कालिदास – नागार्जुन | हिन्दी कविता

 

कालिदास

कालिदास, सच-सच बतलाना!
इंदुमती के मृत्युशोक से

अज रोया या तुम रोए थे?
कालिदास, सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में

घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया

रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोए थे?

कालिदास, सच-सच बतलाना!
रति रोई या तुम रोए थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमि का
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का

देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा

खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर

उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा

उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले

कालिदास, सच-सच बतलाना!
पर पीड़ा से पूर-पूर हो

थक-थक कर औ’ चूर-चूर हो
अमल-धवलगिरि के शिखरों पर

प्रियवर, तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोए थे!

कालिदास, सच-सच बतलाना!

 

स्रोत :पुस्तक : नागार्जुन रचना संचयन (पृष्ठ 64) संपादक : राजेश जोशी रचनाकार : नागार्जुन प्रकाशन : साहित्य अकादेमी संस्करण : 2017

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