भारत-भारती
(वर्तमान खंड)
उन अग्रजन्मा ब्राह्मणों की हीनता तो देख लो,
भू-देव थे जो आज उनकी दीनता तो देख लो।
थे ब्रह्म-मूर्ति यथार्थ जो अब मुग्ध जड़ता पर हुए,
जो पीर थे देखो, वही भिश्ती, बावर्ची, खर हुए!
वह वेद का पढ़ना-पढ़ाना अब न उनमें दीखता,
वह यज्ञ का करना-कराना कौन उनमें सीखता?
बस पेट को ही आज उनमें दान देना रह गया,
है कर्म उनमें एक ही अब दान लेना रह गया!
कुछ ‘शीघ्र-बोध’ रटा कि फिर वे गणक-पुंगव बन गए,
पंचांग पकड़ा और बस सर्वज्ञता में सन गए!
संकल्प तक भी शुद्ध वे साद्यंत कह सकते नहीं,
वे पखरवाए पाद-पंकज किंतु रह सकते नहीं॥
संदेह है, जप के समय क्या मंत्र जपते मौन वे,
हैं ‘ॐ नमः’ वा ‘हा! निमंत्रण’ पाठ करते कौन वे!
निश्चय नहीं दृग बंद कर वे लीन हैं भगवान में—
या दक्षिणा की मंजु मुद्रा देखते हैं ध्यान में!
जिन ब्राह्मणों ने लोभ को संतत तिरस्कृत था किया,
देखा, उन्हीं के वंशजों को आज उसने ग्रस लिया।
अब आप उनकी दक्षिणा पहले नियत कर दीजिए—
फिर निंद्य से भी निंद्य उनसे काम करवा लीजिए!
आचार उनका आज केवल रह गया ‘असनान’ में,
जप, तप तथा वह तेज अब है शेष बाह्य-विधान में!
वे भ्रष्ट यद्यपि हो रहे हैं डूब कर अज्ञान में,
जाते मरे हैं किंतु फिर भी वंश के अभिमान में!
था हाय! जिनके पूर्वजों ने धन्य धरणीतल किया,
इस लोक की, परलोक की, प्रश्नावली को हल किया।
सर्वत्र देखो, आज वे कैसे तिरस्कृत हो रहे,
खोकर तपोबल, ज्ञान-धन, जीते हुए मृत हो रहे॥
