बिहारी सतसई
(भाग-1)
बिहारी सतसई के दोहे (1 से 50 तक )
मेरी भव-बाधा हरौ राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाँईं परैं स्यामु हरित दुति होइ॥1॥
भव-बाधा = संसार के कष्ट, जन्ममरण का दुःख। नागरि = सुचतुरा, झाँईं = छाया। हरित = हरी। दुति = द्युति, चमक।
(वही चतुरी राधिका मेरी सांसारिक बाधाएँ हरें – नष्ट करें; जिनके (गोरे) शरीर की छाया पड़ने से (साँवले) कृष्ण भी द्युति हरी हो जाते है।)
नोट-नीले और पीले रंग के संयोग से हरा रंग बनता है। कृष्ण के अंग का रंग नीला और राधिका का कंचन-वर्ण (पीला) – दोनों के मिलने से ‘हरे’ रंग प्रफुल्लता की सृष्टि हुई। राधिका से मिलते ही श्रीकृष्ण खिल उठते थे। कविवर रसलीन भी अपने ‘अंग-दर्पण’ में राधा की यों वन्दना करते हैं –
राधा पद बाधा-हरन साधा कर रसलीन।
अंग अगाधा लखन को कीन्हों मुकुर नवीन॥
सीस-मुकुट कटि-काछनी कर-मुरली उर-माल।
इहिं बानक मो मन बसो सदा बिहारीलाल॥2॥
कटि = कमर। बानक = बाना, सजधज। बिहारीलाल = भगवान् कृष्ण।
सिर पर (मोर) मुकुट, कमर में (पीताम्बर की) काछनी, हाथ में मुरली और हृदय पर (मोती की) माला – हे बिहारीलाल, इस बाने से – इस सजधज से – मेरे मन में सदा वास करो।
मोहनि मूरति स्याम की अति अद्भुत गति जोइ।
बसति सुचित अंतर तऊ प्रतिबिम्बित जग होइ॥3॥
जोइ = देखना। सुचित = निर्मल चित्त, स्वच्छ हृदय। सुचित = निर्मल चित्त, स्वच्छ हृदय। अंतर = भीतर। प्रतिबिम्बित = झलकती है।
श्रीकृष्ण की मोहिनी मूर्त्ति की गति बड़ी अद्भुत देखी जाती है। वह (मूर्त्ति) रहती (तो) है स्वच्छ हृदय के भीतर, पर उसकी झलक दीख पड़ती है सारे संसार में!
तजि तीरथ हरि-राधिका-तन-दुति करि अनुराग।
जिहिं ब्रज-केलि निकुंज-मग पग-पग होत प्रयाग॥4॥
ब्रज-केलि = ब्रजमण्डल की लीलाएँ। निकुंज-मग = कुंजों के बीच का रास्ता। प्रयोग = तीर्थराज। निकुंज = लताओं के आपस में मिलकर तन जाने से उनके नीचे जो रिक्त स्थान बन जाते हैं, उन्हें निकुंज वा कुंज कहते हैं, लता-वितान।
तीर्थों में भटकना छोड़कर उन श्रीकृष्ण और राधिका के शरीर की छटा से प्रेम करो, जिनकी ब्रज में की गई क्रीड़ाओं से कुंजों के रास्ते पग-पग में प्रयाग बन जाते हैं – प्रयाग के समान पवित्र और पुण्यदायक हो जाते हैं।
सघन कुंज छाया सुखद सीतल सुरभि समीर।
मनु ह्वै जात अजौं वहै उहि जमुना के तीर॥5॥
सुरभि समीर = वासंतिक फूलों की गंध से सुगंधित हवा। ह्वै जात = हो जाता है। अजौं = आज भी।
जहाँ की कुंजे घनी हैं, छाया सुख देने वाली है, पवन शीतल और सुगंधित है, उस यमुना के तीर पर जाते ही आज भी मन वैसा ही हो जाता है-कृष्ण-प्रेम में उसी प्रकार मग्न हो जाता है।
सखि सोहति गोपाल कैं उर गुंजन की माल।
बाहिर लसति मनौ पिए दावानल की ज्वाल॥6॥
गंुजन = गुंजा, घुँघची; – एक जंगली लता का फल, जो लाल मूँगे की तरह छोटा होता है; उसकी माला सुन्दर होती है। गोपाल = कृष्ण। दावानल = जंगल में लगी हुई आग। ज्वाल = आग की लाल लपट। लसति = शोभती है।
हे सखी! श्रीकृष्ण की छाती पर (लाल-लाल) गुंजाओं की माला शोभती है। (वह ऐसी जान पड़ती है) मानो पिये हुए दावानल की ज्वाला बाहर शोभा दे रही हो – श्रीकृष्ण जिस दावाग्नि को पी गये थे, उसी की लाल लपटें बाहर फूट निकली हों।
जहाँ जहाँ ठाढ़ौ लख्यौ स्यामु सुभग सिरमौरु।
बिनहूँ उनु छिन गहि रहतु दृगनु अजौं वह ठौरु॥7॥
सुभग-सिरमौरु = सुन्दर पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ। ठौर = स्थान। छन = क्षण। गहि रहतु = पकड़ लेता है।
सुन्दरों के सिरताज श्यामसुन्दर को जहाँ-जहाँ मैंने खड़े हुए देखा था, उनके न रहने पर भी, आज भी वे स्थान आँखों को एक क्षण के लिए (बरबस) पकड़ लेते हैं – आँख वहाँ से नहीं हटतीं।
चिरजीवौ जोरी जुरे क्यों न सनेह गँभीर।
को घटि ए बृषभानुजा वे हलधर के बीर॥8॥
चिरजीवौ = 1. सदा जीते रहो, 2. चिर+जीवो = घासपात खाते रहो। जुरै = जुटे, एक साथ मिले। स्नेह = 1. प्रेम, 2. घी। गँभीर = गम्भीर अगाध। घटि = न्यून, कम, छोटा। वृषभानुजा = 1. वृषभानु+ जा = वृषभानु की बेटी, 2. वृषभ + अनुजा = साँड की छोटी बहिन। हलधर = 1. बलदेव, 2. हल+धर = बैल। बीर = भाई
(राधा-कृष्ण की यह) जोड़ी चिरजीवी हो। (इनमें) गहरा प्रेम क्यों न बना रहे? (इन दोनों में) कौन किससे घटकर है? यह हैं (बड़े बाप!) वृषभानु की (लाड़ली) बेटी, (और) वे हैं (विख्यात वीर) बलदेवजी के छोटे भाई!
श्लेषार्थ – यह जोड़ी घासपात खाती रहे! इनसे अगाध घी क्यों न प्राप्त हो? घटकर कौन है? ये हैं साँड़ की छोटी बहिन, तो वे हैं बरद के छोटे भाई।
नोट-इस छोटे से दोहे में उत्कृष्ट श्लेष लाकर कवि ने सचमुच कमाल किया है।
नित प्रति एकत ही रहत बैस बरन मन एक।
चहियत जुगल किसोर लखि लोचन जुगल अनेक॥9॥
एकत = एकत्र, एक साथ। बैस = बयस, अवस्था। बरन = वर्ण, रूप-रंग। जुगल-किशोर = दोनों युवक-युवती, किशोर-किशोरी की जोड़ी। लखि चहियत = देाने के लिए चाहिए। लोचन-जुगल = आँखों के जोड़े।
दोनों सदा एक साथ ही रहते हैं। (क्यों न हो? दोनों की) अवस्था, रूप-रंग और मन (भी तो) एक-से हैं। इस युगलमूर्त्ति (राधाकृष्ण) को देखने के लिए तो आँखों के अनेक जोड़े चाहिए-दो आँखों से देखने पर तृप्ति हो ही नहीं सकती।
नोट-पद्माकर ने इस जुगल जोड़ी के परस्पर-दर्शन-प्रेम पर कहा है –
मनमोहन-तन-धन सघन रमनि-राधिका-मोर।
श्रीराधा-मुखचंद को गोकुलचंद-चकोर॥
मोर-मुकुट की चन्द्रिकनु यौं राजत नँदनंद।
मनु सखि-सेखर की अकस किय सेखर सतचंद॥10॥
मोर-मुकुट = मोर के पंख का बना मुकुट। चन्द्रिकनु = मोर की पूँछ के पर में दूज के चाँद-सा चमकीला चिह्न; मोर के पंख की आँख। नँदनंद = नंद के पुत्र, कृष्ण। मनु = मानों। ससिसेखर = जिसके सिर पर चन्द्रमा हो, चन्द्रशेखर, शिव। अकस = ईर्ष्या, डाह। सेखर = सिर। सत = शत, सौ (यहाँ अनेकवाची)।
मोर-मुकुट की चन्द्रिकाओं से (श्रीकृष्ण) ऐसे शोभते हैं, मानों शिवजी की ईर्ष्या से उन्होंने अपने सिर पर अनेक चन्द्रमा धारण किये हों।
नाचि अचानक हीं उठे बिनु पावस बन मोर।
जानति हौं, नन्दित करी यहि दिसि नंद-किसोर॥11॥
पावस = वर्षा ऋतु। नंदित = आनन्दित।
बिना वर्षा-ऋतु के अचानक ही वन में मोर नाच उठे! जान पड़ता है, इस दिशा को नंद के लाड़ले (घनश्याम) ने आनन्दित किया है।
नोट-श्रीकृष्ण का सघन-मेघ-सदृश श्यामल शरीर देखकर भ्रमवश एकाएक मोर नाच उठे थे।
प्रलय करन बरषन लगे जुरि जलधर इक साथ।
सुरपति गरबु हर्यो हरषि गिरिधर गिरि धर हाथ॥12॥
प्रलय करना = संसार को जलमग्न करने के लिए। जुरि = मिलाकर। जलधर = मेघ। सुरपति = इन्द्र। गरबु (गर्व) = घमंड। गिरिधर = कृष्ण। गिरि = पहाड़। धर = धारण कर
सब मेघ एक साथ मिलकर प्रलय करने के लिए बरसने लगे। गोवर्द्धनधारी श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर – इसके लिए मन में कुछ भी दुःख न मानकर – (गोवर्द्धन) पर्वत हाथ में धारण कर – उठाकर – इन्द्र का घमंड चूर किया।
डिगत पानि डिगुलात गिरि लखि सब ब्रज बेहाल।
कंप किसोरो दरसिकै खरैं लजाने लाल॥13॥
पानि = हाथ। डिगुलात = डगमगाना। बेहाल = विह्वल, बेचैन। कंप = थरथराहट। किसोरी = नवेली, राधिका। खरै = विशेष रूप से। लाल = कृष्ण।
हाथ हिलता और पर्वत डगमगाता है – यह देखकर ब्रजवासी व्याकुल हो गये। राधिका के दर्शन करके (मेरे शरीर के) कम्प के कारण ऐसा हुआ है – पर्वत हिला है (यह समझकर) कृष्णजी खूब ही लजित हुए।
नोट-इसी प्रसंग पर किसी कवि ने गजब का मजमून बाँधा है। देखिए, कवित्त-
मौंहनि कमान तानि फिरति अकेली ‘बधू’ टापै ए बिसिख कोर कज्जल भरै है री। तोहिं देखि मेरेहू गोविंद मन डोलि उठै मधवा निगोड़ो उतै रोप पकरै है री॥
बलि बिलि जाहुँ बृषभानु की कुमारी मेरो नैकु कह्यौ मान तेरो कहा बिगरै है री।
चंचल चपल ललचौहैं दृग मूँदि राखु जौलौं गिरिधारी गिरि नख पै धरै है री॥
लोपे कोपे इन्द्र लौं रोपे प्रलय अकाल।
गिरिधारी राखै सबै गो गोपी गोपाल॥14॥
लौं = तक। अकाल = असमय।
अपनी पूजा के लुप्त होने से क्रुद्ध हुए इन्द्र तक ने असमय में ही प्रलय करना चाहा। (किन्तु) गिरिधारी श्रीकृष्ण ने (गोवर्द्धन धारण कर) गो, गोपी और गोपाल-सबकी रक्षा की।
नोट – ‘इन्द्र लौं’ का अभिप्राय यह कि इसके पहले अघासुर, बकासुर आदि के उपद्रव भी हो चुके थे।
लाज गहौ बेकाज कत घेरि रहे घर जाँहि।
गोरसु चाहत फिरत हौ गोरसु चाहत नाँहि॥15॥
बेकाज = व्यर्थ, बेकार, अकारण। कत = क्यों। गोरस = गो+रस = इन्द्रियों का रस, चुम्नालिंगन आदि। गोरस = दही-दूध आदि।
कुछ लाज भी रक्खो-यों बेशर्म मत बनो। मैं घर जा रही हूँ व्यर्थ मुझे क्यों घेर रहे हो? (अब मैंने समझा कि) तुम इन्द्रियों का रस चाहते हो, दही-दूध नहीं।
मकराकृति गोपाल कैं सोहत कुंडल कान।
धरथौ मनौ हिय-गढ़ समरु ड्यौढ़ी लसत निसान॥16॥
मकराकृति = मकर+ आकृति = मछली के आकार का। धरधौ = अधिकार कर लिया। समरु = स्मर = कामदेव। ड्यौढ़ी = फाटक, द्वार। निसान = झंडा।
श्रीकृष्ण के कानों में मछली के आकार के कुंडल सोह रहे हैं। मानो कामदेव ने हृदय-रूपी गढ़ पर अधिकार कर लिया है और गढ़ के द्वार पर उनकी ध्वजा फहरा रही है।
नोट – कामदेव के झंडे पर मछली या गोह का चिह्न माना गया है। इसीसे उन्हें मीनकेतु, झखकेतु, मकरध्वज आदि कहते हैं।
गोधन तूँ हरष्यो हियैं घरियक लेहि पुजाइ।
समुझि परैगी सीस पर परत पसुनु के पाइ॥17॥
गोधन = गोबर की बनी हुई गोवर्द्धन की प्रतिमा, जिसे कार्तिक शुल्का प्रतिपदा को गृहस्थ अपने द्वार पर पूजते हैं और पूजा के बाद पशुओं से रौंदवाते हैं। घरियक = घरी+एक = एक घड़ी।
अरे गोधन! तू हृदय में हर्षित होकर एक घड़ीभर अपनी पूजा करा ले। सिर पर पशुओं के पाँव पड़ने ही (इस पूजा की यथार्थता) समझ पड़ेगी!
मिलि परछाँहीं जोन्ह सौं रहे दुहुनु के गात।
हरि-राधा इक संग हीं चले गली महिं जात॥18॥
परछाँही = छाया। जोन्ह = चाँदनी। दुहुन = दोनों। गात = शरीर।
दोनों के शरीर (एक का गोरा और दूसरे का साँवला) परछाई और चाँदनी में मिल रहे हैं। यों, श्रीकृष्ण और राधा एक ही साथ (निःशंक भाव से) गली में चले जाते हैं।
नोट – राधा का गौर शरीर उज्ज्वल चाँदनी में और श्रीकृष्ण का श्यामल शरीर राधा की छाया में मिल जाता था। यों उन दोनों को गली में जाते कोई देख नहीं सकता था। फलतः चाँदनी रात में भी वे निःशंक चले जाते थे।
गोपिनु सँग निसि सरद को रमत रसिकु रसरास।
लहालेछ अति गतिनु की सबनि लखे सब पास॥19॥
रमत = रम रहे हैं, आनन्द कर रहे हैं। रसरास = रस-रासलीला। लहाछेह = एक प्रकार का नाच जिसमें बड़ी तेजी से चक्रवत् घूमना पड़ता है; घूमते-घूमते मालूम होता है कि चारों ओर की चीजें पास नाचने लगीं।
शरद ऋतु की रात में, गोपियों के साथ, रसिक श्रीकृष्ण रसीले रास में रम रहे हैं। अत्यन्त चंचल गति के ‘लहाछेह’ नामक नृत्य के कारण सबने श्रीकृष्ण को सबके पास देखा।
मोर-चन्द्रिका स्याम-सिर चढ़ि कत करति गुमानु।
लखिबी पायन पै लुठति सुनियतु राधा-मानु॥20॥
मोर-चन्द्रिका = मुकुट में लगे मोर के पंखों की आँखें-कलँगी। गुमान = घमंड। कत = क्यों, कितना। लखिबी = देखूँगी। लुठत = लोटते हुए। मान = रोष, रूठना।
अरी मोर-चन्द्रिका! कृष्ण के सिर पर चढ़कर क्यों इतरा रही है? सुना है, राधा मान करके बैठी हैं। (अतएवं शीघ्र ही) तुझे उनके पाँवों पर लौटते हुए देखूँगी।
नोट – मानिनी राधा को श्रीकृष्ण जब मनाने जायेंगे, तब उनके पैरों पर माथा टेककर मनायँगे। उस समय मोर-चंद्रिका को राधा के पाँव पर लोटना ही होगा। मान-भंजन का भव्य वर्णन है।
सोहत ओढ़ें पीत पटु स्याम सलौनें गात।
मनौ नीलमनि-सैल पर आतप पर्यौ प्रभात॥21॥
पीतपटु = पीला वस्त्र, पीताम्बर। सलौनें ( स = सहित, लौने=लावण्य) = नमकीन, सुन्दर। नीलमनि = नीलम। आतप = धूप।
सुन्दर साँवले शरीर पर पीताम्बर ओढ़े श्रीकृष्ण यों शोभते हैं मानों नीलम के पहाड़ पर प्रातःकाल की (सुनहली) धूप पड़ी हो।
नोट – यहाँ कृष्णजी की समता नीलम के पहाड़ से और पीताम्बर की तुलना धूप से की गई है। प्रातः रवि की दिव्य और शीतल मधुर किरणों से पीताम्बर की उपमा बड़ी अनूठी है।
किती न गोकुल कुल-बधू काहि न किहिं सिख दीन।
कौनैं तजी न कुल-गली ह्वै मुरली-सुर लीन॥22॥
किती = कितनी। काहि = किसको। किहिं = किसने। सिख = शिक्षा। कुल-गली = वंश परम्परा की प्रथा।
गोकुल में न जाने कितनी कुलवधुएँ हैं और किसको किसने शिक्षा न दी? (परन्तु कुलवधू होकर और उपदेश सुनकर भी) वंशी की तान में डूबकर किसने कुल की मर्यादा न छोड़ी?
अधर धरत हरि कै परत ओठ-डीठि पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी इन्द्र-धनुष रँग होति॥23
अधर = होंठ, ओष्ठ। डीठि = दृष्टि। हरित = हरा।
होठों पर (वंशी) धरते ही श्रीकृष्ण के (लाल) होंठ (श्वेत, श्याम और रक्त वर्ण) दृष्टि तथा (पीले) वस्त्र की ज्योति (उस वंशी पर) जब पड़ती है, तब वह हरे बाँस की वंशी इन्द्रधनुष की-सी बहुरंगी हो जाती है।
नोट – इन्द्रधनुष वर्षाकाल में आकाश-मंडल पर उगता है। वह मण्डलाकार चमकीला, रँगीला और सुहावना होता है। उसमें सात रंग देखे जाते हैं। यहाँ कवि ने वंशी की रंगों की कल्पना बड़ी खूबी से की है। होंठ के लाल रंग और वस्त्र के पीले रंग के मिलने से नारंगी रंग, फिर होंठ के लाल रंग और दृष्टि के श्याम रंग से बैजनी रंग-इसी प्रकार, बाँसुरी के हरे रंग और अधरों के लाल रंग से पीला रंग इत्यादि। भगवान श्यामसुन्दर का शरीर सघन मेघ, उसमें पीताम्बर की छटा दामिनी की दमक और बाँसुरी इन्द्रधनुष-जिसमें अधर, कर-कमल, दन्त-पंक्ति, नख-द्युति और ‘श्वेत-स्याम-रतनार’ दृष्टि की छाया प्रतिबिम्बित है! धन्य वर्णन!
कविवर मैथिलीशरणजी गुप्त ने भी ‘जयद्रथ-वध’ में खूब कहा है-
प्रिय पांचजन्य करस्थ हो मुख-लग्न यों शोभित हुआ।
कलहंस मानो कंज-वन में आ गया लोभित हुआ॥
छुटी न सिसुता की झलक झलक्यौ जोबनु अंग।
दीपति देह दुहूनु मिलि दिपति ताफता रंग॥24॥
सिसुता = शिशुता = बचपन। जोबनु = जवानी। देह-दीपति = देह की दीप्ति, शरीर की चमक। ताफता = धूपछाँह नामक कपड़ा जो सीप की तरह रंग-बिरंग झलकता या मोर की करदन की तरह कभी हल्का और कभी गाढ़ा चमकीला रंग झलकता है। ‘धूप+छाँह’ नाम से ही अर्थ का आभास मिलता है। दिपति = चमकती है।
अभी बचपन की झलक छूटी ही नहीं, और शरीर में जवानी झलकने लगी। यों दोनों (अवस्थाओं) के मिलने से (नायिका के) अंगों की छटा धूपछाँह के समान (दुरंगी) चमकती है।
तिय तिथि तरनि किसोर-वय पुन्य काल सम दोनु।
काहूँ पुन्यनु पाइयतु बैस-सन्धि संक्रोनु॥25॥
तरनि = सूर्य। सम = समान राशि में आना, इकट्ठा होना। दोनु = दोनों। संक्रोनु = संक्रान्ति। बैस = वयस, वय, उम्र।
स्त्री (नायिका) तिथि है और किशोरावस्था (लड़कपन और जवानी का संधिकाल) सूर्य है। ये दोनों पुण्य-काल में इकट्ठे हुए हैं। वयःसन्धि (लड़कपन की अन्तिम और जवानी की आरंभिक अवस्था) रूपी संक्रान्ति (पवित्र पर्व) किसी (संचित) पुण्य ही से प्राप्त होती है।
नोट – कृष्ण कवि ने इसकी टीका यों की है-
उत सूरज राशि तजै जब लौं नहिं दूसरि रासि दबावतु है।
तब लौं वह अन्तर को समयो अति उत्तम बेद बतावतु है॥
इतहू जब बैस किसोर-दिनेस दुहू वय अन्तर आवतु है।
सुकृती कोउ पूरब पुन्यन ते बिबि संक्रम को छनु पावतु है॥
लाल अलौकिक लरिकई लखि लखि सखी सिहाति।
आज कान्हि मैं देखियत उर उकसौंहीं भाँति॥26॥
सिहाति = ललचाती है। उकसौंही-भाँति = उभरी हुई-सी, उठी-सी, अंकुरित-सी।
ऐ लाल! इसका विचित्र लड़कपन देख-देखकर सखियाँ ललचती हैं। आज-कल में ही (इसकी) छाती (कुछ) उभरी-सी दीख पड़ने लगी है।
भावुक उभरौंहौं भयो कछुक पर्यौ भरुआइ।
सीपहरा के मिस हियौ निसि-दिन देखत जाय॥27॥
भावुक (भाव+एकु) = कुछ-कुछ। उभरौंहौं = विकसित, उभरे हुए। भरु = भार, बोझ। सीपहरा = सीप से निकले मोतियों की माला। मिस = बहाना। हियो = हृदय, छाती।
(उसकी छाती) कुछ-कुछ उभरी-सी हो गई है (क्योंकि उस पर अब) कुछ बोझ भी आ पड़ा है। (इसलिए) मोती की माला के बहाने अपनी छाती देखते रहने में ही (उसके) दिन-रात बीतते हैं।
इक भीजैं चहलैं परैं बूड़ैं वहैं हजार।
किते न औगुन जग करै नै वै चढ़ती बार॥28॥
भीजैं = शराबोर हुए। चहलैं परैं = दलदल में फँसें। बूड़ैं = डूब गये। नै = नदी। बै = वय, अवस्था। औगुन = उत्पात, अनर्थ।
कोई भींगता है, कोई दलदल में फँसता है, और हजारों डूबते बहे जाते हैं। नदी और अवस्था (जवानी) चढ़ते (उमड़ते) समय संसार के कितने अवगुण नहीं करती हैं।
नोट – उठती जवानी में कोई प्रेम-रंग में शराबोर होता है, कोई वासना-रूपी दलदल में फँसता है, कोई विलासिता में डूब जाता है, कितने उमंग-तरंग में बह जाते हैं। क्या-क्या उपद्रव नहीं होते। नदी में बाढ़ आने पर तरह-तरह के अनर्थ होते ही हैं।
अपने अँग के जानि कै जोबन नृपति प्रबीन।
स्तन मन नैन नितंब कौ बड़ो इजाफा कीन॥29॥
अपने अँग के = अपना शरीर, सहायक। स्तन = छाती। नितम्ब = चूतड़। इजाफा = तरक्की, बढ़ती।
अपना शरीरी (सहायक) समझकर यौवनरूपी चतुर राजा ने (नायिका के) सतन, मन, नयन और नितम्ब को बड़ी तरक्की दी है।
नोट – जवानी आने पर उपर्युक्त अंगों का स्वाभाविक विकास हो जाता है।
देह दुलहिया की बढ़ै ज्यौं ज्यौं जोबन-जोति।
त्यौं त्यौं लखि सौत्यैं सबै बदन मलिन दुति होति॥30॥
दुलहिया = दुलहिन। जोबन = जवानी। बदन = मुख।
दुलहिन की देह में ज्यों-ज्यों जवानी की ज्योति बढ़ती है त्यों-त्यों (उसे) देखकर सभी सौतिनों के मुख की द्युति मलिन होती जाती है।
नोट – सौतिनों का मुख मलिन इसलिए होता जाता है कि अब नायक उसीपर मुग्ध रहेगा, हमें पूछेगा भी नहीं।
नव नागरि तन मुलुक लहि जोबन आमिर जोर।
घटि बढ़ि तैं बढ़ि घटि रकम करीं और की और॥31॥
आमिर = हाकिम, शासक। जोर = जबरदस्त। रकम = जमाबन्दी।
नागरी (नायिका) ने शरीररूपी नवीन देश को पाकर यौवन रूपी जबरदस्त हाकिम ने (कहीं) बढ़ती को घटाकर और (कहीं) घटी को बढ़ाकर जमाबन्दी और की और ही कर दी-कुछ-का-कुछ बना दिया।
नोट – भावार्थ यह है कि किसी अंग को घटा दिया- जैसे, कटि आदि- और किसी अंग को बढ़ा दिया- जैसे, कुच आदि। जब कोई राजा नया देश प्राप्त करता है, तब वह उलट-फेर करता ही है।
लहलहाति तन-तरुनई लचि लगि-लौं लफि जाइ।
लगे लाँक लोइन भरी लोइनु लेति लगाइ॥32॥
लचि = लचककर। लगि = लग्गी, बाँस की पतली शाखा। लौं = समान। लफि जाय = झुक जाती है। लाँक (लंक) = कमर। लोइन = लावण्य, सुन्दरता। लोइनु = लोचन, आँख।
शरीर में जवानी उमड़ रही है (जिसके बोझ से वह) नायिका बाँस की पतली छड़ी-सी लचककर झुक जाती है। उसकी कमर लावण्य से भरी हुई दीखती है और (देखने वालों की) आँखों को (बरबस) अपनी ओर खींच लेती है।
सहज सचिक्कन स्यामरुचि सुचि सुगंध सुकुमार।
गनतु न मनु पथु अपथु लखि बिथुरे सुथरे बार॥33॥
सहज = स्वाभाविक। स्यामरुचि = काले। सुचि = पवित्र। बिथुरे = बिखरे हुए। गनतु = समझता या विचारता है। अपथु = कुपंथ। सुथरे = स्वच्छ, सुन्दर।
स्वभावतः चिकने, काले, पवित्र गंधवाले और कोमल- ऐसे बिखरे हुए सुन्दर बालों को देखकर मन सुमार्ग और कुमार्ग कुछ भी नहीं विचारता।
वेई कर ब्यौरनि वहै ब्यौरो कौन विचार।
जिनहीं उरझ्यौ मो हियै तिनहीं सुरझे बार॥34॥
वेई = वे ही। ब्यौरनि = सुलझाने का ढंग। ब्यौरो = ब्यौरा, भेद। उरझयौ = उलझा। बार-बाल, केश। सुरझे = सुलझा रहे हैं।
वे ही हाथ हैं, बाल सुझाने का ढंग भी वही है। (हे मन!) विचार तो सही कि भेद (रहस्य) क्या है? (मालूम होता है) जिन (नायक) से मेरा हृदय उलझा हुआ है, वे ही बाल भी सुलझा रहे हैं।
नोट – नायक प्रेमाधिक्य के कारण स्त्री (नाइन) का वेष बनाकर नायिका के बाल सुलझा रहा है। इसी बात पर नायिका चिंता कर रही है कि हो-न-हो, वे ही इस स्त्री रूप में हैं।
कर समेटि कच भुज उलटि खएँ सीस-पटु डारि।
काकौ मनु बाँधै न यह जूरा बाँधनिहारि॥35॥
कच = केश। समेटि = गुच्छे की तरह सुलझाकर । खएँ = पखौरा। सीसपट = सिर का आँचल। काको = किसका। जूग = जूड़ा, केश-ग्रंथि, वेणी का कुण्डलाकार बन्धन। बाँधनिहारि = बाँधनेवाली।
बालों को हाथों से समेट, भुजाओं को उलटे और सिर के आँचल को अपने पखौरों पर डाले हुई यह जूड़ा बाँधनेवाली भला किसका मन नहीं बाँध लेती?
छुटे छुटावत जगत तैं सटकारे सुकुमार।
मन बाँधत बेनी बँधे नील छबीले बार॥36॥
सटकारे = छरहरे, लम्बे। छुटाबत = छुड़ाते हैं।
लम्बे और कोमल (बाल) खुले रहने पर संसार से छुड़ाते हैं-सांसारिक कामों से विमुख बनाते हैं-और ये ही काले सुन्दर बाल वेणी के रूप में बँध जाने पर मन को बाँधते हैं।
नोट – लटों में कभी दिल को लटका दिया।
कभी साथ बालों के झटका दिया॥ मीरहसन
कुटिल अलक छुटि परत मुख बढ़िगौ इतौ उदोत।
बंक बकारी देत ज्यौं दामु रुपैया होत॥37॥
कुटिल = टेढ़ी। अलक = केश-गुच्छ, लट। उदोत = कान्ति, चमक। बंक = टेढ़ी। दाम = दमड़ी। छुटि परत = बिखरकर झूलने लगता है। बकारी = टेढ़ी लकीर जो किसी अंक के दांई ओर उसके रुपया सूचित करने के लिए खींच दी जाती है।
मुख पर टेढ़ी लट के छुट पड़ने से (नायिका के मुख की) कान्ति वैसे ही बढ़ गई है, जैसे टेढ़ी लकीर (बिकारी) देने से दाम का मोल बढ़कर रुपया हो जाता है।
नोट – दाम) 1 यों लिखते हैं और रुपया 1) यों। अभिप्राय यह है कि वही बाल स्वाभाविक ढंग से पीछे रहने पर उतना आकर्षित नहीं होता जितना उलटकर मुख पर पड़ने से होता है। जैसे, बिकारी अंक के पीछे रहने पर दाम का सूचक है और आगे रहने पर रुपये का।
ताहि देखि मनु तीरथनि बिकटनि जाइ बलाइ।
जा मृगनैनी के सदा बेनी परसतु पाइ॥38॥
परसत = स्पर्श करती है। बेनी = चोटी, केश-पाश (पक्षान्तर-तीर्थराज त्रिवेणी)। बलाइ = बलैया, नौजी। बिकटनि = विकट, दुर्गम।
जिस मृगनयनी के पाँवों को सदा वेणी (त्रिवेणी) स्पर्श करती है-जिसकी लम्बी चोटी सदा पाँवों तक झूलती रहती है-उसे देखकर मन विकट तीर्थों (का अटन करने) को बलैया जाय!
नीकौ लसतु लिलार पर टीकौ जरितु जराइ।
छविहिं बढ़ावतु रवि मनो ससि-मंडल मैं आइ॥39॥
जरितु = जड़ा हुआ। जराइ = जड़ाव। टीकौ = माँगटीका, शिरोभूषण। ललाट पर जड़ाऊ टीका खूब शोभता है मानो चन्द्रमंडल में आकर सूर्य (चन्द्रमा की) शोभा बढ़ा रहा हो।
नोट – नायिका का ललाट चंद्र-मंडल है और जड़ाऊ टीका सूर्य। चंद्र-मंडल में सूर्य के आते ही चंद्रमा की शोभा नष्ट हो जाती है। किन्तु यहाँ तो रत्न-खचित टीके से मुखचंद्र की छटा कुछ और ही हो गई है। कैसी बारीकबीनी है!
सबै सुहाएईं लगैं बसैं सुहाएँ ठाम।
गोरैं मुँह बेंदी लसै अरुन पीत सित स्याम॥40॥
बेंदी = ललाट पर स्त्रियाँ गोल बिन्दु रचती हैं। सित = उजला। ठाम = स्थान। सोहाये = सुन्दर, सुहावने।
सुन्दर स्थान पर विराजने से (अच्छे-बुरे) सभी सुहावने ही लगते हैं। (नायिका के) गोरे मुख पर लाल, पीली, उजली और नीली (सभी रंगों की) बेंदी अच्छी ही लगती है।
कहत सबै बेंदी दियै आँकु दसगुनौ होतु।
तिय लिलार बेंदी दियै अगिनितु बढ़तु उदोतु॥41॥
आँकु = अंक। लिलार = ललाट। अगिनितु = बेहद। उदोतु = कान्ति।
सभी कहते हैं कि बिन्दी देने से अंक का मूल्य दसगुना बढ़ जाता है। (किन्तु) स्त्रियों के ललाट पर बेंदी देने से तो (उसकी) कान्ति बेहद बढ़ जाती है।
भाल लाल बेंदी छए छुटे बार छबि देत।
गह्यौ राहु अति आहु करि मनु ससि सूर समेत॥42॥
भाल = ललाट। छुटे = बिखरे। अति आहु करि = बहुत साहस या ललकार करके। ससि = चंद्रमा। सूर = सूर्य।
लाल बेंदी वाले ललाट पर बिखरे बाल भी शोभा देते हैं। (ऐसा मालूम होता है) मानो चन्द्रमा ने, सूर्य के साथ, अत्यन्त साहस या ललकार करके राहु को पकड़ा है।
नोट – यहाँ ललाट चन्द्रमा, लाल बेंदी प्रातःकाल का सूर्य और केश राहु है।
पाइल पाइ लगी रहै लगौ अमोलिक लाल।
भौंडर हूँ की भासि है बेंदी भामिनि-भाल॥43॥
पाइल = पाजेब, नूपुर, पदमंजीर। पाइ = पैर। अमोलिकि = अनमोल, अमूल्य। लाल = रत्न। भौंडर = अबरक। भासिहै = शोभा देगी। भामिनो = स्त्री, नायिका।
अनमोल जवाहरात से जड़े होने पर भी पाजेब पैरों में ही पड़ी रहती है। किन्तु (तुच्छ) अबरक की होने पर भी बेंदी नायिका के ललाट पर ही शोभा देगी।
भाल लाल बेंदी ललन आखत रहे बिराजि।
इंदुकला कुज मैं बसी मनौ राहु-भय भाजि॥44॥
आखत = अक्षत, चावल। इंदुकला = चन्द्रमा की कला। कुज = मंगल। भाजि = भागकर।
अहो ललन! उस नायिका के ललाट की लाल बेंदी में अक्षत विराज रही है मानो राहु के भय से भागकर चन्द्रमा की कला मंगल में आ बसी हो।
नोट – यहाँ उजली अक्षत चन्द्रमा की कला है, लाल बेंदी मंगल है, (केश राहु हैं)। मंगल का रंग कवियों ने लाल माना है। बेंदी में अक्षत लगाने की प्रथा मारवाड़ में पाई जाती है। बिहारीलाल जयपुर में रहते भी तो थे।
मिलि चन्दन बेंदी रही गौरैं मुँह न लखाइ।
ज्यौं ज्यौं मद-लाली चढ़ै त्यौं त्यौं उघरति जाइ॥45॥
मद-लाली = मस्ती की लाली, जवानी की उमंग या ऐंठ की लाली।
चन्दन की उजली बेंदी मुख की गोराई में (एकदम) मिल गई है, वह गोरे मुख पर दीख नहीं पड़ती- चन्दन की उज्ज्वलता गोराई में लीन हो गई है। किन्तु ज्यों-ज्यों (उस नायिका के मुख पर) मस्ती की लाली चढ़ती जाती है, (वह बेंदी) साफ खुलती चली जाती है।
तिय-मुख लखि हीरा जरी बेंदी बढ़ैं बिनोद।
सुत-सनेह मानौ लियौ बिधु पूरन बुधु गोद॥46॥
बिधु पूरन = पूर्ण चन्द्रमा। बिनोद = प्रसन्नता, आनन्द। बुधु = बुध, चंद्रमा के पुत्र।
स्त्री (नायिका) के मुख पर हीरा जड़ी हुई बेंदी देखकर आनन्द की वृद्धि होती है मानो पुत्र के स्नेह से पूर्ण चन्द्रमा ने बुध को गोद लिया हो।
नोट – यहाँ नायिका का मुख पूर्ण चन्द्र है और हीरा-जड़ी बेंदी बुध।
गढ़-रचना बरुनी अलक चितवनि भौंह कमान।
आघु बँकाई ही बढ़े तरुनि तुरंगम तान॥47॥
बरुनी = पलक के बाल। अलक = मुखड़े पर लटके हुए लच्छेदार केश, वंकिम लट। कमान = धनुष। आघु = (संस्कृत आर्ह) मूल्य, आदर। बँकाई = टेढ़ापन। तुरंगम = घोड़ा।
गढ़ की रचना, पलक के बाल, लट, चितवन, भौंह, धनुष, नवयुवती, घोड़ा और तान- (इन सब) का मूल्य (आदर) टेढ़ाई से ही बढ़ता है।
नासा मोरि नचाइ जे करी कका की सौंह।
काँटे सी कसकैं ति हिय गड़ी कँटीली भौंह॥48॥
नासा = नाक। मोरि = मोड़कर, सिकोड़कर। जे = जो (भौंह)। सौंह = शपथ, कसम। कसकैं = सालती है, टीसती है।
नाक सिकोड़कर जिस (भौंह) को नचाकर (उस नायिका ने) काका की कसम खाई। (उस समय की) उसकी वह कटीली भौंह (अभी तक) हृदय में गड़ी हुई काँटे-सी खटक रही है-चुभ रही है।
खौरि-पनिच भृकुटी-धनुषु बधिकु-समरु तजि कानि।
हनतु तरुन-मृग तिलक-सर सुरक-भाल भरि तानि॥49॥
खौरि = ललाट पर चंदन का आड़ा टीका, ललाट पर चंदन लेपकर उँगलियों से खरोंचने पर खौर-तिलक बनता है। पनिच = धनुष की डोरी, प्रत्यंचा। समरु = समर = कामदेव। कानि = मर्यादा। तिलक = ललाट का खड़ा टीका। सुरक = तिलक का वह भाग जो नाक पर लगा होता है। भाल = तीर की गाँसी। भरि तानि = खूब तानकर।
खौर-रूपी प्रत्यंचा को भौंह-रूपी धनुष पर चढ़ाकर, व्याधा-रूपी कामदेव, (अपनी) मर्यादा छोड़, सुरक-रूपी गाँसी वाले तिलक-रूपी शर को, खूब खींचकर, नवयुवक-रूपी मृगों को मारता है।
रस सिंगार मंजनु किए कंजनु भंजनु दैन।
अंजनु-रंजनु हूँ बिना खंजनु गंजनु नैन॥50॥
शृंगार-रस में गोते लगाये हुए नेत्र कमलों के अभिमान तोड़नेवाले हैं और अंजन लगाये हुए भी वे खंजनों का घमंड चूर करते हैं-कमलों को परास्त और खंजरीटों को अपमानित करते हैं।
