बंक भु्रब संग भए कुटिल बंक गति नैन॥56॥

भु्रव = भँवें, भौंहें। कुटिल गति = टेढ़ी चालवाली। ति = सचमुच।

संगति का दोष सबको लगता है, सचमुच यह बात सच्ची कही गई है। तिरछी टेढ़ी भँवों की संगति से आँखें भी टेढ़ी और तिरछी चालवाली हो गई!

आन = दूसरा। विषम = भयंकर, कठोर। ईछन = ईक्षण = नेत्र। तीछन = तीक्ष्ण = तेज, चोखे, कँटीले।

लगते हैं आँखों में, बेधत हैं हृदय को और व्याकुल करते हैं अन्य अंगों को-सारे शरीर को! ये तुम्हारे नेत्र-रूपी तीखे-चोखे बाण सबसे भयंकर हैं।

झूठे जानि न संग्रहे मन मुँह निकसे बैन।
याही तैं मानहु किये बातनु कौं बिधि सैन॥58॥

सैन = इशारा। बैन = वचन। संग्रहै = संचय करता है। याही तैं = इसी लिए। बिधि = ब्रह्मा।

मुँह से निकले हुए वचनों को झूठा समझकर मन संग्रह नहीं करता- प्रमाण नहीं मानता। मानो इसी कारण (हृदय की) बातें करने के लिए ब्रह्मा ने नेत्रों के इशारे बनाये।

फिरि फिरि दौरत देखियत निचले नैंकु रहे न।
ए कजरारे कौन पर करत कजाकी नैन॥59॥

निचले = निश्चल, स्थिर। नेकु = जरा भी। कजरारे = काजल लगाये हुए। कजाकी = (कजा = मृत्यु) हत्यारापन, लुटेरापन, लूटमार।

बार-बार दौड़ते हुए दीख पड़ते हैं, जरा भी स्थिर नहीं रहते। (तुम्हारे) ये काजल लगे हुए नेत्र किसपर डाक डाल रहे हैं- किसकी हत्या करने के लिए इधर-उधर दौड़ लगा रहे हैं?

खरी भीरहू भेदिकै कितहू ह्वै उत जाइ।
फिरै डीठि जुरि डीठि सों सबकी डीठि बचाइ॥60॥

खरी = भारी। भेदिकै = पार करके। कितहू ह्वै = किसी ओर से होकर। उत = वहाँ। डीठि = नजर। जुरि = मिलकर। डीठि बचाइ = आँखें बचाकर।

भारी भीड़ को भी भेद कर, और किसी ओर से भी वहाँ (नायक के पास) पहुँचकर, नायिका की नजर, सबकी आँखें बचा, उसकी (नायिका की) नजर से मिल कर, फिर (साफ कन्नी काटकर) लौट आती है।

सबही त्यौं समुहाति छिनु चलति सबनु दै पीठि।
बाही त्यौं ठहराति यह कविलनबी लौं दीठि॥61॥

समुहाति = सामना करना, टकराना। कविलनबी = कम्पास के समान एक प्रकार का यंत्र, जिसकी सूई सदा पश्चिम की ओर रहती है, चोर पकड़ने की वह कटोरी जो मंत्र पढ़कर चलाई जाती है। चलति सबनि दै पीठि = सबका तिरस्कार करती चली जाती है।

किबलनुमा की सूई के समान उसकी यह नजर सभी के शरीर से क्षणभर के लिए टकराती है, फिर सभी से विमुख होकर चल पड़ती है, और उसके-अपने प्रेमिक के – रूप पर आकर ठहरती है।

कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात॥62॥

कहत = कहते हैं, इच्छा प्रकट करते हैं। नटत = नाहीं-नाहीं करते हैं। रीझत = प्रसन्न होते हैं। खिझत = खीजते हैं, रंजीदा होते हैं, रंजीदा होते हैं। खिलत = पुलकित होते हैं। लजियात = लजाते हैं।

कहते हैं, नाहीं करते हैं, रीझते हैं, खीजते हैं, मिलते हैं, खिलते हैं और लजाते हैं। (लोगों से) भरे घर में (नायक-नायिका) दोनों ही, आँखों ही द्वारा बातचीत कर लेते हैं।

सब अंग करि राखी सुधर नाइक नेह सिखाइ।
रस-जुत छेत अनत गति पुतरी-पातुर राइ॥ 63॥

अँग = प्रकार। सुघर = सुचतुर, सुदक्ष। नाइक = नाचना-गाना सिखानेवाला उस्ताद। पातुर = वेश्या। ‘राय’ वेश्याओं की उपाधि- जैसे प्रवीणराय वेश्या, जो केशवदास की साहित्यिक चेली थी। रस-जुत = रसीले। लेत अनन्त गति = अनेक प्रकार के पैंतरे और काँटछाँट करती है, तरह-तरह की भावभंगी ले थिरकती है।

प्रेम-रूपी उस्ताद ने सिखाकर उसे सब प्रकार से सुदक्ष बना रक्खा है। (फलतः वह आँखों की) पुतली-रूपी वेश्या रसों से भरे हुए नाना प्रकार के हाव-भाव दिखा रही है।

कंज नयनि मंजनु किये बैठी व्यौरति बार।
कच अँगुरी बिच दीठि दै चितवति नन्दकुमार॥64॥

ब्यौरति = सुलझाती है। कच = बाल, केश। दीठि = दृष्टि, नजर।

कमलनयनी (नायिका) स्नान कर बैठी हुई अपने बालों को सुलझा रही है और बालों तथा अँगुलियों के बीच से कृष्णजी को देखती भी है। (लोग जानते हैं कि वह बाल सँवार रही है, इधर बालों और उँगलियों के बीच इशारे चल रहे हैं!)

डीठि-बरत बाँधी अटनु चढ़ि धावत न डरात।
इतहिं-उतहिं चित दुहुन के नट-लौं आवत-जात॥65॥

ठीठि = नजर। बरत = रस्सी। अटनि = कोठे। लौं = समान।

कोठों पर बँधी दृष्टि-रूपी रस्सी पर चढ़कर दौड़ते हैं, (जरा भी) डरते नहीं। दोनों के चित्त नट के समान इधर-से-उधर (बेधड़क) आते-जाते हैं।

नोट – प्रेमिक और प्रेमिका अपनी-अपनी अटारी पर खड़े आँखें लड़ा रहे हैं। कवि ने उसी समय की उनके चित्त की दिशा का वर्णन किया है।

जुरे दुहुन के दृग झमकि रुके न झीनैं चीर।
हलुकी फौज हरौल ज्यौं परै गोल पर भीर॥66॥

झीने = महीन, बारीक। चीर = साड़ी। हरौल = हरावल, सेना का अग्रभाग। गोल = सेना का मुख्य भाग। झमकि = उछलकर या नाचकर। भीर = चोट, हमला।

दोनों की आँखें ललक के साथ बढ़कर जुट गईं, बारीक साड़ी (के घूँघट) में वे न रुकीं, जिस प्रकार सेना के अग्रभाग में हलकी फौज रहने से मुख्य भाग पर ही भीड़ आ पड़ती है।

लीनैं हूँ साहस सहसु कीनैं जतनु हजारु।
लोइन लोइन-सिंधु तन पैरि न पावत पारु॥67॥

लोइन = आँख। लोइन = लावण्य, सुन्दरता। पैरि = तैरकर।

हजार यत्न करने और हजार साहस रखने पर भी ये आँखे (तुम्हारे) शरीर-रूपी लावण्य-सागर को तैरकर पार नहीं पा सकतीं-तुम्हारा शरीर इतने अगाध-लावण्य से परिपूर्ण है!

पहुँचति डटि रन-सुभट लौं रोकि सकैं सब नाहिं।
लाखनुहूँ की भीर मैं आँखि उहीं चलि जाहिं॥68॥

रन-सुभट = लड़ने में वीर।

लड़ाई के वीर योद्धा के समान डटकर पहुँच जाती हैं-लोग उन्हें नहीं रोक सकते। लाखों की भीड़ में भी (उसकी) आँखें उस (नायक की) ओर चली ही जाती हैं।

गड़ी कुटुम की भीर मैं रही बैठि दै पीठि।
तऊ पलकु परि जाति इत सलज हँसौंही डीठि॥69॥

पलकु = पल+एकु = एक पल के लिए। इत = यहाँ, इस ओर। हँसौंही = प्रसन्न, विनोदिनी।

कुटुम्ब की भाड़ में गड़ी हुई-चारों ओर से परिवारवालों से घिरी हुई- (वह नायिका नायक की ओर) पीठ देकर बैठी है। तो भी एक क्षण के लिए (उसकी) लजीली और विनोदिनी दृष्टि इसकी ओर पड़ ही जाती है।

भौंह उँचै आँचरु उलटि मौरि मोरि मुँह मोरि।
नाठि-नीठि भीतर गई दीठि दीठि सों जोरि॥70॥

उँचै = ऊँचा करके। मोरि = मौलि, सिर। मोरि = झुकाकर। नीठि-नीठि = जैसे तैसे, मुश्किल से। नीठि नीठि गई = मुश्किल से धीरे-धीरे गई।

भौंह ऊँची कर, आँचर उलट, सिर झुका और मुँह मोड़कर (वह नायिका) नजर-से-नजर मिलाती हुई धीरे-धीरे (घर के) भीतर (चली) गई।

ऐंचति-सी चितवनि चितै भई ओट अलसाइ।
फिर उझकनि कौं मृगनयनि दृगनि लगनिया लाइ॥71॥

ऐंचति-सी = खींचती हुई-सी, चित्ताकर्षक, चितचोर। चितबनि = दृष्टि, नजर। चितै = देखकर। दृगनि = आँखों का। लगनिया = लगन, चाट। अलसाइ = जँभाई लेकर, उभाड़ दिखाकर अथवा मन्द गति से।

(चित्त को) खींचती हुई-सी नजरों से देख वह अलसाकर (आँख से) ओट तो हो गई; किन्तु उस मृगनयनी ने (उस समय से) बार-बार उझक-उझककर देखने की लगन (मेरी) आँखों में लगा दी-तब से बार-बार मैं उझक-उझककर उसकी बाट जोह रहा हूँ।

सटपटाति-सी ससिमुखी मुख घूँघट-पटु ढाँकि।
पावक-झर-सी झमकिकै गई झरोखौ झाँकि॥72॥

पावक झर = आग की लपट। सटपटाति-सी = डरती हुई-सी। झमकिकै = नखरे की चाल से, गहनो की झनकार करके, चपलता से।

डरती हुई-सी-वह चन्द्रबदनी (अपने) मुख को घूंघट से ढँककर अग्नि की लपट-सरीखी चंचलता के साथ झरोखे से झाँक गई।

नोट – भाव यह है कि अपने गुरुजनों के डर से वह मुख पर आँचल डालकर झटपट खिड़की पर आई और (नायक को) देखकर चली गई।

लागत कुटिल कटाच्छ सर क्यौं न होहिं बेहाल।
कढ़त जि हियहिं दुसाल करि तऊ रहत नटसाल॥73॥

कुटिल = तिरछे, टेढ़े। कटाक्ष = तीक्ष्ण दृष्टि, बाँकी-तिरछी नजर। कढ़त = निकलना। हियो = हृदय। दुसाल = दो भाग, आरपार। तऊ = तो भी। नटसाल = काँटे का वह हिस्सा जो काँटा निकाल लेने पर भी टूटकर अन्दर ही रह जाता है।

तिरछे कटाक्ष-रूपी (चोखे) बाण के लगने से (लोग) क्यों न व्याकुल हों? यद्यपि (बाण) हृदय को आरपार करके निकल जाता है, तथापित उसकी नुकीली गाँसी की कसक (पीड़ा) रह ही जाती है।

नैन-तुरंगम अलग-छबि-छरी लगी जिहिं आइ।
तिहिं चढ़ि मन चंचल भयौ मति दीनी बिसराइ॥74॥

तुरंगम = चंचल घोड़ा। अलग = लट। छरी = कोड़ा। बिसराय दीनी = बिस्मृत कर दिया, भुला दिया।

नेत्र-रूपी घोड़े, जिन्हें लट की शोभा-रूपी छड़ी आकर लगी है- जो नायिका की लट-रूपी चाबुक खाकर उत्तेजित हुए हैं- उन (नेत्र-रूपी घोड़ों) पर चढ़कर मेरा मन चंचल हो गया है और उसने मेरी बुद्धि नष्ट कर दी है।

नीचीयै नीची निपट दीठि कुही लौं दौरि।
उठि ऊँचै नीचै दियौ मन-कुलंग झपिझोरि॥75॥

निपट = एकदम। डीठि = दृष्टि, नजर। कुही = एक पक्षी, जो बाज की जाति का होता है। लौं = समान। कुलंग = कलबिंक = चटका = गोरैया, बगेरी। उठि ऊँचै चढ़ मेरे मन-रूपी कुलंग को छोपकर और झोरकर नीचे गिरा दिया।

नोट – कुही पक्षी शिकार को पकड़ने के लिए पहले तो नीचे-ही-नीचे उड़ता है, फिर एकबारगी ऊपर उड़ श्किार पर भीषण रूप से टूट पड़ता और उसे झकझोर नीचे गिरा देता है। लज्जाशीला नायिका की उड़नबाज नजर की भी यही गति है-रसज्ञ पाठक जानते हैं!

तिय कित कमनैती पढ़ी बिनु जिहि भौंह-कमान।
चल चित-बेझैं चुकति नहिं बंक बिलोकनि बान॥76॥

कित = कहाँ। कमनैती = तीर चलाने की कला, बाण-विद्या। जिहि = ज्या = डोरी, प्रत्यंचा। चल = चंचल। बेझै = निशान, लक्ष्य, लक्ष्य। बंक = टेढ़ा। बिलोकनि = चितवन, दृष्टि।

इस स्त्री ने यह बाण-विद्या कहाँ पढ़ी कि बिना डोरी के भौंह रूपी धनुष और तिरछी दृष्टि-रूपी बाण से चंचल चित्त-रूपी निशाने को बेधने से नहीं चूकती?

दूज्यौ खरै समीप कौ लेत मानि मन मोदु।
होत दुहुन के दृगनु हीं बतरसु हँसी-विनोदु॥77॥

(नायक-नायिका दोनों) दूर-दूर खड़े होने पर भी निकट होने का आनन्द मन में मान लेते हैं-यद्यपि दोनों दूर-दूर खड़े हैं तथापित निकट रहकर सम्भाषण करने का आनन्द अनुभव कर रहे हैं; क्योंकि दोनों की आँखों (इशारों) से ही रसीली बातचीत, दिल्लगी और चुहल हो रही है।

छुटै न लाज न लालचौ प्यौ लखि नैहर-गेह।
सटपटात लोचन खरे भरे सकोच सनेह॥78॥

प्यौ = प्रियतम। खरे = अत्यन्त। नैहर = मायके, पीहर। सटपटात = विक्षिप्त, बेचैन हो रहे हैं।

पति को अपने मायके में देखकर न तो (उन्हें भर नजर देखने के लिए) लाज छूटती है और न (देखने का) लालच ही छोड़ते बनता है। यों संकोच और प्रेम से परिपूर्ण उस नायिका के नेत्र अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं।

नोट – इस दोहे में स्वाभाविकता खूब है।

करे चाह-सौ चुटकि कै खरै उड़ौहैं मैन।
लाज नवाएँ तरफरत करत खूँद-सी नैन॥79॥

चुटकि कै = चाबुक मारकर। उड़ौहैं = उड़ाकू, उड़ान भरनेवाला। मैंन = कामदेव। खूँद = जमैंती, घोड़े की ठुमुक चाल।

कामदेव ने चाह का चाबुक मारकर नेत्रों को बड़ा उड़ाकू बना दिया है। किन्तु लाज (लगाम) से रोके जाने के कारण उसके नेत्र (रूपी-घोड़े) तड़फड़ाकर जमैती-सी कर रहे हैं।

नोट – जब घोड़े को जमैती सिखाई जाती है, तब एक आदमी पीछे चाबुक फटकारकर उसे उत्तेचित करता रहता है और दूसरा आदमी उसकी लगाम कसकर पकड़े रहता है। यों घोड़ा पीछे की उत्तेजना और आगे की रोकथाम से छटपटाकर जमैती करने लगता है।

नाबक-सर-से लाइकै तिलकु तरुनि इत ताँकि।
पावक-झर-सी झमकिकै गई झरोखा झाँकि॥80॥

तिलकु = टीका। तरुनि = नवयुवती। पावक-झर = आग की लपट। झरोखा = खिड़की। झमकिकै = चंचल चरणों से। नावक-सर = एक प्रकार का छोटा चुटीला तीर, जो बाँस की नली के अंदर से चलाया जाता है, ताकि सीधे जाकर गहरा घाव करे।

चुटीले तीर के समान (ललाट पर) तिलक लगाकर उस नवयुवती ने इस ओर देखा और आग की ज्वाला-सी चंचलता के साथ खिड़की से झाँक गई।

नोट – ‘नावक के तीर’ बिहारी के दोहों के विषय में प्रसिद्ध है-

सतसैया के दोहरे जनु नावक के तीर।
देखत में छोटे लगैं बेधैं सकल सरीर॥

अनियारे दीरघ दृगनु कितीं न तरुनि समान।
वह चितबनि औरे कछू जिहिं बस होत सुजान॥81॥

अनियारे = नुकीली। दीरघ = बड़ी। दृगनु = आँखें। जिहिं = जिसके। सुजान = रसिक।

कितनी युवतियों की नुकीली और बड़ी-बड़ी आँखें एक-सी नहीं हैं- बहुत-सी युवतियों की आँखें बड़ी-बड़ी और नुकीली हैं-किन्तु रसिक-जन को वशीभूत करनेवाली वह रसीली नजर कुछ और ही होती है!

चमचमात चंचल नयन बिच घूँघट-पट झीन।
मानहु सुरसरिता-विमल-जल उछरत जुग मीन॥82॥

घूँघट-पट = घूँघट का कपड़ा। झीन = बारीक, महीन। सुरसरिता = गंगा। जुग = दो। मीन = मछली। उछरत = उछलती है।

बारीक कपड़े के घूँघट की ओट से (उसकी) चंचल आँखें चमक रही हैं- झलक रही हैं, मानों गंगाजी के स्वच्छ जल में दो मछलियाँ उछल रही हैं।

फूले फदकत लै फरी पल कटाच्छ करबार।
करत बचावत बिय नयन पाइक घाइ हजार॥83॥

फूले = उमंग से मरकर। फदकत = पैंतरें बदलते हैं। फरी = ढाल। पल = पलक। करबार = फरबाल = तलवार। बिय = दोनों। पाइक = पैदल सिपाही। घाइ = घाव, धार।

(उसके) दोनों नेत्र-रूपी सिपाही पलक-रूपी ढाल और कटाक्ष-रूपी तलवार लेकर सानन्द पैंतरे बदलते तथा हजारों वार करते और बचाते हैं।

जदपि चबाइनु चीकनी चलति चहूँ दिसि सैन।
तऊ न छाड़त दुहुन के हँसी रसीले नैन॥84॥

चबाइनु चीकनी = निंदा से भरी। तऊ = तो भी। सैन = इशारे। हँसी = उमंग भरी छेड़छाड़।

यद्यपि उसपर चारों ओर से निंदा-भरे इशारे चल रहे हैं- लोग इशारे कर-करके उसकी निंदा कर रहे हैं-तो भी दोनों की रसीली आँखें हँसी (चुहलबाजी) नहीं छोड़तीं।

जटित नीलमनि जगभगति सींक सुहाई नाँक।
मनौ अली चंपक-कली बसि रसु-लेतु निसाँक॥85॥

जटित = जड़ी हुई। नीलमनि = नीलम! सींक = स्त्रियों की नाक में पहनने का एक आभूषण विशेष, जिसे लौंग या छुच्छी भी कहते हैं। निसाँक = निःशंक, बेधड़क। रसु लेतु = आनन्द लूट रहा है, रस चूस रहा है।

नीलम से जड़ी लौंग (उसकी) सुन्दर नाक में जगमग करती है, मानो भौंरा चम्पा की कली पर निःशंक बैठकर रस पी रहा हो।

नोट – गोरी की नाक चम्पा की कली है, पीलम-जड़ी लौंग भौंरा है। भौंरा चम्पा के पास नहीं जाता; पर कवि ने असम्भव को सम्भव कर दिया है।

बेधक अनियारे नयन बेधत करि न निषेधु।
बरबट बेधत मो हियौ तो नासा कौ बेधु॥86॥

बेधक = बेधनेवाला। अनियारे = नुकीले। निषेध = रुकावट। बेधु = छेद, छिद्र। नासा = नाक। बरबट = अदबदाकर, जबरदस्ती।

चुभीली नुकीली आँखें यदि हृदय को छेदती हैं, तो छेदने दे, उन्हें मना मत कर (वे ठहरीं चुभीली नुकीली, बेधना तो उनका काम ही है); क्योंकि तेरी नाक का बेध-लौंग पहनने की जगह का छेद-मेरे हृदय को बरबस बेध रहा है- जो स्वयं बेध है, वही बेध रहा है, तो फिर बेधक क्यों न बेधे?

जदपि लौंग ललितौ तऊ तूँ न पहिरि इकआँक।
सदा साँक बढ़ियै रहै रहै चढ़ी-सी नाँक॥87॥

ललितौ = सुन्दर। इकआँक = निश्चय। साँक बढ़ियै रहै = डर बना रहता है। रहै चढ़ी-सी नाक = नाक चढ़ी रहना, क्रुद्ध या रुष्ट होना।

यद्यपि लौंग (देखने में) अत्यन्त सुन्दर है, तो भी तू निश्चय उसे न पहन; (क्योंकि उसके पहनने से) तेरी नाक सदा चढ़ी-सी रहती है, जिससे मेरे मन में सदा भय की वृद्धि होती है (कि तू शायद क्रुद्ध तो नहीं है)!

बेसरि मोती दुति-झलक परी ओठ पर आइ।
चूनौ होइ न चतुर तिय क्यों पट पोंछयो जाइ॥88॥

पट = कपड़ा। बेसरि = नाक की झुलनी, बुलाक।

बेसर में लगे हुए मोती की आभा की (सफेद) परिछाँई तुम्हारे ओठों पर आ पड़ी है। हे सुचतुरे! वह चूना नहीं है (तुमने जो पान खाया है, उसका चूना होठों पर नहीं लगा है), फिर वह कपड़े से कैसे पोंछी जा सकती है?

नोट – नायिका के लाल-लाल होठों पर नकबेसर के मोती की उजली झलक आ पड़ी है, उसे वह भ्रमवश चूने का दाग समझकर बार-बार पोंछ रही है; किन्तु वह मिटे तो कैसे?

इहिं द्वैहीं मोती सुगथ तूँ नथ गरबि निसाँक।
जिहिं पहिरैं जग-दृग ग्रसति लसति हँसति-सी नाँक॥89॥

सुगथ = सुन्दर पूँजी। गरबि = अभिमान कर ले। हँसति-सी लसति = सुघड़ जान पड़ती है। ग्रसति = फँसाती है।

अरे नथ! तू इन दो ही मोतियों की पूँजी पर निःशंक होकर गर्व कर ले; क्योंकि तुझे पहनकर (उस नायिका की) नाक हँसति-सी (सुन्दर शोभासम्पन्न) दीख पड़ती है और संसार की आँखों को फाँसती है।

नोट – एक उर्दू कवि ने कहा है-‘नाक में नथ वास्ते जीनत के नहीं। हुस्न को नाथ के रक्खा है कि जाये न कहीं! जीनत = खूबसूरती। हुस्न = सौन्दर्य।

वेसरि-मोती धनि तुही को बूझै कुल जाति।
पीवौ करि तिय-अधर को रस निधरक दिन-राति॥90॥

अरे बेसर में गुँथ हुआ मोती! तू ही धन्य है। (भाग्यवान्) कुल और जाति कौन पूछता है? (अलबेली) कामिनियों के (सुमिष्ट) अधरों का रस तू निर्भयता-पूर्वक दिन-रात पिया कर।

नोट- ‘को बूझै कुल जाति’ से यह मतलब है कि मोती तुच्छ सीप कुल से पैदा हुआ है, तो भी उसे ऐसा सुन्दर सौभाग्य प्राप्त है, जिसके लिए कितने कुलीन नवयुवक तरसते रहते हैं!

बरन बास सुकुमारता सब बिधि रही समाइ।
पँखुरी लगी गुलाब की गात न जानी जाइ॥91॥

(नायिका की) देह पर लगी गुलाब की पँखुरी पहचानी नहीं जाती-विलग नहीं देख पड़ती; क्योंकि उसका रंग और उसकी सुगन्ध तथा कोमलता गाल के रंग, सुगन्ध और कोमलता में एकदम मिल-सी गई है।

लसत सेत सारी ढप्यौ तरल तव्यौना कान।
पव्यौ मनौ सुरसरि-सलिल रबि-प्रतिबिम्बु बिहान॥92॥

तरल = चंचल। बिहान = प्रातःकाल।

उजली साड़ी से ढँका हुआ उसके कान का चंचल कर्णफूल ऐसा सोह रहा है, मानो गंगा के उज्ज्वल जल में प्रातः काल के सूर्य का (सुनहला) प्रतिबिम्ब आ पड़ा हो।

नोट – यहाँ सोने का कर्णफूल प्रातःकाल का सूर्य है, और साड़ी गंगा का स्फटिक-सा स्वच्छ जल।

सुदुति दुराई दुरति नहिं प्रगट करति रति-रूप।
छुटैं पीक औरै उठी लाली ओठ अनूप॥93॥

सुदुति = सुद्युति = सुन्दर कान्ति। रति-रूप = रति का रूप, कामदेव की स्त्री ‘रति’ अत्यन्त सुन्दर कही जाती है; अतएव यहाँ ‘रति-रूप’ से अर्थ है सौन्दर्य का अत्यन्त आधिक्य। दुराई = छिपाये।

सुन्दर कान्ति छिपाने से नहीं छिपती, वरन् (ऐसी चेष्टा करने पर) वह और भी अपरूप सौंदर्य प्रकट करती है। पान की पीक (या लाली) छुड़ाये जाने पर ओठों की अनुपम लाली और भी बढ़ गई है।

नोट – नायिका अपने ओठ की ललाई को पान की लाली समझकर बार-बार उसे छुड़ा रही है; किन्तु ज्यों-ज्यों पान की लाली छुटती है, त्यों-त्यों उसके ओठ की स्वाभाविक लाली और भी खिलती जाती है।

कुच-गिरि चढ़ि अति थकित ह्वै चली डीठि मुँह-चाड़।
फिरि न टरी परियै रही परी चिबुक की गाड़॥94॥

कुच = स्तन। डीठि = दृष्टि = नजर। चाड़ = चाह। परियै रही = पड़ी रही। चिबुक = ठुड्डी। गाड़ = गढ़ा।

स्तन-रूपी (ऊँचे) पर्वत पर चढ़, अत्यन्त थककर, दृष्टि-मुख (देखने) की चाह में (आगे) चली। (किन्तु रास्ते में ही) ठुड्डी के गढ़े में वह (इस प्रकार) जा गिरी कि (उसी में) उड़ी रह गई, (वहाँ से) पुनः (इधर-उधर) टली नहीं।

नोट – ‘चिबुक की गाड़’ पर एक संस्कृत कवि की उक्ति का आशय है कि ब्रह्मा ने सुन्दरी स्त्री को जब पहले-पहल बनाया, तब उसके रूप पर आप ही इतने मुग्ध हुए कि ठुड्डी पकड़कर भर-नजर देखने लग गये। उसी समय कच्ची मूर्त्ति की ठुड्डी उनके अँगूठे से दब गई। वही गढ़ा हो गया!

ललित स्याम-लीला ललन चढ़ी चिबुक छबि दून।
मधु छाक्यो मधुकर पर्‌यौ मनौ गुलाब-प्रसून॥95॥

ललित = सुन्दर। स्याम-लीला = गोदने की बिन्दी। दून = दूना। मधु छाक्यौ = रस पीकर तृप्त। मधुकर = भौंरा। प्रसून = फूल।

सुन्दर गोदने की (कोली) बिन्दी से, हे ललन! उसकी (गुलाबी) ठुड्डी की शोभा दूनी बढ़ गई है, (जान पड़ता है) मानो मधु पीकर मस्त भौंरा गुलाब के फूल पर (बेसुध) लेटा हुआ है।

नोट – ‘पद्माकर’ के इसी भाव के एक कवित्त का पद है- ‘कैधों अरबिन्द में मलिन्दसुत सोयो आय, गरक गोविन्त कैधों गोरी की गुराई मकें।’ अपने ‘तिल-शतक’ में मुबारक कवि तिल को यों प्रणाम करते हैं-

गोरे मुख पर तिल लसै, ताको करौं प्रणाम।
मानहु चंद बिछाय के पौढ़े सालीग्राम॥

डारे ठोढ़ी-गाड़ गहि नैन-बटोही मारि।
तिलक-चौंधि मैं रूप-ठग हाँसी-फाँसी डारि॥96॥

ठोढ़ी = ठुड्डी, चिबुक। चिलक = चमक, कान्ति।

(शरीर की) कान्ति की चकाचौंध में सौन्दर्य-रूपी ठग ने हँसी-रूपी फाँसी डाल (दर्शक के) नेत्र-रूपी बटोही को मारकर उसे ठुड्डी-रूपी गढ़े में डाल रक्खा है। यह स्याम-लीला (गोदना की काली बिन्दी) उसी की लाश है।

नोट – एक उर्दू कवि ने भी ‘तिल’ को आशिक का ‘जलाभुना दिल’ कहा है। क्या खूब है!

तो लखि मो मन जो लही सो गति कही न जाति।
ठोढ़ी-गाड़ गड़्यौ रहत दिन-राति॥97॥

मन गड़्यौ = मन बसना, मन डूबा रहना। मन उड़्यौ = मन उड़ना, मन उचटा रहना, कहीं मन न लगना।

तुम्हें देखकर मेरे मन ने जो चाल पकड़ी है, वह (चाल) कही नहीं जाती-अजीब चाल है। यद्यपि वह तुम्हारी ठुड्डी के गढ़े में गड़ा (धँसा) रहता – तल्लीन रहता है, तो भी दिन-रात उड़ता-उचटा ही रहता है-चंचल ही बना फिरता है!

नोट – यहाँ कवि ने ‘मन का गड़ना’ और ‘मन का उड़ना’ इन दोनों मुहाविरों का प्रयोग अच्छा भिड़ाया है।

लौंनै मुँह दीठि न लगै यौं कहि दीनौ ईठि।
दूनी ह्वै लागन लगी दियैं दिठौना दीठि॥98॥

लौने = लावण्यमय। ईठि = हितैषिणी। दिठौना = काजल की बिन्दी; नजर लग जाने के डर से स्त्रियाँ काजर की बिन्दी लगाती हैं।

हितैषिणी सखी ने- ‘इस लावण्ययुक्त मुखड़े पर कहीं किसी की नजर न लग जाय’ (ऐसा) कहकर डिठौना लगा दिया। किन्तु उस गोरे मुखड़े पर काजल का काला डिठौना देने से लोगों की नजर दुगुनी होकर लगने लगी- लोग और भी चाव से घूरने लगे।

पिय तिय सों हँसिकै कह्यौ लखै दिठौना दीन।
चन्द्रमुखी मुख चन्दु तैं भलौ चन्द सम कीन॥99॥

सों = से। दिठौना दीन = डिठौना लगाये हुए। तैं = से।

डिठौना लगाये हुए देखकर प्रीतम ने अपनी प्रियतमा से हँसकर कहा- हे चन्द्रमुखी! (काला ढिठौना लगाकर) चन्द्रमा के समान (धब्बेदार) कलंकित बना लेने पर भी, (तुम्हारा) मुख, चन्द्रमा से अच्छा ही है।

गड़े बड़े छबि-छाकु छकि छिगुनी छोर छुटैं न।
रहे सुरँग रँग रँगि वही नह दी मँहदी नैन॥100॥

छबि = शोभा। छाकु = नशा। छकि = भर-पेट पीकर। छिगुनी = कनिष्ठा अँगुली, कनगुरिया। सुरँग = लाल। नह दी = नँह में दी गई, नख में लगाई गई। मँहदी = मेंहदी।

सौंदर्य की मदिरा पीकर खूब ही गड़ रहे हैं, छिगुनी की छोर छोड़ते ही नहीं। यहाँ तक कि उसी (छिगुनी के) नँह में लगी मेंहदी के लाल रंग में ये नेत्र रँग भी गये हैं-उसके ध्यान में लाल भी हो गये हैं!

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