अपनी खबर – पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ | हिन्‍दी आत्‍मकथा

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दिग्दर्शन

‘मैंने क्‍या-क्‍या नहीं किया? किस-किस दर की ठोकरें नहीं खाईं? किस-किसके आगे मस्‍तक नहीं झुकाया?’ मेरे राम! आपको न पहचानने के सबब ‘जब जनमि- जनमि जग, दुख दसहू दिसि पायो।’

आशा के जाल में फँस, ‘योर मोस्‍ट ओबीडिएण्‍ट सर्वेंट’ बन, नीचों को मैंने परम प्रसन्‍न प्रेमपूर्वक ‘प्रभु! प्रभु!’ पुकारा। मैंने द्वार-द्वार, बार-बार मुँह फैलाया दीनता सुनाने, लेकिन किसी ने उसमें एक मुट्ठी धूल तक नहीं डाली!

‘भोजन और कपड़े के लिए पागल बना मैं यत्र-तत्र-सर्वत्र झक मारता फिरा, प्राणों से भी अधिक प्रिय आत्‍म-सम्‍मान त्‍यागकर खलों के सामने मैंने खाली पेट खोल-खोलकर दिखलाया!’

सच कहता हूँ, कौन-सा ऐसा नीच नाच होगा जो लघु-लोभ ने मुझ बेशरम को न नचाया होगा! किन्‍तु…आह!… लालच से ललचाने के सिवाय नाथ! हाथ कछु नहिं लग्‍यो!’

तुलसीदास (विनय)

 

प्रवेश

चन्‍द ही महीने पहले बिहार के विदित आचार्य श्री शिवपूजन सहायजी (पद्मभूषण), आचार्य नलिन विलोचनजी शर्मा तथा श्री जैनेन्‍द्र कुमारजी मेरे यहाँ कृपया पधारे थे। साथ में बिहार के दो-तीन तरुण और भी थे। बातों-ही-बातों में श्री शिवपूजन सहाय ने मुझसे कहा— ‘उग्र, अब तुम अपने संस्‍मरण लिख डालो।’

मैंने कहा— लिख तो डालूँ, लेकिन जीवित महाशयों की बिरादरी—अन्‍ध-भक्‍त बिरादरी—का बड़ा भय है। बहुतों के बारे में सत्‍य प्रकट हो जाए तो उनके यश और जीवन का चिराग ही लुप्-लुप् करने लगे। कुछ तो मरने-मारने पर भी आमादा हो सकते हैं। उदाहरणत: एक जगह वाल्‍मी‍कीय रामायण, सुन्‍दर काण्‍ड, की कथा में मेरे एक ऐसे मित्र भी उपस्थित थे जो हनुमानजी के अन्‍ध-भक्‍त थे। लंका में मन्‍दोदरी को रोती हुई देखकर हनुमानजी ने समझा सीताजी हैं, उनकी खोज सफल हुई! और वह सहज बन्‍दर की तरह प्रसन्‍न, चंचल हरकतें करने लगे:

आस्‍फोटया मास चुचुम्‍ब पुच्‍छं

ननन्‍द चिक्रीड जगौ जगाम।

स्‍तम्‍भावरोहन्निपपातभूमौ

निदर्शयन् स्‍वां प्रकृतिं कपीनाम्।

यानी हनुमानजी उत्‍साह से अपनी पूँछ चूमते हुए पटकने लगे। मारे हर्ष के वह चंचल चलने, उछलने-कूदने, खम्‍भों पर चढ़ने-उतरने, स्‍वाभाविक बन्‍दर-लीला करने लगे।

‘लेकिन कथा-वाचक के मुँह से यह अर्थ और हनुमानजी के लिए बन्‍दर और पूँछ का प्रयोग सुनते ही वह अन्‍ध-भक्‍तजी भड़क पड़े। यहाँ तक कि उस दिन की कथा की हजरत ने भंग कर डाली।’

‘इसी तरह यदि मैं लिखूँ कि दिग्‍गजाकार महाकवि “निराला” पर कलकत्ते के एक मूषकाकार प्रकाशक ने सन् 1928 ई. में, बड़ा बाजार की अपनी दूकान में काठ की तलवार से कई प्रहार किए थे, ऐसे कि “निराला” भी हतप्रभ होकर प्राय: रोकर रह गए थे, तो सत्‍य की तह तक गए बग़ैर ही “निराला” भक्‍” सनसना-झनझना उठेंगे।’

‘लेकिन घटना तो सही है,’ आचार्य शिवपूजन ने कहा।

इसके बाद उपस्थित मित्रों को मैंने दो संस्‍मरण सुनाए— 1. ‘निराला’ जी पर एक प्रकाशक द्वारा आक्रमण, फिर उस प्रकाशक पर ‘निराला’ जी का प्रहार; बीच में ‘उग्र’ का उत्तेजक-पार्ट और 2. ‘निराला’ के पुत्र के ब्‍याह में, लखनऊ में, बतबढ़ाव में, भरी मजलिस में किसी बहकते प्रकाशक पर एक दहकते समालोचक का आक्रमण और उसके बाद का भूतनाथ की बारातवाला कोलाहल। साथ ही इस दुर्घटना के विवरण में वहाँ उपस्थित न होने पर भी ‘उग्र’ की बदनामी।

उक्‍त दोनों उदाहरण तो निराला-विषयक हैं। मेरे खतरनाकप्राय जीवन में ऐसे कोलाहलकारी संस्‍मरणों की भरमार है जिन्‍हें यदि रेकार्ड पर उतार दिया जाए तो सम्‍बन्धित महानुभाव फरिश्‍ते नहीं, आदमी नज़र आने लगें। हनुमान विशुद्ध प्राकृतिक रूप में, बाल और पूँछ के साथ ऐसे नज़र आएँ कि अन्‍ध–भक्‍त लोग भड़ककर रह जाएँ। ऐसे-ऐसे लोग बम्‍बई में, कलकत्ता में, इन्‍दौर में, उज्‍जैन में, बनारस में, पटना में और अब तो दिल्‍ली में भी हैं। डॉक्‍टर जीकल मिस्‍टर हाइड, बाहर समाज में सुवर्ण के भोले मृग की तरह दिखाई देने वाले अंत:कालनेमि, जिन्‍हें मैं बहुत निकट से जानता हूँ, ऐसों के बारे में अपने संस्‍मरण यदि कभी मैंने लिखे तो उसका उद्देश्‍य भण्‍डाफोड़ या व्‍यक्तिगत विद्वेष नहीं होगा। उद्देश्‍य होगा यह प्रमाणित करना कि कुछ सत्‍य ऐसे भी होते हैं जिन्‍हें कल्‍पना तक छू नहीं सकती, जैसे दिग्‍गजाकार ‘निराला’ पर मूषकाकार पब्लिशर का आक्रमण कर बैठना।

अपनी याददाश्‍त पब्लिक की जानकारी के लिए लिखने में आत्‍म-प्रशंसा और अहंकार-प्रदर्शन का बड़ा खतरा रहता है। ऐसे संस्‍मरणों में किसी एक मन्‍द घटना के कारण अनेक गुण-संपन्‍न पुरुष पर अनावश्‍यक आँच भी आ सकती है। मैंने आगे लिखा है कि ‘आज’ के संपादक बैरिस्‍टर श्रीप्रकाश ने मेरी पहली कहानी बिना पढ़े ही कूड़े की टोकरी में डाल दी थी। इस एक ही वाकये से आदरणीय श्रीप्रकाशजी को गलत समझना उजलत भी हो सकती है। बाद में श्रीप्रकाशजी मेरी रचनाओं के प्रॉपर प्रशंसक रहे और आज भी मुझ पर तो उनका प्रसाद ही रहता है।

इन संस्‍मरणों को पढ़ने पर किसी को ऐसा लगे कि मैंने निन्‍दा या बुराई किसी की की है तो यही मानना होगा कि मुझे ठीक तरह से लिखना आया नहीं। दूसरा तर्क यह कि आइने में अपना मुँह देख कोई यह कहे कि दर्पण तो उसका निन्‍दक है, दुष्‍ट दोष-दर्शक, तो ठीक है। और अफसोस की बात है कि दर्पण अंधा पत्‍थर नहीं, देखता-दिखाता दरसक-दरसाता दर्पण है।

‘मेरे प्रकाशक’ नाम से यदि मैं कभी अपने संस्‍मरण पब्लिशरों के बारे में लिखूँ तो कम-से-कम पाँच सौ पन्‍ने का पोथा प्रचण्‍ड प्रस्‍तुत हो—महान् मनोरंजक। मेरे बाकायदा प्रथम पब्लिशर श्री पन्‍नालाल गुप्‍त नामक एक सज्जन थे। बनारस में नीची बाग में उनकी छोटी-सी दुकान थी। पन्‍नालालजी मुझे दो रुपए रोज़ देते और मैं उन्‍हें ‘महात्‍मा ईसा’ नाटक का एक दृश्‍य लिखकर देता था।

दूसरे प्रकाशक ‘मतवाला’ के संचालक श्री महादेव प्रसाद सेठ थे, जिनकी मुख्‍य लत थी गुणियों पर आशिक होना। मुंशी नवजादिक लाल, ईश्‍वरी प्रसाद शर्मा, शिवपूजन सहाय, सूर्यकान्‍त त्रिपाठी ‘निराला’, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ आदि में, जिसमें जो भी खूबियाँ थीं उन्‍हें खूब ही सहृदयता से परख, खूब ही प्रेम से पूजा महादेव सेठ ने।

महादेव बाबू ‘निराला’ जी पर ऐसे मुग्‍ध थे कि उन्‍हें गुलाब के फूल की तरह हृदय के निकट बटनहोल में सजाकर रखते थे। अघाते नहीं थे महादेव सेठ उदीयमान कवि ‘निराला’ के गुण गाते! यह तब की बात है जब ‘निराला’ को कोई कुछ भी नहीं समझता था। आज तो बिना कुछ समझे सबकुछ समझने वाले समीक्षक स्‍वयंसेवकों की भरमार-सी है।

महादेव प्रसाद सेठ के सहृदय बटनहोल में ‘निराला’ मुझे ऐसे आकर्षक लगे कि देखते-ही-देखते उसमें मैं-ही-मैं दिखाई पड़ने लगा। महादेव बाबू से मेरी पहली शर्त यह थी, कहिए अनुबन्‍ध, कि वह पच्‍चीस रुपए माहवारी मेरे घर भेजेंगे और स्‍वयं जो खाएँगे मुझे भी वही खिलाएँगे: दूसरे दिन दोपहर में जब सेठजी अंगूर खाने बैठे तब ईमानदारी से अपने अंश के आधे अंगूर उन्‍होंने मेरे सामने पेश किए। इस पर माशूकाना अदा से मैंने कहा, ‘यह गलत है।’ ‘गलत क्‍या महाराज?’ विस्मित हो पूछा प्रेमी प्रकाशक ने। मैंने कहा, ‘मेरी आपकी यह शर्त नहीं थी कि मैं आपकी खूराक आधी कर दूँ। शर्त है कि जो आप खाएँ वही मैं भी खाऊँ। आप रोज़ आधा पाव अंगूर खाते हैं, तो आधा ही पाव मेरे लिए भी मँगाया करें।’ मेरे इस उत्तर पर महादेव प्रसाद थे सौ जान से कुरबान!

महादेव प्रसाद सेठ साहूकार वंश में उत्‍पन्‍न हो व्‍यापारी गादी पर बैठने पर भी फलों से लदे रसिक रसाल-जैसे थे जिन्‍हें अपने फल लुटाकर द्विजगण का कलरव श्रवण करना ही रुचता था। लेकिन आदमी का सुख विधना को कहाँ सुहाता है! मौसम बदला, फल झड़े, द्विज-दल उड़े— न स्‍वर, न गान, न मण्‍डली, न कलरव। अप्रत्‍याशिक पतझड़ आया, महादेव सेठ-रूपी रसाल अकाल ही सूख गया। पुण्‍य प्रकाशक दिवंगत महादेव प्रसाद सेठ का चरित्र परम उदात्त, जिसके लिए पन्‍ना नहीं पोथी चाहिए।

फिर भी यह सब मैं आज लिख रहा हूँ विवेक का ठेला लेकर। जब तक महादेव प्रसाद सेठ थे, मैं (ग़ज़ल के माशूकों की तरह) उन्‍हें गालियाँ ही देता रहा। और वह थे कि मेरा मुँह न देख मुझमें जो कलाकार था उसी को सराहते-चाहते थे।

लेकिन दबते नहीं थे महादेव सेठ। वह दार्शनिक की तरह अनादर-आदर के ऊपर हो रहते थे। बस एक ही दिन उन्‍होंने मेरे दुर्वचनों का विरोध किया और मुझे ऐंठकर रख दिया था। ‘महाराज,’ उन्‍होंने हुक्‍के की कश का धुआँ लम्‍बी मूँछों से छोड़ते हुए कहा, ‘आप गाली ऐसे को दिया करें जो आपको उसका उत्तर दे। मैं चुप रहूँ, आप गालियाँ देते रहें; आप कायर हो जाएँगे।’

महादेव प्रसाद सेठ के इस अहिंसक वाण ने मेरे प्राणों को कँपा, हिला, झकझोरकर रख दिया। हम दोनों एक ही कमरे में पाँच गज़ के फ़ासले पर सोया करते थे। पिछली रात तक मैं घुटता रहा। अंत में मैंने उन्‍हें जगाया ही— ‘महादेव बाबू, मैं आपसे माफी माँगता हूँ, मुझे नींद नहीं आ रही है।’ ‘आप बड़े आदमी हैं,’ उस तेजस्‍वी पब्लिशर ने मेरी उग्रता पर सान धरते हुए आशीर्वाद के स्‍वर में कहा था, ‘ये बड़े आदमियों के लक्षण हैं।’

‘निराला’ ने जब उस पब्लिशर पर प्रत्‍याक्रमण किया तब वह ‘मतवाला’ कार्यालय ही में रहा करते थे। वह प्रकाशक आया था उन दिनों खूब ही बिकती उग्र-लिखित पुस्‍तकों का आर्डर लेकर। उसी वक्‍त मेरे किसी तीव्र ताने से तनकर मेरे ही टेबल पर से बड़ी छुरी उठाकर ‘निराला’ सनसनाते सड़क पर चले गए थे। ‘मतवाला’ ऑफ़िस से सौ-ही-डेढ़ सौ गज़ों की दूरी पर उन्‍होंने प्रकाशक पर आक्रमण किया। भगवान् ने रक्षा की— वे दोनों मेरी छुरी खोल ही रहे थे कि पास-पड़ोसवालों ने उन्‍हें पकड़ लिया।

इसके बाद ‘निराला’ तो ‘मारकर टर रहे’, लेकिन वह प्रकाशक पलटकर पुन: ‘मतवाला’ कार्यालय में आया और महादेव सेठ पर गड़गड़ाने लगा कि तुम्‍हीं ने मेरी दुर्गति कराई है। जब वह बक-झककर चला गया तब ‘निराला’ जी आए। ‘निराला’ को देखते ही दृढ़ क्रोध से कड़ककर महादेव सेठ ने कहा, ‘मेरे यहाँ कोई बिजनेस करने आएगा तो आप उसे मारेंगे? यह मैं बरदाश्‍त नहीं कर सकता। आप अपना बिस्‍तर यहाँ से ले जाइए।’

नतीजा यह हुआ कि बोरिया-बँधना सँभाल महा‍कविजी उस वक्‍त चलते-फिरते नज़र आए। अब पुन: मेरी बारी आई। मैंने कहा, महादेव बाबू! बिस्‍तर आप मेरा भी बँधवाएँ, क्‍योंकि मेरी उत्तेजना से “निराला” ने अपने अपमान का बदला लिया था। कानून हाथ में लेकर प्रकाशक ने पहले “निराला” पर अपमानक आक्रमण क्‍यों किया, खासकर अपनी दूकान में? सारी सड़क पर आपका बिज़नेस नहीं होता। उन्‍होंने ‘मतवाला’ कार्यालय से काफी दूर पर स्‍वाभिमान का हिसाब सेटल किया था। सो भी होश में नहीं, मेरे शब्‍दों के नशे में। यह अगर गलती है तो ‘उग्र’ की है, ‘निराला’ की नहीं।

और अन्‍त में, महादेव प्रसाद सेठ ने महसूस किया कि आवेश में प्रिय महाकवि को बिस्‍तर गोल करने का हुक्‍म देकर उन्‍होंने बिज़नेस की भावना पर तरजीह दी थी। वह ‘निराला’ की बड़ी कद्र करते थे। भागे-भागे उनके नए स्‍थान पर गए। चरण पकड़कर भावुक, सहृदय, सुपठित प्रकाशक महादेव प्रसाद सेठ ने महाकवि से माफी माँगी।

‘निराला’ ने ‘मतवाला’ के दरवाज़े पर आकर मुझे बुलाकर शाबाशी के लहजे में कहा, ‘तुम मर्द हो!’

‘निराला’ व्‍यक्ति पर भी संस्‍मरणों की निहायत चुस्‍त पुस्तिका प्रस्‍तुत की जा सकती है— उस रंग की जिससे यह झलके कि वह धरती के हैं, हमी आपमें से सबके सिद्ध, न कि उस रंग की जिससे यह ज़ाहिर हो कि वह आदमी तो हैं अपोलो और भीम-जैसे, लेकिन न तो उनमें हड्डी है और न बाल। वही हनुमानजी बिना पूँछ के!

—पाण्‍डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’

25.12.60 कृष्‍णनगर, दिल्‍ली-31

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मनकि बेचन पाँडे, वल्‍द बैजनाथ पाँडे, उम्र साठ साल, क़ौम बरहमन, पेशा अख़बार-नवीसी और अफ़साना-नवीसी, साक़िन मुहल्‍ला सद्दूपुर चुनार, ज़िला मिर्ज़ापुर (यू.पी.), हाल मुकाम कृष्‍णनगर, दिल्‍ली-31, आज ज़िन्‍दगी के साठ साल सकुशल समाप्‍त हो जाने के उपलक्ष्‍य में उन्‍हें, जो कि मुझे कम या बेश जानते हैं, अपने जीवन के आरंभिक बीस बरसों की घटनाओं से कसमसाती कहानी सुनाना चाहता हूँ।

विक्रमीय संवत् के 1957वें वर्ष के पौष शुक्‍ल अष्‍टमी की रात साढ़े आठ बजे मेरा जन्‍म यू.पी. के मिर्ज़ापुर ज़िले की चुनार तहसील के सद्दूपुर नामक मुहल्‍ले में बैजनाथ पाँडे नामक कौशिक गोत्रोत्‍पन्‍न सरयूपारीण ब्राह्मण के घर पर हुआ। मेरी माता का नाम जयकली, जिसे बिगाड़कर लोग ‘जयकल्‍ली’ पुकारते थे। मेरे पिता तेजस्‍वी, सतोगुणी, वैष्‍णव-हृदय के थे। मेरी माता ब्राह्मणी होने के बावजूद परम उग्र, कराल-क्षत्राणी स्‍वभाव की थीं। मेरे एक दर्जन बहन-भाई थे जिनमें अधिकतर पैदा होते ही या साल-दो साल के होते-होते प्रभु के प्‍यारे हो गए थे। पहले भाइयों के नाम उमाचरण, देवीचरण, श्रीचरण, श्‍यामाचरण, रामाचरण आदि थें। इनमें अधिकतर बच्‍चे दग़ा दे गए थे, अत: मेरे जन्‍म पर कोई ख़ास उत्‍साह नहीं प्रकट किया गया। शायद थाली भी न बजाई गई हो, नौबत और शहनाई तो दूर की बात। मैं भी कहीं दिवंगत अग्रेजों की राह न लगूँ, अत: तय यह पाया कि पहले तो मेरी जन्‍म-कुंडली न बनाई जाए, साथ ही जन्‍मते ही मुझे बेच दिया जाए। सो, जन्‍मते ही मुझे यारों ने बेच डाला। और किस क़ीमत पर? महज़ टके पर एक! उसका भी गुड़ मँगाकर मेरी माँ ने खा लिया था। अपने पल्‍ले उस पर टके में से एक छदाम नहीं पड़ा था, जो मेरे जीवन का सम्‍पूर्ण दाम था। अलबत्ता ‘जन्‍मजात बिका’ का बिल्‍ला-जैसा नाम तौक की तरह गले मढ़ा गया— बेचन! बेचन नाम ऐसा नहीं जिसे ओमप्रकाश की तरह भारत-प्रचलित कहा जाए। यह तो उत्तर भारत के पूरबी ज़िलों में चलनेवाला नाम है, सो भी अहीरों, कोरियों, तथाकथित निम्‍न-वर्गीयों में प्रचलित। ब्राह्मण के घर में पैदा होने पर भी मुझे यह जो मंद नाम बख्‍़शा गया उसकी बुनियाद में मेरी बहबूदी, ज़िन्‍दगी-दराज़ की कामना ही थी। किसी भी नाम से बेटा जिए तो! आज जीवन के 60वें साल में मैं साधिकार कह सकता हूँ कि मुझे ही नहीं, मौत को भी यह नाम नापसन्‍द है। लेकिन, अब, इस उम्र में तो ऐसा लगता है यह नाम नहीं, तिलस्‍मी गंडा है, जिसके आगे काल का हथकण्‍डा भी नहीं चल पा रहा है।

इस तरह—मैं शिकायत नहीं करता—देखिए तो जहाँ मैं पैदा हुआ वह परिवार तो ग़रीब था ही, नाम भी मुझे जगन्‍नाथ, भुवनेश्‍वर, राजेश्‍वर, धनीराम, मनीराम, सूर्यनारायण, सुमित्रानन्‍दन, सच्चिदानन्‍द हीरानन्‍द वात्‍स्‍यायन जैसा नहीं मिला! और गोया इससे भी मेरे दुर्भाग्‍य को सन्‍तोष नहीं हुआ तो मैंने अभी तुतलाना भी नहीं सीखा था कि पिता का स्‍वर्गवास हो गया। इसके बाद मैं अपने बड़े भाई के अण्‍डर में आया जो विवाहित थे और पिता के बाद घर के पालक थे। मेरे बड़े भाई ने विधि से कुछ भी पढ़ा नहीं था, फिर भी बुद्धि उनकी ऐसी तीव्र थी कि वह हिंदी तो बहुत ही अच्‍छी, साथ ही संस्‍कृत और बंगला भी ख़ासी जानते थे; वैद्यक और ज्‍योतिष में भी टाँग अड़ाने की योग्‍यता रखते थे। वह समस्‍या-पूर्ति-युग के कवि और गद्य-लेखक भी ख़ासे थे। प्रूफ-शोधन तथा पत्रकार-कला से भी उनका घनघोर सम्‍बन्‍ध था। मेरे यह बड़े भाई साहब जब जवान थे तभी सनातक धर्म के भाग्‍य में, परिवार-पद्धति के भाग्‍य में, सर्वनाश की भूमिका लिखी हुई थी। अतएव जाने-अनजाने युग के साथ भाई साहब को भी इस सर्वनाश नाटक में अपने हाथों पाँव में कुल्‍हाड़ी मारने का उन्‍मत्त पार्ट अदा करना पड़ा। हम नज़दीक थे, अत: भाई साहब का काम हमें अधिक दुखदायी एवं बुरा लगा। लगा, दुनिया में उन-जैसा बुरा कोई था ही नहीं। लेकिन ज़रा ही ध्‍यान से देखने से पता चल जाएगा कि मेरे घर में जो हो रहा था वह अकेले मेरे ही घर का नहीं, कमोबेश समाज के घर-घर का नाटक था।

और मैं उस गली की कहानी बतला दूँ जिसमें मैंने जन्‍म लिया था। सद्दूपुर मुहल्‍ले की एक गली—बँभन-टोली। गली के इस सिरे से उस सिरे तक ब्राह्मणों ही के मकान एक तरफ़ और दूसरी तरफ़ भी एक तेली तथा दो-तीन कोरियों के घरों को छोड़ बाकी ज़मीनें ब्राह्मणों की। दो-तीन घरों को छोड़ बाक़ी सभी ब्राह्मण खाते-पीते ख़ासे। एकाध तो पूँजीवाले भी। दक्खिनी नाके पर भानुप्रताप तिवारी, जिनके बड़े-बड़े दो-दो मकान। फिर ग़रीब मुसई पाठक, फिर मेरे पिता की योग-क्षेम गृहस्‍थी, चचा भी हमीं-जैसे लेकिन वैद्य होने से उनके हाथ में कल्‍पवृक्ष की डाल-जैसी अलौकिक विभूति हमेशा ही रही, जिससे वह प्रभाववाले और अभावहीन थे। इसके बाद हमारे पट्टीदार भाई विन्‍ध्‍येश्‍वरी पाँडे का परिश्रमी, प्रसन्‍न परिवार। फिर ब्रह्मा मिश्र की हवेली। जयमंगल त्रिपाठी का घर और अंत में बेचू पाँडे का सहन। एक भानुप्रताप तिवारी को छोड़ बाकी सभी ब्राह्मण जजमानी वृत्ति वाले थे। हवेलीवाले ब्रह्मा मिश्र की जजमानी सबसे ज्‍़यादा थी। बाग-बगीचे, खेती-बाड़ी, लेन-देन भी होता था। बेचू पाँडे उनके आधे के भागीदार थे। हम लोगों की जजमानी यूँ ही जयसीताराम थी। कहिए हम शानदार भिखारी सड़क पर कपड़े फैला या गलियों में हाथ पसारकर भीख माँगता है, लेकिन हमें ग़रीब और बाह्मण जानकर जाने लोग हमारे घर भीख पहुँचा जाते थे। यह भीख भी शानदार थी, तब तक जब तक बाह्मणों के घर में बाह्मण पैदा होते थे। लेकिन जब ब्राह्मणों के घर में ब्रह्मराक्षस पैदा होने लगे तब तो यह जजमानी वृत्ति नितान्‍त कमीना धन्‍धा—स्‍वयं नीचातिनीच होकर भी दूसरों से चरण पुजवाना—रह गई थी। यह कथा आज से 55 वर्ष पूर्व की है। तभी तथाकथित सनातन धर्म के नाश का आरंभ उसी के अनुगामियों—धर्म के ठेकेदार ब्राह्मणों—द्वारा हो चुका था। मानो तो देव नहीं पत्‍थर! धर्म विश्‍वास पर पनपता है। जिस जनरेशन में मेरे बड़े भाई साहब पैदा हुए थे उसका विश्‍वास धर्म से उठ रहा था। मुहल्‍ले के हरेक घर में एक-न-एक ऐसा जवान पैदा हो चुका था जो पुरानी मर्यादाओं और धर्म को ताक पर रखकर उच्‍छृंखल आचरण में रत रहा रहता था। और घरवाले मारे मोह के परिवार के उस प्राणी का विरोध करने में असमर्थ थे। शास्‍त्रों में विधान है कि कुल-धर्म-विरुद्ध आचरण करनेवाले को सड़ी अँगुली की तरह काटकर समाज-जन से अलग कर देना चाहिए। हम जब तक ऐसा करते रहे तब तक समाज का स्‍वास्‍थ्‍य चुस्‍त–दुरुस्‍त था।

ग़लतीवश, मोहवश, दुर्भाग्‍यवश जब से हमने गलितांग को अपना अंग जानकर काट फेंकने से इन्‍कार कर गले से लगाना शुरू किया है, तभी से विष सारे शरीर में व्‍याप्‍त हो गया है। अब से पचास-साठ वर्ष पहले अखिल-भारतीय स्‍तर पर सहस्र-सहस्र ऐसे ब्रह्मराक्षस पैदा हुए थे, जिन्‍होंने कुकर्मों के स्‍लो-पॉयज़न द्वारा मारते-मारते सनातन धर्म को मार ही डाला। इस पूर्णता से कि वह सनातन धर्म तो अब पुन: जागने-जीनेवाला नहीं जिसके सरग़ना ब्राह्मण लोग थे। ब्राह्मण-कुल में मैं भी पैदा हुआ हूँ। कोई पूछ सकता है कि सनातन धर्म या ब्राह्मण धर्म के इस विनाश पर मेरी क्‍या राय है। मेरी क्‍या राय हो सकती है? मैं कोई व्‍यावसायिक ‘राय’ साहब नहीं। जो वस्‍तु नष्‍ट होने योग्‍य होती है, जिसकी उपयोगिता सर्वथा समाप्‍त हो जाती है, वही नष्‍ट होती है, उसी का अंत होता है। रहा मेरा बाह्मण-कुल में पैदा होना, सो उसे मैं नियति की भूल मानता हूँ। जब से पैदा हुआ तब से आज तक शूद्र-का-शूद्र हूँ। ‘जन्‍मना जायते शुद्र’; मनु का वाक्‍य है कि नहीं— ‘संस्‍कारात् द्विजमुच्‍यते।’ जन्‍म से सभी शूद्र होते हैं, बाद को संस्कार द्वारा नव-प्रज्ञा प्राप्‍त कर द्विज बनते हैं। वह संस्‍कार पाण्‍डेय बेचन शर्मा के पल्‍ले न तो बचपन में पड़ा था, न जवानी में और न आज तक। आदि से आज तक एक दिन भी जो ब्राह्मण रहा हो उसे फिर मनुष्‍य-जन्‍म मिले, फिर टट्टी की हाजत सताए, फिर राम-राम के पहर आबदस्‍त लेने की घृणित घड़ी उसके हाथ में आए। और अब इस साठ वर्ष की वय में यदि मैं शिकायत करूँ कि हाय रे, मैं सारे जीवन शूद्र-का-शूद्र ही रहा तो मुझ-सा मतिमन्‍द टॉर्च लाइट लेकर ढूँढ़ने पर भी दुनिया में नहीं मिलेगा। सो, जैसे मैं स्‍वयं को बुरा नहीं मानता, वैसे ही शूद्र को भी नहीं मानता। मैं जैसे स्‍वयं को भला ही समझता हूँ, वैसे ही शूद्र को भी भला ही समझता हूँ। शूद्र द्विज (या ब्राह्मण) का पूर्व-रूप है, वैसे ही जैसे मूर्ति का पूर्व-रूप अनगढ़ पत्‍थर। और मैं अपनी अनगढ़ता को गर्व से देखता हूँ, इसलिए कि जब तक अनगढ़ हूँ तभी तक विश्‍वविराट् की मूर्तियों की सम्‍भावनाएँ मुझमें सुरक्षित हैं। गढ़ा गया नहीं कि एकरूपता, जड़ता गले पड़ी। श्रीकृष्‍ण की मूर्ति का पत्‍थर श्रीकृष्‍ण ही की मूर्तिभावना का प्रतीक रह जाता है। उसे राधा बनाना असम्‍भव है। सो, लो! मैं ऐसा अनगढ़ पत्‍थर जिसमें रूप नहीं, रेखा नहीं। और न ही विकट-विकट भविष्‍य में कुछ बनता-बनाता ही दिखाई देता है। फिर भी, मैं परम सन्‍तुष्‍ट इस कल्‍पना-मात्र से कि मुझे कोई एक बड़ा-से-बड़ा रूप नहीं मिला तो बला से मेरी, मैं अपनी अनगढ़ता से ही खुश हूँ। यह अनगढ़ता जब तक है तब तक कोई भी यानी सभी रूप मुझमें हैं। ख़ैर, इन बातों में क्‍या धरा है! मैं यह कहना चाहता था कि आज भी, मैं निस्‍संकोच शूद्र हूँ और ब्राह्मणों के घर में पैदा होने के सबब—साधारण नहीं—असाधारण शूद्र हूँ। ब्राह्मण-ब्राह्मणी से मुझे शूद्र-शूद्राणी अधिक आकर्षक, अपने अंग के, मालूम पड़ते हैं। यहाँ तक कि आज भी जब मैं खानाबदोशों, बंजारों, जिप्सियों का गन्‍दगी, जवानी, जादू और मूर्खता से भरा गिरोह देखता हूँ तब मेरा मन करता है कि ललककर उन्‍हीं में लीन हो जाऊँ, विलीन। उन्‍हीं के साथ आवारा घूमूँ-फिरूँ, किसी हरजाई, आवारा, बंजारन युवती के मादक मोह में— नगर-नगर, शहर-शहर, दर-दर—छुरी, छुरे, मूँगे, कस्‍तूरी मग के नाफ़े, शिलाजीत बेचता।

मेरा ख़याल है अक्षरारम्‍भ से पहले ही मेरे कान में ‘वेश्‍या’ या ‘रण्‍डी’ शब्‍द पड़ चुका था। मैं पाँच-ही-छह साल का रहा होऊँगा जब मेरे घर में मिर्ज़ापुर की एक टकैल वेश्‍या का प्रवेश हुआ था। पुरुष-वेश में चूड़ीदार चपकन और पगड़ी पहनकर वह बाहरवाली कोठरी में रात में आई और तब तक रही जब तक मेरे चाचाजी हाथ में खड़ाऊँ लेकर उसे मारने को झपटे नहीं—यथायोग्‍य दुर्वचन सुनाते हुए। मुहल्‍ले के आधे दर्जन मनचले ब्राह्मण युवक उस वेश्‍या से मिलने मेरे यहाँ आ जमते थे। मकान के अन्‍दर की ब्राह्मणियाँ मेरी माँ और भाभी किंकर्तव्‍यविमूढ़ा हो गई थीं। भाभी तो रोने भी लगी थी। पर ये कुलीन औरतें मुखर विरोध करने में असमर्थ थीं, इसलिए कि मेरे उन्‍मत्त भाई साहब एक ही लाठी से दोनों ही को हाँकने में कोई ग्‍लानि या हानि नहीं समझते थे। वैसे वह मन्‍द जमावड़ा मेरे घर हुआ था, लेकिन हमप्‍याले लोग पड़ोसी ही थे। नेता (यानी मेरे पिता) के उठ जाने से मेरे घर में अखण्‍ड अराजकता थी। लेकिन वश चलता और मज़बूत सरपरस्‍तों का शासन न होता, तो दूसरे यार भी अपने घरों में वेश्‍या को टिकाकर सुरा-सुन्‍दरी-स्‍वाद लेने से बाज़ न आते। पाप पर मोहित सभी थे। सभी थे तत्त्वत: धर्म से विरहित। जुआ तो प्राय: मुहल्‍ले के किसी भी घर में खिलाया जाता था, जिससे उस घर के किसी-न-किसी प्राणी को नाल के रूप में एक-दो रुपए भी मिल जाते थे। मेरे घर में जुआ अक्‍सर हुआ करता। अक्‍सर जुए से जब नाल की रकम वसूल होती तब मेरे घर में भोजन की व्‍यवस्‍था होती थी; आटा, चावल, दाल और नमक आता था। मेरी माँ और भाभी को मकान के पिछले खण्‍ड में क़ैद कर मेरा भाई बिचले खण्‍ड में जुए का फड़ डालता, जिसमें मुहल्‍ले, कस्‍बा और आसपास के गाँवों के भी शातिर जुआरी जुड़ते। चरस और गाँजे की चिलमें लपलपातीं; ब्‍यौड़ा यानी विकट देसी दारू की दुर्गन्‍धमयी बोतलें खुलतीं। जब भी मेरे घर में जुआ जमता, भाई की आज्ञा से दरवाज़े पर बैठकर मैं गली के दोनों नाके ताड़ता रहता कि पुलिसवाले तो नहीं आ रहे हैं। ज़रूर इस ड़यूटी के बदले पैसा-दो पैसा मुझे भी किसी परिचित जुआरी से मिलता रहा होगा। जुए की इस ज़बरदस्‍त जकड़ में मेरा भाई इस क़दर पड़ गया था कि भाभी के सारे गहने बिक गए या अन्‍त में बिक जाने के लिए गिरवी रख दिए गए। फिर मेरी माँ के गहनों की बारी आई। जिसने अपना संचय सौंपने में ज़रा भी हिचक दिखलाई उसे भाई साहब ने जूतों, थप्‍पड़ों, घूसों, लातों से घूरा—अक्‍सर गाँजा-चरस या शराब के नशे में। यों तो भाई मुझे भी मारता-पीटता था, बेसबब, बहुत बुरी तरह, अक्‍सर, लेकिन वह जब मेरी माँ को मारता और वह अनाथा विवशा रोती-घिघियाती (लड़का अपना ही था, अत: खुलकर रो-घिघिया भी नहीं सकती थी) तब भाई का आचरण मुझे बहुत ही बुरा मालूम पड़ता था। पर मैं कर ही क्‍या सकता था! चार-पाँच साल का बालक! उसके सिर पर घर की सरदारी पगड़ी बाँधी गई थी। परिवार का नेता था वह। अन्‍नदाता था वह। सो, मेरी भाभी-आई के गहने जब जुआ-यज्ञ में स्‍वाहा हो गए तब घर के बरतन-भाँडों की शामत आई। जितने भी काम या दाम लायक बरतन थे, या तो अड़ोसी-पड़ोसी के घर गिरों धरे गए या पाँच रुपए की वस्‍तु रुपया-दो रुपया में बरबाद की गई। इसके बाद ब्राह्मण के घर में जो दो-चार धर्म ग्रन्‍थ थे— भागवत, गरुड़़पुराण, रामायण, गीता— मेरे भाई ने एक-एक को दोनों हाथों से बेचकर प्राप्‍त रक़म को या तो जुआ में अथवा गाँजा-चरस के धुआँ में उड़ा दिया। इसके बाद दो-चार बीघे दान-दक्षिणा में मिले जो खेत थे उनकी नौबत आई। खेतों को भी बन्‍धक या भोगबन्‍धक रखकर भाई साहब ने रुपए उतारे और उनका दुरुपयोग निस्‍संकोच भाव से किया। और कर्ज़ और कर्ज़ और कर्ज़! भाई के राज में परिवार ने जब जो भी पाया खाया कर्ज़ा।

उन्‍हीं दिनों, एक दिन, छापा मारकर चुनार की पुलिस ने सद्दूपुर मुहल्‍ले के जुआरियों और उनके संगियों को रँगे हाथ गिरफ्तार कर लिया था। जुआ उस दिन मेरे घर में नहीं, मेरे घर के पिछवाड़े अलगू नामक कुम्‍हार के घर में हो रहा था। उस दिन मेरे भाई साहब जुए में शामिल नहीं थे, एक दोस्‍त की बैठक में उपन्‍यास पढ़ रहे थे। लेकिन पुलिस-छापे के ठीक पहले अलगू के घर वह सूचना देने गए थे कहीं से खबर-सूराग पाकर कि भागो, पुलिस आ रही है, कि पुलिसवाले आ ही धमके! शायद सबसे पहले मेरे भाई साहब ही पुलिस की पकड़ में आए थे। गिरफ्तार दर्जन-भर जुआरी हुए होंगे। फिर भी, कई जान लेकर जूते छोड़कर भाग गए। उन जूतों की लम्‍बी माला अलगू कुम्‍हार से ही तैयार कराने के बाद उसी के गले में डालकर, जुलूस बनाकर जब पुलिसवाले राजपथ से जुआरियों को हवालात की तरफ़ ले चले तो बन्‍धुओं में मेरा भाई भी था। उस भयकारी जुलूस के पीछे काफ़ी दूर तक अपने भाई या अन्‍नदाता के लिए रोता हुआ मैं भी गया था। फिर घर लौटने पर देखा आई और भाभी रो रही थीं। काफ़ी दिनों मिर्ज़ापुर में केस चलने के बाद उस मामले में भाई को पचास रुपए जुरमाना हुआ।

और चुनार में रहने का अब कोई तरीका बच नहीं रहा। और कर्ज़दाताओं से बेइज्‍ज़त होने का प्रसंग पगे-पगे प्रस्‍तुत होने लगा। और घर में अबलाएँ और बच्‍चे दाने-दाने के मोहताज हो गए। तब और तभी मेरे बड़े भाई को देस छोड़ परदेस जाने और कमाने की सूझी। फलत: वह पहले काशी और बाद में अयोध्‍या की रामलीला मंडलियों में एक्टिंग करने लगे। तनख्‍़वाह पाते थे दोनों वक्‍त फ्री भोजन और तीस रुपए मासिक। इन रुपयों में से दस-पाँच अक्‍सर वह चुनार भी भेजते थे। पर चुनार में अक्‍सर चूहे डंड ही पेला करते थे, या जजमानी से भिक्षा मिल जाती थी, या मेरी आई किसी की मजूरी कर कूट-पीसकर लाती थी। बड़ी मुश्किलों से सुबह खाना मिलता तो शाम को नहीं, शाम मिलता तो सबेरे नहीं। जहाँ भोजन-वस्‍त्र के लाले वहाँ शिक्षा-दीक्षा की क्‍या हालत रही होगी, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। शिक्षा-दीक्षा दूर, मेरे सामने तो आँखें खोलते ही जीवन-ग्रन्‍थ का जो पृष्‍ठ पड़ा वह शिक्षा-दीक्षा को चौपट करने वाला था। जीवन को स्‍वर्ग और नरक दोनों ही का सम्मिश्रण कहा जाए तो मैंने नरक के आकर्षक सिरे से जीवन-दर्शन आरम्‍भ किया और बहुत देर, बहुत दूर, तक उसी राह चलता रहा। इस बीच में स्‍वर्ग की केवल सुनता ही रहा मैं। मेरी कोशिश सही न होगी, स्‍वर्ग जीवन में मुझे कहीं नज़र आया नहीं। और नरक की तलाश में किसी भी दिशा में दूर तक नज़र भटकाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। सो, समय पर न मिले तो स्‍वर्ग के लिए भी कौन प्रतीक्षा करे! नरक लाख बुरा बदनाम हो, लेकिन अपना तो जीवन-संगी बन चुका है, सहज हो गया है, रास आ गया है। डालडा खाते-खाते जैसे शुद्ध घृत की सुध-बुध भी समाप्‍त हो जाती है, पहचान-परख तक भूल जाती है, वैसे ही लगातार सुलभ होने से नरक भी धीरे-धीरे परिचित, प्रिय, प्रियवर यानी प्रियतम हो जाता है। ग़ालिब ने अपने ढंग से कहा है— ‘क्‍यों न फिरदौस को दोज़ख़ से मिला दें या रब! सैर के वास्‍ते थोड़ी-सी फ़िजा और सही।’ जब मेरे पिता जीवित थे तभी न जाने कैसे मेरे दोनों बड़े भाइयों को रामलीला में पार्ट करने का चस्‍का लगा गया था। ये किशोरावस्‍था ही में ऐसे बेकहे हो गए थे कि कुल और पिता को धता बताकर चुनार से मिर्ज़ापुर भागकर रामलीला में राम-लक्ष्‍मण का अभिनय करने लगे। क्रोध और भविष्‍य के भय से काँपते हुए पिता, जब मिर्ज़ापुर पहुँचे तो क्‍या देखते हैं कि दोनों सपूत राम-लक्ष्‍मण बने रंगमंच पर शोभायमान हैं। कहते हैं वह दृश्‍य पिता से देखा न गया। जनता को भूल, स्‍टेज पर झपट लौंडों के माथे से मुकुट-किरीटादि नोच-फेंक वहीं से उन्‍हें झपड़ियाते भूले बछड़ों की तरह बाँधकर चुनार ले आए थे। पिता के देहान्‍त के बाद चुनार की विजयदशमीवाली लीला में, अक्‍सर वह कोई-न-कोई पार्ट ही ‘प्‍ले’ किया करते थे। चुनार ही में एक-दो बार सीता बनाकर मुझे भी बड़े भाई ने इस घाट पर उतार रखा था। जब वह अयोध्‍या की रामलीला-मण्‍डली में थे तब मुझे उन्‍होंने बनारस की एक लीला-मण्‍डली में अपने किसी खत्री मित्र के हवाले कर रखा था। तब मैं आठ साल का रहा होऊँगा या नौ का। ज़ुल्‍फ़ों में तीन-तीन फूल-चिड़ी बनाता था। काफ़ी तेल लगाने के बाद बालों में सस्‍ती वेसलिन भी लगाता था। वह वेसलिन, जिसकी गन्‍ध पिता हाउस (बम्‍बई) या सरकटा गली (कलकत्ता) की सस्‍ती वेश्‍याओं के अंग से आती है। कुछ ही दिनों बाद भाई साहब ने बनारस वालों की मण्‍डली से मुझे भी साधुओं की रामलीला-मण्‍डली में बुला लिया था। भाई साहब की नज़र में मेरे उनके संग रहने में अनेक फ़ायदे थे। पहले तो घर में कोई शरारती नहीं रहेगा, दूसरे उनकी निगरानी में रामलीलावालों की बुरी हवा से मैं बचूँगा, तीसरे ‘ब्‍वॉय सरवेंट’ चौबीस घण्‍टे हाज़िर—बिला तनख़ाह। ऊपर से रामलीला में लक्ष्‍मण और जानकी बनकर आठ-दस रुपए मासिक कमा देने वाला। उन दिनों रामलीला के निश्चित पार्टों के संवाद बाज़बान करने के अलावा भाई का एक मित्र वैरागी पखावजी मुझे ताल और स्‍वर यानी पक्‍के रंग के संगीत की शिक्षा भी दिया करता था। उन्‍हीं दिनों नाचना नहीं, तो नाचने की चुस्‍ती से चंचल चरण चलाना, ठुमुकना, थिरकना, बल खाना वग़ैरह भी मुझे सिखलाया गया था। छुटपन में मेरी शिक्षा बिलकुल आरम्भिक क ख ग दरजों तक हुई थी। अभी थोड़ा ही बहुत अक्षर-शब्‍द-ज्ञान हो पाया था कि मुझे ऐसा लगा कि यह पढ़ना-पढ़ाना मेरे बलबूते की बात नहीं है। मगर इससे गला छूटे तो कैसे? सुना था हनुमानचालीसा का पाठ करने से सारे दुख दूर, मसले स्‍वयमेव हल हो जाते हैं। लेकिन हनुमानचालीसा मेरे पास कहाँ! साथ ही पास में ‘पीसा’ कहाँ कि हनुमानचालीसा ख़रीदा जा सके! मैं जिस दरजे में पढ़ता था उसी में एक काला-सा लड़का था किसी छोटी जाति का। वह अपने बस्‍ते में रोज़ हनुमानचालीसा की एक प्रति ले आता था। और मैं ललचाकर, तड़पकर रह जाता था उस दो पैसे की विख्‍यात पुस्‍तक के लिए। अन्‍त में मैंने चोरी करने का निश्‍चय किया। मैं ऊँच लड़का, वह नीच, लेकिन मैंने उसकी हनुमानचालीसा चुरा ली और बड़े चाव से मैं उसका पाठ करने लगा। मुझमें जो ब्राह्मण है वह आज भी यही सोचता है कि वह हनुमानचालीसा ही का प्रभाव था कि स्‍कूली शिक्षा से हटाकर मुझे रामलीला-मण्‍डली में डटाया गया। वहाँ पर मेरा परिचय श्रीरामचरितमानस से होना ही था, क्‍योंकि मैं जानकी, लक्ष्‍मण और भरत तक का पार्ट किया करता था। रामलीला-मण्‍डलियों ही में मैंने सुलझे ‘साधुओं’ के व्रत और निष्‍ठापूर्वक नवरात्रियों के नौ दिनों में रामायण का पाठ होते देखा। सुना, ऐसे पाठ के फल अनन्‍त। सो, मैंने नौ-दस-ग्‍यारह की वय में सामर्थ्‍यानुसार श्रद्धा-भक्ति से रामायण के नवाह्न पाठ किए। एक नहीं, अनेक। इन लीला-धारियों की मण्‍डली में फुरसत के अवसरों में लोग अन्‍त्‍याक्षरी-सम्‍मेलन भी अक्‍सर किया करते थे, जिनमें ज्‍़यादातर तुलसीकृत रामायण से ही उदाहरण दिए जाते थे। इन सम्‍मेलनों से भी मुझे रामायण का स्‍पर्श अधिकाधिक होने लगा था। उन दिनों रामायण के विविध अंश मेरे कंठाग्र, जिह्वाग्र रहा करते थे। और उन दिनों रामलीला में अभिनेता संवाद कैसे रहते थे? पहले रामायणी चौपाई या दोहा अर्ध-स्‍वर में सुनाता, फिर अभिनेता उसका (रटा या ज्ञात) अर्थ जनता को सुना देता था। रामायणी कहता- देवि, पूजि पद-कमल तुम्‍हारे, सुर-नर-मुनि सब होहिं सुखारे। तब सीताजी कहतीं—हे देवि! तुम्‍हारे सर्व-पूज्‍य पद-कमलों को पूज-पूजकर सुर, नर और मुनि सभी सुख पाते हैं। संवाद की इस विधि में अक्‍सर अभिनय और उसके प्रभाव का ख़ून हो जाता था, पर जो जनता लीला देखने आती थी वह रामलीला को थिएटर न समझ किसी भी भाव, भाषा या भेस में भगवान्-भगवती की भावना मात्र से प्रभावित होने वाली होती थी। एक बार कहीं भरत का पार्ट करने वाला हमारा संगी बीमार पड़ गया। अब मुश्किल यह सामने आई कि भरत का कठोर काम करे तो कौन? इस पर मेरे बड़े भाई ने मण्‍डली के मालिक महन्‍त को वचन दिया कि वह चिन्‍ता न करें, भरत का काम बेचन कर लेगा। मुझसे उन्‍होंने गाँजे के नशे में चूर आँखें दिखाकर कहा— भरत के काम में ज़रा भी भूल की तो याद रहे, लीला-भूमि से ही पीटते-पीटते तुझे डेरे पर ले चलूँगा। उनसे पिटने का मुझे इतना डर था कि भरत तो भरत, वह धमकाता तो मैं कमसिनी भूल दशरथ का पार्ट भी अदा करके रख देता, रावण का भी! उस दिन राम के वन-गमन के बाद ननिहाल से बेहाल लौटे भावुक भाई भरत का संवाद था कौशल्‍या के आगे। वसिष्‍ठ की सभा में परम साधु बड़े भाई के मोह में भरत को रोते चित्रित किया है तुलसीदासजी ने। मुझे रोना आया था बड़े भाई के क्रूर भय से। और मैंने बहुत सावधानी से भरत का अभिनय किया। रामायण मुझे याद ही थी, सो बिना रामायणी का मुख देखे संवाद की चौपाई-पर-चौपाई, दोहे-पर-दोह अर्थसहित मैं सुनाता गया। मैं रोता था भाई के भय से, जनता ने समझा भरतजी अभिनय-कला का शिखर छू रहे हैं। खूब ही जमा मेरा काम! महन्‍तजी प्रसन्‍न हो गए और स्‍टेज ही पर दस रुपए इनाम, तथा एक रुपया महीना तनख़ाह बढ़ने की घोषणा हुई। बधाइयाँ और इनाम के रुपए भाई साहब के पल्‍ले लगे। पाँव तो उस दिन भी मैं भाई साहब के दाबता रहा तब तक जब तक वह सो नहीं एक— हाँ उस दिन उन्‍होंने नित्‍य की तरह, पाँव दबवाते-दबवाते दो-चार लातें नहीं लगाईं कि मैं ठीक से क्‍यों नहीं दबाता? कि मैं झपकियाँ क्‍यों लेता हूँ?

 

धरती और धान

‘अरे बेचन! न जाने कौन आया था— उर्दजी, उर्दजी, पुकार रहा था!’

ये शब्‍द मेरी दिवंगता जननी, काशी में जन्‍मी जयकली के हैं जिन्‍हें मैं ‘आई’ पुकारा करता था। यू.पी. में माता या माई को आई शायद ही कोई कहता हो। महाराष्‍ट्र में तो घर-घर में माता को आई ही सम्‍बोधित किया जाता है। कैसे मैंने माई को आई माना, आज भी विवरण देना मुमकिन नहीं। लेकिन बम्‍बई जाने पर जब लक्ष-लक्ष महाराष्ट्रियों के मुँह से ‘आई’ सुना तो मेरे आन्‍तरिक हर्ष की सीमा न रही। जो हो।

मैं यह कहना चाहता था कि मेरी जननी इस क़दर अनपढ़ थीं कि जो सार्थकता उन्‍हें ‘उर्द’ जी में मिलती थी वह ‘उग्र’ जी में नहीं। बिलकुल नहीं। उनसे जब मैंने अपने जन्‍म के समय के बारे में पूछा तो उन्‍होंने बतलाया कि पौष शुक्‍ल अष्‍टमी की रात में जब तुम्‍हारे पिता बिहारीसाहु के मन्दिर से पूजा करके लौटे थे तब तुम पैदा हो चुके थे। दूसरा पता उन्‍होंने यह दिया कि तुम्‍हारी बारही के दिन मातादयाल का जन्‍म हुआ था। यह मातादयाल मेरे भतीजे थे। पिता दिवंगत बैजनाथ पाँडे चुनार के ख़ासे धनिक वणिक बिहारीसाहु के राममंदिर में वैतनिक पुजारी थे। वेतन था रुपए पाँच माहवार। साथ ही चुनार में जजमानी-वृत्ति भी पर्याप्‍त थी। उन्‍हीं में एक जजमान बहुत बड़ा ज़मींदार था जिसके मरने के बाद उसके दोनों पुत्रों में सम्‍पत्ति के लिए घोर अदालती संघर्ष हुआ। उसी मुक़दमे में ज़मींदार के बड़े लड़के ने कुल-पुरोहित की हैसियत से मेरे पिता का नाम भी गवाहों में लिखा दिया था, गोकि उन्‍होंने भाई के द्वन्‍द्व में पड़ने से बारहा इन्‍कार किया था। नए ज़मींदार ने मेरे पिता को प्रलोभन भी ‘प्रापर’ दिए। लेकिन वह भद्रभाव से अस्‍वीकार ही करते रहे कि समन आ धमका। लाचार अदालत में हाज़िर तो वह हुए, पर पुकार होते ही उन्‍होंने कोर्ट से साफ़-साफ़ कह दिया कि उन्‍हें माफ़ करे कोर्ट, उनकी गवाही उस पार्टी के विरुद्ध पड़ सकती है जिसने गवाह बनाकर उन्‍हें अदालत के सामने पेश कराया है। तब तो आपकी गवाही ज़रूर होनी चाहिए, अदालत ने आग्रह किया— और गवाही हुई।

कहते हैं उसी गवाही पर कोर्ट का सारा फ़ैसला आधारित रहा। बड़ा भाई हार गया। वही जिसने मेरे पिता को गवाह बनाया था। जीत छोटे भाई की हुई। इस सबमें पिता के पल्‍ले सिवाय सत्‍य के और कुछ भी नहीं पड़ा। घर की बु‍ढ़िया इसके लिए बैजनाथ पाँडे को बराबर गर्व से कोसती रही, कि उसने ज़रा भी टेढ़ी-मेढ़ी बात न कर खरे सच के पीछे एक अच्‍छी ज़मींदारी हाथ से खो दी। चुनार में बैजनाथ पाँडे की जजमानी थोड़ी ही थी। निकटस्‍थ जलालपुर माफ़ी गाँव में ज़मीन भी चन्‍द बीघे थी जो—और कुछ नहीं तो—साल का खाने-भर अनाज और पशुओं के लिए भुस पर्याप्‍त दे सकती थी। बस इतने में ही बैजनाथ पाँडे अपने कुनबे का ख़र्च अपने दायरे में मज़े में चला लेते थे—यहाँ तक मज़े में कि सारी ज़िन्‍दगी बिहारीसाहु के मन्दिर में वेतन-भोगी पुजारी रहे, पर वेतन लिया कभी नहीं—और मर भी गए। बैजनाथ पाँडे संस्‍कृत के साधारण जानकार, जजमानी विद्या-निपुण, साथ ही गीता के परम-भक्‍त, शैव परिवार में पैदा होकर भी वैष्‍णव प्रभाव, भाव-सम्‍पन्‍न थे। कहते हैं बैजनाथ पाँडे सम्‍यक् चरित्रवान, सुदर्शन और सत्‍यवादी थे। कहते हैं वह चालीस वर्ष ही की उम्र में बैकुण्‍ठ-बिहारी के प्‍यारे हो गए थे। कहते हैं इतनी ही उम्र में वह बारह बच्‍चों के जनक बन चुके थे। मेरे कहने का मतलब यह कि बैजनाथ पाँडे अच्‍छे तो थे—बहुत—लेकिन अन बैलेन्‍स्‍ड भी कम नहीं थे। सो उन्‍हें क्षय-रोग हुआ, जिससे असमय में ही उनके जीवन-स्रोत का क्षय हो गया। कहते हैं क्षय के बकरे की सन्निकटता, बकरी का दूध, उसी के मांस का स्‍वरस बहुत लाभदायक होते हैं। हमारा परिवार शाक्‍त, हम छिपकर मांसादि ग्रहण करने वाले, फिर भी बैजनाथ पाँडे ने प्राणों के लिए अवैष्‍णवजी उपाय अपनाना अस्‍वीकृत कर दिया। अपने पिता की एक झलक-मात्र मेरी आँखों में है। मन्दिर से आकर ब्राह्मण-वेश में किसी ने मेरे मुँह में एक आचमनी गंगाजल डाल दिया, जिसमें बताशे घुले हुए थे। मैं माँ की गोद में था। उसने बतलाया, चरणामृत है बेटे! कितना मीठा!

मैंने अपने पिता को बुरी तरह बीमार देखा, घर में चारों ओर निराशा!… पिता का मरना… आई का पछाड़ खा-खाकर रोना मुझे मज़े में याद है। यद्यपि तब मैं बहुत छोटा, रोगीला, बेदम-जैसा बालक था। जब मेरे पिता का देहान्‍त हुआ मैं महज़ दो साल और छह महीनों का था। यानी मैंने जब ज़रा ही आँखें खोलकर दुनिया को देखा तो मेरा कोई सरपरस्‍त नहीं! प्राय: जन्‍मजात अनाथ—ऐसा—जिस पर किसी का भी बरदहस्‍त नहीं रहा। पिता भाई-बहन मिलाकर हम चार जने, भाभी और माता को अनाथ कर दिवगंत हुए थे। बहन बड़ी और ब्‍याहता थी, फिर भी घर में खाने को थे आधा दर्जन मुख और कमानेवाला हाथ एक भी नहीं था। खेतीबाड़ी इतनी ही थी कि कर्त्ता ही उससे जीवन-यापन कर सकता था। इधर मेरे दोनों भाई रामलीला करने पर आमादा थे। कलिकाल विकराल आ रहा था—भागा-भागा; सनातन धर्म, कर्मकाण्‍ड, वर्ण-व्‍यवस्‍था, सारे-का-सारा मण्‍डल जा रहा था भागा-भागा। धर्म का लोप हो रहा था। परिवार टूट रहा था। अर्थ-टका-युग का उदय हो रहा था।

जब पिता का देहान्‍त हुआ मेरा बड़ा भाई बाईस वर्ष का रहा होगा। उसका विवाह हो चुका था। मेरी भाभी घर पर ही थीं। मझला भाई सोलह-सत्रह साल का रहा होगा, जो पिता-मरण के कुछ ही दिन के अन्‍दर बड़े भाई और भाभी से लड़कर घर से अयोध्‍या भाग गया और साधु बनकर रामलीला-मं‍डलियों में अभिनय करने लगा था। तब मैं चार साल का था। सारे तन में पेट परम प्रधान। मेरे देह में वह रोग था जिसमें आयुर्वेदीय चिकित्‍सक लोहे की भस्‍म या मंडूर खिलाते हैं। मेरी आई के मरे और जीवित अनेक बच्‍चे थे, पर चाची के एक कन्‍या के अलावा कोई भी जीवित न था। सो, उनके मन में पुत्र का मोह था। दोनों घरों में सबसे छोटा बालक मैं ही था। चाची मेरी आई से तो कसकर झगड़ती थीं, लेकिन मुझे उनका वात्‍सल्‍य प्राप्‍त था। पाते ही प्‍यार से, पुचकार से वह मुझे कुछ-न-कुछ खाने को देतीं। लेकिन इसका पता लगते ही मेरी आई धरित्री पर बैठ पसारे हुए पाँवों पर मुझे पट लिटा, देवरानी को दिखा-दिखा, सुन-सुनाकर धमार की धुन में धमकती थीं। एक तो ब्राह्मण क्रोधी होता ही है, दूसरे हम परम क्रोधी कौशिक यानी विश्‍वामित्र के गोत्रवाले, तीसरे मेरी आई अनायास ही भयानक क्रोध करने वाली थीं।

मैं सोलह साल का हो गया था तब भी वह मुझे मारने को ललकती थीं। एक बार तो अनेक झाड़ू उन्‍होंने मुझ पर झाड़ भी डाले थे। मझले भाई श्रीचरण पाँडे तो क्रोधी नहीं थे, लेकिन उमाचरण और बेचन अपने-अपने समय में परम क्रोधी व्‍यक्ति बने। हम सबमें माता के स्‍वभाव का प्रभाव ख़ासा था। लेकिन क्रोध माता करे या पिता, पति करे या पत्‍नी, बालक करे या युवा, होता है—पाप का मूल। ‘जेहि बस जन अनुचित करहिं च‍रहिं विश्‍व प्रतिकूल’। सो, माता के क्रोध का कुफल माता को मिला, भ्राता के क्रोध का भ्राता को। खुद बेचन पाँडे को क्रोध का कुफल जो मिला उसे मैं ही जानता हूँ और अच्‍छा करता हूँ कि डायरी नहीं लिखता वरना दुनिया जानती। अपने बारे में दुनिया को क्‍या जनाना चाहिए क्‍या नहीं, इसी का नुस्‍ख़ा ‘विनय’ में गोस्‍वामीजी ने खूब बतलाया है। ‘किये सहित सनेह जे अध, हृदय राखे चोरि, संग बस किए शुभ, सुनाए सकल लोक निहोरि।’ यानी परम प्रेमपूर्वक किए हुए प्रचंड पापों को तो हृदय की अन्‍ध कोठरी में छिपा रखना, लेकिन किसी दूसरे के संग में होने के कारण भी कोई भला काम बन पड़ा हो तो उसका ढोल मूसलों पीटना।

चार सौ वर्ष पूर्व ही जैसा महा‍कवि ने बीसवीं सदी का उत्तर का ख़ाक़ा खींचकर रख दिया हो। मेरी आई परम क्रोधिनी थीं, साथ ही परम भोली। जब भी उन्‍होंने किसी बेटे को रुपया भुनाने को दिया होगा, बेटे ने साढ़े पन्‍द्रह आने ही लौटाए होंगे। इस पर दूसरे बेटे ने कहा होगा— माँ, बड़े ने पैसे ग़लत तो नहीं गिने? ला तो, फिर से गिन दूँ। और फिर से गिनने में वह साढ़े पन्‍द्रह आने की जगह पन्‍द्रह आने ही को सोलह बतला माँ को दे देता। और वह रख लेतीं। वह परिश्रमी भी ज़बरदस्‍त थीं। हमारे लम्‍बे-चौड़े दरिद्र कच्‍चे घर को होली-दिवाली पर वह अकेले ही कछाड़ बाँधकर पोतनी या पीली मिट्टी से दिव्‍य कर देती थीं। फटे-पुराने कपड़ों की कंथा बहुत अच्‍छी तो नहीं, फिर भी ऐसी सी देती थीं जिसे सरदी के दिनों में वरदान की तरह लोग ओढ़ते-बिछाते थे। काग़ज़ गला पल्‍प बना उसकी भद्दी टोकरियाँ बना लेती थीं। सींक के पंखे तो ख़ासे बना लेती थीं। ब्‍याह-गौना, कथा वगैरह में सामयिक गीत गानेवालियों में वह आगे ही रहना चाहती थीं। मेरा भाई जब परदेश होता और घर में भूनी भाँग भी न होती, तब आई मुहल्‍ले-टोले से मन-आध मन गेहूँ ले आतीं; एक निहायत करुण गीत गाती-गाती मेरी तरुणी भाभी के साथ उसे पीसतीं। तब कुछ पैसे मिलते, तब हमारे घर चूल्‍हा चेतता, मुँह निवाले लगते। मैं खुश हो चहकने लगता और आई कहावत सुनाकर खुश हो जातीं— ‘पेट में पड़ा चारा, तो नाचे लगा बेचारा!’

 

चुनार

रामचन्‍द्र भगवानद्य सरयू नदी के किनारे पैदा हुए थे, मैं पैदा हुआ गंगा सुरसरि के किनारे। मुझे सरयू उतनी अच्‍छी नहीं लगतीं जितनी नर, नाग, विबुध बन्‍दनी गंगा। रामचन्‍द्र भगवान् अयोध्‍या नगरी में पैदा हुए थे, जो पवित्र तीर्थ मानी जाती है। मैं चुनार में पैदा हुआ, जो काशी के कलेजे और गंगातट पर होकर भी त्रिशंकु की साया में होने से तीर्थ नहीं है। इतना ही नहीं, तीर्थ का पुण्‍य हरण करनेवाला भी है। फिर भी, चुनार मुझे तीर्थ और अयोध्‍या और साकेत से भी अधिक प्रिय है। यह अपनी जन्‍म-भूमि चुनार के बारे में पाण्‍डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की राय है। अपनी जन्‍मभूमि अयोध्‍या के बारे में रामचन्‍द्र भगवान् मर्यादा पुरुषोत्तम की राय थी— ‘पावन पुरी रुचिर यह देसा, जद्यपि सब बैकुंठ बखाना, बेद पुरान विदित जग जाना। अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोउ।’ फिर मैं क्‍यों न कहूँ कि मुझे चुनार जितना प्रिय है उतनी अयोध्‍या नहीं? राम-भजिए अपने राम को अपने राम जितने पसन्‍द हैं उतने मर्यादा पुरुषोत्तम राम यानी रघुपति राघव राजाराम भी नहीं।

वाजि, रथ, कुंजरोंवाले महाराज दशरथ के काल में अयोध्‍या कुछ और ही थी—अमरावती से भी बढ़ी-चढ़ी नगरी। उसका वर्णन बाल्‍मीकि रामायण में पढ़िए और वर्तमान अयोध्‍या को जाकर देखिए। वैसे ही जैसे मेरे लकड़दादे ने घी खाया, मेरे हाथ सूँघिए। न हीं साकेत, न कहीं स्‍वर्ग। चतुर्दिक् सघन रज तमस तक। मुझे तो सरयू भी मटमैली, रजस्‍वला, नज़र आती है।

कुजा अयोध्‍या, कुजा चुनार। अयोध्‍या तीर्थ, चुनार तीर्थ-तेज को नष्‍ट करनेवाला। अयोध्‍या में सम्राट्, चक्रवर्ती, अवतारी, लीलाधारी लाख हुए हों, लेकिन वह पुरी प्रकृति की उस प्रफुल्‍ल कृपा, वरदान से बिलकुल विरहित है जो चुनार को अनायास ही प्राप्‍त है। आप जाइए अयोध्‍या, भाग आएँगे भाग मनाते। आप आइए चुनार, क्‍या मजाल कि घंटे-भर के लिए पधारकर कई दिन न ठहर जाएँ!

अयोध्‍या में कभी हरिश्‍चन्‍द्र अज थे, सो अब नहीं रहे। दिलीप थे, रघु थे, भगीरथ थे, सो भी नहीं रहे; इक्ष्‍वाकु, दशरथ, रामचन्‍द्र कोई नहीं रहे। एक सरयू है मटमैली फैली, अपने भूत की छाया से भीषण बाधित। असल में अयोध्‍या आदमी के बनाए बनी हुई थी, भले वे आदमी राम-जैसे शक्तिमान क्‍यों न रहे हों। वैसे आदमी नहीं रहे तो अयोध्‍या राँड हो गई। चुनार में आदमी रहें या न रहें, उसे प्रकृति-दत्त शोभा सुलभ है। आदमी आएँगे, आदमी जाएँगे, लेकिन आदमी क्‍या कोई भी जीव जब चुनार के आगे आएगा तो वह वहाँ कुछ दिन तक बसना, रमना चाहेगा। एक तरफ गंगा: भागीरथी, एक तरफ जरगो विन्‍ध्‍य-बालिका, चुनार दोआबा। कंकड़ फेंकिए तो विन्‍ध्‍याचल प्रचण्‍ड पहाड़ के आँगन में गिरे। चुनार विन्‍ध्‍याचल का आँगन ही तो है। मीठे जीवनप्रद कुएँ, निर्मल नीरपूर्ण तालाब, बावलियाँ बाग, उपवन, वन, सहस्र-सह्स्र वर्षों के इतिहासों के चरण-चिह्न चुनार में चतुर्दिक्। रामचन्‍द्र की अयोध्‍या में इनमें से एक भी नहीं, बस राम का नाम है।

चुनार से सटी विन्‍ध्‍याचल की सुखद घाटियों में पारिजात के, पलाश के, बहेड़े के, महुवे के वन-के-वन। जब शरद ऋतु में सारी घाटी पारिजात-पुष्‍पों की सुखद सुगंध से भर जाती है, लगता है, यही तो नन्‍दन-वन है। चुनार इतना स्‍मरणीक कि पहले सारे भारत से जो श्रद्धालु तपस्‍या करने के लिए काशी या प्रयाग पधारते थे, वे तत्‍वंत: तपते थे चुनार या मिर्ज़ापुर-विन्‍ध्‍याचल की उपत्‍यकाओं ही में। कहते हैं किशोर राम ने ताड़का और सुबाहु को चुनार के निकट ही कहीं मारा था। क्रान्तिकारी ब्रह्मर्षि वैत्तानिक विश्‍वामित्र का सिद्धाश्रम चुनार के निकट ही है। मेरा ख़याल है अयोध्‍या के आस-पास चुनार-जैसा कोई महामनोरम स्‍थान नहीं था—राम के ज़माने में भी। तभी ऋषि विश्‍वामित्र राजा दशरथ से आग्रह करके राम और लक्ष्‍मण को चुनार दिखलाने को ले गए थे। राम चुनार न गए होते तो शायद ही राम होते, क्‍योंकि विश्‍वामित्र ने चुनार ही के आस-पास उन्‍हें वे विद्याएँ दी थीं—शस्‍त्रास्‍त्रों के प्रयोग की शिक्षा, जो सारे जीवन रघुनन्‍दन के काम आती रहीं। क्‍या है राम की अयोध्‍या में? पुरी कहलाती है बड़ी। अयोध्‍या में मन्दिर हैं, मूर्तियाँ हैं। यानी पत्‍थर हैं अयोध्‍या में। मैं कहता हूँ सारी अयोध्‍या में जितने गढ़े-गढ़-मन्दिर-मूर्तियाँ हैं, उतनी और ऊपर से उतनी ही और चरणाद्रि (चुनार) की अनगढ़ पार्वतीय विभूति के बाएँ चरण की सबसे छोटी अँगुली के नाख़ून से निकाली जा सकती हैं।

आपने अयोध्‍या देखी है? नहीं? और चुनार? वह भी नहीं? बन्‍दा तो चुनार ही की मिट्टी है एक ओर, तथा दूसरी ओर किशोरावस्‍था में, साधुओं की रामलीला-मण्‍डली में, जानकी बनकर सावन के झूलनोत्‍सव में अयोध्‍याजी में झूला भी झूल चुका है। सो, ऊपर चुनार के साथ अयोध्‍या का नाम फोकट-फीके नहीं लिया गया है। त्रेता में जिस अयोध्‍या में राम बाम दिसि जानकी विराजा करती थीं, कलिकाल में उसी अयोध्‍या में, रामलीला में ही सही, कुछ दिनों बेचन पाँडे भी सीताजी बना करते थे। और हज़ार-हज़ार लोग-लुगाइयाँ, हज़ार-हज़ार मेरे किशोर सुकुमार चरणों की धूल आँखों में आँजा करती थीं। सो, जिसकी अपनी जोरू ज़िन्‍दगी-भर नहीं रही, वह ज़िन्‍दगी के आरम्भिक वर्षों में ही राम की जोरू बन चुका था। यानी यह जो आज बड़े तीसमारख़ाँ बनते हैं पाण्‍डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ दरअसल जोरू हैं राम की। मगर क्‍या होंगे! राम की जोरू थे कबीरदासजी:

बालम! आओ, हमारे गेह रे!

तुम बिनु दुखिया देह रे!

सब कोई कहै तुम्‍हारी नारी!

मोहि होत सन्‍देह रे!

एकमेक ह्वै सेज न सोहे

तब लगि कैसा नेह रे?

… … …

है कोई ऐसा पर-उपकारी

प्रिय सों कहै सुनाय रे!

अब तो बेहाल ‘कबीर’ भये हैं

बिनु देखे जिय जाय रे!

बालम, आओ हमारे गेह रे!

अयोध्‍या (जिससे युद्ध न किया जा सके—अजेय) का वर्णन करते हुए आदि कवि ने बतलाया है कि उस वर-नगरी के सभी निवासी धर्मात्‍मा, बहुश्रुत, अपने-अपने धन से सन्‍तुष्‍ट, अ-लालची और सत्‍य-वक्‍ता थे। उस नगरी में साधारण विभूतिवाला कोई भी नहीं था, कम परिवार-कुटुम्‍बवाला कोई नहीं था; ऐसा कोई नहीं था जिसकी मनोकामनाएँ पूर्ण न हो चुकी हों या जिसके पास गाय, घोड़े, धन-धान्‍य का अभाव हो। उस पुरी में कामी, कापुरुष, क्रूर, कुबुद्धि और नास्तिक चिराग़ लिये ढूँढ़ने पर भी दिखाई नहीं देते थे। वहाँ कोई भी शख्‍स कुण्‍डल, मुकुट और माला वगैर नहीं दीखता था…उस नगरी में असत्‍यवादी, अविश्‍वासी और अबहुश्रुत आदमी एक भी नहीं था। न कोई ग़रीब था, न विक्षिप्‍त; कोई किसी प्रकार से भी दुखी नहीं था। अयोध्‍या के चारों ओर आठ कोस तक एक-से-एक हाथी-ही-हाथी नज़र आते थे। अतएव उसके नाम का अर्थ होता था— अजेय। इक्ष्‍वाकुवंशी चक्रवर्ती सम्राट दशरथ की अयोध्‍या का यह वर्णन आदि कवि के शब्‍दों में है— बालकाण्‍ड में। अयोध्‍या काण्‍ड के आरम्‍भ में, रामचन्‍द्र के युवराजतिलकोत्‍सव की तैयारी के सिलसिले में भी, महाकवि ने अयोध्‍या की महत्ता का वर्णन गौरवशाली किया है: जब पुरवासियों ने सुना कि आज ही रामचन्‍द्र का अभिषेक होने वाला है तो सब लोग अपना-अपना घर सजाने लगे। धवल मेघ के शिखर की तरह शुभ्र देवालयों, चौराहों, मार्गों, बागीचों, अटारियों, विविध वस्‍तु-भरे बाज़ारों, परिवार-भरे भवनों, सभी सभा-भवनों तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्षों पर सचिह्न और अचिह्न पताकाएँ फहराई गईं…राज-मार्ग में जहाँ-तहाँ फूल-मालाएँ सजाई गई थीं और सुगन्धित धूप जलाई गई थी। रात्रि के समय रोशनी के लिए गली-कूचों तक में दीपकों के वृक्ष जगमगाए गए थे… इन्‍द्र की अमरावती पुरी के समान सुन्‍दर अयोध्‍यापुरी एकत्रित जन-समुदाय से मुखरित होकर जल-जन्‍तुओं से पूर्ण समुद्र के जल-जैसी जान पड़ने लगी… मन्‍थरा ने देखा, चारों ओर अमूल्‍य ध्‍वजा-पताकाएँ फहरा रही हैं, रास्‍ते साफ-सुथरे हैं…चन्‍दन का छिड़काव चारों तरफ़ हुआ है, स्‍नान के बाद चन्‍दनादि लगाए अवधवासी परम प्रसन्‍न मटरगश्‍ती कर रहे हैं। ब्राह्मण हाथ में माला और मोदक लिये मंत्रोच्‍चार कर रहे हैं, सारे-के-सारे देव-स्‍थान चूने से उज्‍जवल कर दिए गए हैं। साथ ही सभी तरह के गाजे-बाजे बज रहे थे…हाथी-घोड़े हैं, गाय-बैल भी प्रसन्‍न बोल बोल रहे हैं। प्रमुदित पुरवासी ऊँची ध्‍वजाएँ फहराते दौड़ रहे हैं।

इतने बड़े उद्धरण का अभिप्राय यह है कि महाकवि ने पुरुष-रचित जिस अयोध्‍या का वर्णन किया है वह वस्‍तुत: आज नहीं, त्रेता युग की है। फिर भी, उसकी सफ़ाई, रोशनी, छिड़काव, जनता को तरह-तरह से सुख पहुँचाने का सक्रिय निश्‍चय आज के कतकत्ता-बम्‍बई ही नहीं लन्‍दन-न्‍यूयार्क के म्‍यूनिसिपल कॉर्पोरेशनों के आगे आज भी प्रसन्‍न चुनौती-जैसा है।

अब मेरे चुनार का अहवाल सुनिए। त्रेता नहीं, द्वापर भी नहीं, चुनार की कहानी कलियुग की है। सन् 1905 ई. में चुनार मैंने कैसा पाया था, (तब मैं महज़ पाँच वर्ष का था) उसका वर्णन भी आज पचपन वर्ष बाद कम मनोरंजक नहीं है। तब वह छोटी-सी बस्‍ती पाँच-सात हज़ार प्राणियों की रही होगी। चुनार में चरण की आकृति की एक पहाड़ी है, जिसका तीन भाग गंगा में है और चौथा धरती की तरफ़। इस पहाड़ी के कारण चुनार का नाम ‘चरणाद्रि भी संस्‍कृज्ञों से सुना था। इसी पहाड़ का एक परम प्राचीन दुर्ग है। उसका सम्‍बन्‍ध द्वापर युग के प्रसिद्ध सम्राट जरासन्‍ध से जोड़ा जाता है। किले में एक विकराल तहख़ाना है— बड़े विस्‍तार-अपार अन्‍धकारवाला। कहते हैं जरासन्‍ध ने पराजित करने के बाद सोलह हज़ार राजाओं की रानियाँ छीन उन्‍हें चुनार दुर्ग के तहख़ानों में कैद कर रखा था। फिर, कहते हैं, उज्‍जयिनी के सम्राट विक्रमादित्‍य ने अपने राजा भाई भर्तृहरि के लिए इस दुर्ग का पुनरुद्धार कराया था। किले में योगिराज भर्तृ‍हरि की समाधि है। किले के बाहर, दक्षिण तरफ़, पहाड़ी में गंगा-तरंग कल-सीकर-शीतलानि के निकट एक गुहा है। कहते हैं राजर्षि भर्तृहरि उसी में तप-स्‍वाध्‍याय-निरत रहते थे। विश्‍वासी लोग आज भी भर्तृहरि की आत्‍मा का आवास चुनारगढ़ के आस-पास मानते हैं। इस दुर्ग का इतिहास सर्वथा कौतूहल एवं रहस्‍यमय है। आल्‍हा-ऊदल नाम के वीर-बहादुर दोनों भाइयों का कभी इस किले पर क़ब्‍जा था—विदित बात है। वीर-रस के विख्‍यात हिन्‍दी-काव्‍य आल्‍हा-रामायण में इन्‍हीं भाइयों के शौर्य की गाथा है। इस किले से सम्राट हुमायूँ, शेरशाह सूरी, वारेन हेस्टिंग्‍स, विद्रोही राजा चेतसिंह, पंजाब की महारानी ज़िन्‍दा, वाजिद अली शाह का भी सम्‍बन्‍ध रहा है। गत द्वितीय महायुद्ध के युद्ध-बन्दियों को ब्रिटिश सरकार इसी किले में रखती थी। सन् ’42 के भारतीय महाजागरण में राष्‍ट्रीय कर्मी भी इसी किले में बन्‍द रखे गए थे। फिर स्‍वराज्‍य होने के बाद बंगाल के पुरुषार्थी चुनार गढ़ में बसाए गए थे। हिंदी के आदि-उपन्‍यासकार बाबू देवकीनन्‍दन खत्री के परम प्रसिद्ध उपन्‍यास ‘चन्‍द्रकान्‍ता’ और ‘चन्‍द्रकान्‍ता सन्‍तति’ एवं ‘भूतनाथ’ में इस किले का ऐसा महामोहक वर्णन है कि पढ़ने वाले के हाथ से उपन्‍यास छूटते नहीं। चुनार दुर्ग के बाहर, पूर्व तरफ़, प्राय: पाव कोस पर, एक आचार्य कूप है। कहते हैं, श्री वल्‍लभ महाप्रभु जब भारत-भ्रमण को सपरिवार निकले थे तब, चुनार में उनके पुत्र विट्ठल महाराज का अवतार हुआ था। कहते हैं श्री वल्‍लभाचार्य ने नवजात शिशु उसी कूप को सौंप दिया था कि तब तक वही उसका लालन-पालन करे जब तक प्रभु देश-भ्रमण से लौट नहीं आते। कहते हैं प्रभु वल्‍लभाचार्य कई वर्ष बाद जब लौटे तब उस कूप ने उनका पूत उन्‍हें सही-सलामत सौंप दिया, जो अब शिशु नहीं, कई वर्ष का किशोर था। चुनार वल्‍लभ सम्‍प्रदायियों के पुण्‍य तीर्थों में है।

मुस्लिम ज़माने में चुनार के किले में हज़रत मुहम्‍मद की दाढ़ी का पवित्र बाल भी सादर सुरक्षित रहता था। चुनार के दर्शनीय स्‍थानों में एक दरगाह भी है — मशहूर मुस्लिम वली हज़रत क़ासिम सुलेमानी की। मेरे छुटपन में दरगाह का मेला हर साल जोरदार होता था, जिसमें बिना भेद-भाव मुसलमान-हिंदू, शहराती-देहाती सभी शामिल होते थे। मेरे बचपन में चुनार की आबादी में रुपए में पाँच आने मुसलमान थे, जिनमें रईस, साहबेफ़न और नवाबज़ादे भी थे।

उन दिनों किलों की कद्र थी, अत: चुनार में अंग्रेज़ आए। जब मैं पाँच-सात साल का था तब चुनार के किले में गोरा-तोपख़ाना पलटन रहती थी। रहते थे शत-शत अंग्रेज़ सोल्‍जर्स और आते-जाते रहते थे। चुनार के किले के पीछे एक पुरानी कब्रगाह है जिसमें देखिए तो ब्रिटेन के अनेक स्‍थानों के प्राणी कब के दफ़नाए दम-ब-खुद पड़े हैं। कब्रों पर उनके नाम-पते पढ़कर ताज्‍जुब होता है नियति के विलास पर, जो इंग्‍लैंड की मिट्टी को चुनार में दफ़नाने का विधान करती है। बहुत दिनों तक चुनार में रिटायर्ड गोरे सपरिवार रहा करते थे। ‘लोअर लाइंस’ नामक अपनी एक बस्‍ती उन्‍होंने कालों के कस्‍बे की पिछली सीमा पर बसा रखी थी। साथ ही, गंगा-तट के निकट बड़े-बड़े पार्क-बँगले बनवाकर उनमें समर्थ अंग्रेज़ अधिकारी या उनके गोरे सम्‍बन्‍धी रहा करते थे। ये बँगले नम्‍बरों से नामी थे, जैसे बँगला नं. 1, नं. 8, नं. 20। सन् 1905 ई. में चुनार की पाँच-सात हज़ार की आबादी के सिरहाने दो-दो गिरजाघर थे। एक परेड ग्राउण्‍ड की कब्रगाह के पास जर्मन मिशनरियों का रोमन कैथलिक चर्च और दूसरा प्रोटेस्‍टेण्‍ट चर्च शहर के बीच में था। ईसाई या अंग्रेज़ों की संख्‍या शहर में चाहे जितनी रही हो, पर उनका प्रभाव कितना था इसकी सूचना ये चर्च देते थे। मेरे स्‍वर्गीय पिता जिस मन्दिर में पूजन किया करते थे उसके चबूतरे पर खड़े होकर, पाँच-सात की वय में, मैंने गोरे सोल्‍जरों के तोपखाने की मार्च मज़े में देखी थी। किले से परेड ग्राउण्‍ड तक ये गोरे सिपाही मार्च करते हुए अक्‍सर जाया करते थे। मैदान में मिलिटरी बैण्‍डवालों की परेड तो मुझे आज भी भूली नहीं है। कई प्रकार के बाजेवाले, सभी गोरे, ड्रम—ओह! कितना बड़ा! इन बैण्‍डवाले सिपाहियों के बीच में बाघम्‍बर धारण किए, हाथ में गदा-जैसी कोई वस्‍तु हिलाता चलता था एक नाटा, गुट्ठल-सचमुच व्‍याघ्रमुख कोई दैत्‍य-देही गोरा! तब चुनारवालों को ये गोरे महाकाल के दामाद दसवें ग्रह-जैसे लगते थे। अक्‍सर लोग इनकी छाया से भी दूर भागते थे। लोअर लाइन्‍स से गुज़रनेवाले ग़रीब ग्रामीणों या चुनारियों को ये रिटायर्ड या सिपाही गोरे कारण-अकारण बेंतों से बुरी तरह सिटोह दिया करते थे। औरतें तो लोअर लाइन्‍स में जाने की हिमाक़त कर ही नहीं सकती थीं। जरगो नदी पार से शहर को विविध वस्‍तु बेचेने आने वाली अहीरिनों, कोरिनों, चमारिनों, को अक्‍सर, उन्‍मत्त गोरे दौड़ा लेते थे, रगड़-सगड़ देते थे पशुरत—रेप! सो, क्रिश्चियनों के मुहल्‍ले से कोई भी देसी स्‍त्री गुज़रने की हिम्‍मत नहीं करती थी। इस राह के बराबर, दूर के रास्‍ते, देर के रास्‍ते से बाज़ार पहुँचती थीं। उन दिनों नित्‍य ही सद्दूपुर मुहल्‍ले की बँभनटोली गली से सोल्‍जर्स, एंग्‍लो-इण्डियन गोरा-काला पादरी, और वह घोड़ी-सवार मेम विधवा मिसेज़ विल्‍सन गुज़रती थी। भयभीत कौतूहल से मुहल्‍ले के हम अधनंगे बच्‍चे ‘साहब, सलाम!’ और ‘मेम साहब, सलाम!’ किया करते थे। मेम साहब घोड़ी की एक तरफ़ बैठी, रोज़ ही बाज़ार लेने स्‍वयं जाती थीं। वह घोड़ी पर चढ़ी-ही-चढ़ी सारी चीज़ें ख़रीदती थीं। मछली, मुर्गी, मांस, तीतर-बटेर, साग-सब्‍ज़ी, ऋतु-फलों का उन दिनों चुनार में ढेर-ही-ढेर लगा रहता था। तब घी रुपया सेर बिकता था। लेकिन घी खाने योग्‍य पैसे तब अपनी गिरह में थे ही नहीं। घी जब इतना सस्‍ता था तो अनाज भी तो भूसा-भाव रहा होगा। अनाज, गुड़, खाँड, चीनी सभी पानी के मोल थे, फिर भी, अपने लिए दुर्लभ थे। ‘सुरसरि, तीर बिनु नीर दुख पाइहै, सुर-तरु तरे तोहि दारिद सताइहै’—तुलसी बाबा वाली बात हमारे सामने थी। दारिद्र्य में कष्‍ट होता है यह जानने लायक तो मैं हो गया था, पर दारिद्र्य में अपमान भी कुछ है, मुझे मुतलक पता नहीं था।

चुनार की एक कथा तो मैं भूल ही गया। उन दिनों बंगाल या काशी से एक-से-एक भद्र बंगाली परिवार दो-चार महीने रहकर स्‍वास्‍थ्‍य-लाभ के लिए अक्‍सर चुनार आते थे। अनेक बंगाली जन तो यत्र-यत्र बँगला या घर बनाकर बस भी गए थे। साल में कम-से-कम आठ महीने ये बंगाली चुनार के हर ख़ाली मकान में किरायेदार बनकर टिकते, जिससे कतिपय लोगों को कुछ आमदनी भी हो जाती थी। चुनार में अक्‍सर बंगाली संन्‍यासी या दार्शनिक सानन्‍द रहा करते थे। उनका वहाँ की जनता पर प्रेमपूर्ण प्रभाव था। एक-दो बंगाली बाबुओं का एलोपैथी दवाख़ाना भी था। एक-दो बंगाली महाशय प्रोफ़ेशनल न होने पर भी होम्‍योपैथी या आयुर्वेद के अच्‍छे अभ्‍यासी थे, जो लोगों का प्रेम से इलाज करने में सुख पाते थे। मगर मुझे बंगाली बन्‍धु उतने याद नहीं आते, जितने भयंकर, प्रचण्‍ड प्रताप वाले गोरे और उनके अनेक रिटायर्ड परिवारी। वह आयरिश बूढ़ा मिस्‍टर क्‍लार्क जो देहाती मजूरों से अच्‍छी हिन्‍दी बोलता था और बागवानी तथा खेती कराता था। चीते-सी आँखें, हनुमान-सा-मुखड़ा। कैसी हिन्‍दी बोलता वह कि मनोरंजक! और मिस्‍टर कूम जो लोअर लाइन्‍स का जनरल-मर्चेंट था। वे चीज़ें जो कलकत्ता-बम्‍बई-बनारस-इलाहाबाद ही में मिल सकती थीं, मिस्‍टर कूम के स्‍टोर्स में भी होती थीं। मिस्‍टर कूम रिटायर्ड सेना-अधिकारी थे। उनका बड़ा भारी बँगला लोअर लाइन्‍स के नाके ही पर था। मिस्‍टर कूम कुत्तों के बड़े शौकीन थे और जब घूमने निकलते थे तो उनके साथ चार-छह किस्‍म के कुत्ते ज़रूर होते थे। कूम साहब अक्‍सर हाथ में गेंद लेकर निकलते। गेंद वह दूर-सुदूर भरपूर ज़ोर से फेंकते कि कुत्ता ले आए और कुत्ता गेंद ले आता साहब। और हम अधगामड़िए छोकरे हैरत से हैरान रह जाते : ‘साहब, सलाम!’ कूम साहब के स्‍टोर्स में एक-से-एक शराबें मिलती थीं। उनके बँगले में गोरों के लिए एमर्जैंसी होटल-जैसा था। मिस्‍टर ओब्रायन नामक एक बूढ़े हथकटे गोरे सिपाही ही याद आती है जो नेवीकट दाढ़ी रखता था। चुनार नोटिफ़ाइड एरिया का वह सुप्रिंटेण्‍डेण्‍ड था। नगर की सफ़ाई वग़ैरह उसी के चार्ज में थी। उसका एक हाथ बिलकुल कट गया था। कोट की दाहिनी आस्‍तीन यों ही लटकती रहा करती थी। वह बाएँ हाथ में बेंत लेकर मिलिटरी फुरती से चलता था। किसी भी काले आदमी को गली में बैठकर लघुशंका वग़ैरह करते देखते ही दे बेंत, दे बेंत! सिटोहकर धर देता। फिर रिपोर्ट, ऊपर से जुर्माने होते थे। मेरी गली में चिंगन तेली पर मिस्‍टर ओब्रायन का बेंत कई बार बरसा था, क्‍योंकि चिंगन तेली सरे-राह बैठकर पेशाब करना अपना जन्‍मसिद्ध अधिकार मानता था। इस तीखे अंग्रेज़ को देखकर मेरे तो होश फ़ाख्‍ता हो जाते थे। मैं उससे कम-से-कम बीस गज़ दूर रहने की कोशिश करता था। चिट्टा-गोरा बिलाड़ जैसे सूट पहन ले। दाहना हाथ टूटा। बाएँ में चमड़ा-मढ़ा बेंत। तेज़, चालाक चाल। सपने में जैसे प्रेत! ‘टुटवा साहब’ हम उसे सभय पुकारते थे। अपने लिए टुटवा साहब-जैसा हेय प्रयोग सुनते ही कहने वाले को, ख़ाह वह बूढ़ा हो, जवान या बालक, बिना पकड़े, बिना पीटे, बे-सताये वह छोड़ता नहीं था।

घोड़ी पर सवार गली से बाज़ार गुज़रने वाली यूरोपियन विधवा मिसेज़ विल्‍सन का नाम आगे आ चुका है। एक दिन की बात है, मेरे चाचा छत पर बने पूजा-घर में ठाकुर की सेवा के सिलसिले में पूजा-पात्र वग़ैरह धो रहे थे कि मिसेज़ विल्‍सन अपनी घोड़ी पर छत के निकट से गुज़री। दुर्भाग्‍य से उसी समय ऊपर से गन्‍दे पानी की धारा यूरोपियन महिला पर बरस पड़ी। फिर क्‍या था! मेम साहब मेरे चचा पर बेहद गरजीं, बरसीं – ब्‍लडी, डैम-फ़ूल तक आईं। चचा से बरदाश्‍त नहीं हुआ। वह स्‍वाभिमानी और अच्‍छे वैद्य थे। चुनार में उनका आदर-मान था। मेम साहब को डाँट के स्‍वर में उन्‍होंने कहा — ख़बरदार, जो बदज़बानी की! इस पर मेम साहब बकबकाती चलती बनीं। लेकिन दो ही घंटे के भीतर चचा साहब को पुलिस थाने में हाज़िरी देकर विलायती मेम के दबदबे से दबना पड़ा था। बीसवीं सदी के आरम्‍भ में गोरी सेना, रिटायर्ड अंग्रेज़ और ईसाइयों के सबब वज्र ग्रामीण चुनार का एक भाग बम्‍बई और कलकत्ते के किसी स्‍वच्‍छ भाग की तरह तत्‍कालीन आधुनिकता से मण्डित था। नोटिफ़ाइड एरिया की ओर से सारे चुनार में अगर दो सौ लैम्‍प पोस्‍ट खड़े किए गए होंगे, तो उनमें से सौ से ऊपर केवल लोअर लाइन्‍स में लगाए गए होंगे, जहाँ गोरे बसते थे। छोटी बस्‍ती, सुथरी सड़कें, शान्ति-सुख-निवास की तरह छोटे-छोटे हरे-भरे बँगले, वज़नी और हलके-फुलके फ़रनीचर, फ़ैशनदार परदे, दरियाँ, गलीचे, अच्‍छी तरह पहन-खा-पीकर लोआपोआ गोरे बच्‍चे। गुड़ियों की बीबियों-जैसी हाथीदाँत के बने यूरोपियन बालक। गुलले, तमंचे, बन्‍दूकें, रैकेट, बैट, फुटबाल, स्टिक। कैसे-कैसे कुत्ते! पॉकेट डॉग, फॉक्‍स टेरियर, अल्‍सेशियन, बुलडॉग। कुत्तों की रखवाली पर नियुक्‍त नौकर-चमार, भंगी, मेहतर—जिनके तन पर ऐसे साफ़ कपड़े जैसे हमारी बंभनटोली में एक के भी नहीं। मेरी स्थिति तो कुछ पूछिए ही मत। सिवाय मैली, मारकीनी, मुफ्त मिली धोती और एकमात्र कुर्ते के बन्‍दे के सिर पर तो दो पैसेवाली दुपलिया भी मुहाल न थी। न ही चरणों में चमरौधा ही। पर उक्‍त स्थिति शिकायतजनक आज मालूम पड़ सकती है। उन दिनों तो घनघोर अभावों में भी मैं दुखी था, ऐसी बात नहीं। बल्कि सुखी ही था। बचपन और यौवन शायद स्‍वयं में इतने भरपूर होते हैं कि उस आलम में अभाव भी भावों-भरे भासते हैं। असल में अज्ञान में बड़ी गुंजायश होती है। मेरा ज्ञान मेरे गले पड़ा— लिखा कवि ‘देव’ ने— ‘याहि ते मैं हरि ज्ञान गँवायो।’ गाया गोस्‍वामी तुलसीदास ने— (यह ज्ञान) ‘परिहरि हृदय कमल रघुनाथहिं बाहर फिरत बिकल भयो धायो।’ ज्ञान सीमित होता है जब कि अज्ञान की (ईश्‍वर की तरह) कोई सीमा नहीं। समझिए तो, जीवन में जितना भी सुख है अज्ञान ही के सबब होता है। देखिए तो, जगत् में ज़्यादातर जीवधारी अज्ञानी ही होते हैं। फिर इस ज्ञान की कोई गारण्‍टी नहीं कि कब अज्ञान न साबित हो जाए। विलोकिये आधुनिकतम विज्ञान की तरफ़। कल तक पृथ्‍वी ध्रुवों की ओर नारंगी-जैसी चपटी मानी जाती थी, लेकिन अब पता चल रहा है कि विश्‍वगोलक का नक्‍शा कुछ और ही तौर का है। पृथ्‍वी सन्‍तरे-सी नहीं, सेब-जैसी है। ज्ञान के गिरगिटपन के ऐसे-ऐसे शत-शत उदाहरण सहज ही पेश किए जा सकते हैं। जीवन में मात्र परेशान होने के लिए ज्ञान का जिज्ञासु, मेरे जाने, अपनी आँखें अज्ञान में खोलता है; मूँदता है आँखें अपनी अनन्‍त अनाश अज्ञान में।

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