बनारस और कलकत्ता
जब मैं चुनार से बनारस पढ़ने आया तब मन-ही-मन अपने सामाजिक स्टेटस पर बड़ा ही लज्जित-जैसा महसूस करता था। गुणहीन, ग़रीब, गर्हित चरित्र-लेकिन साल-दो साल रहकर जब काशी में कलियुगी रंग देखे तब दुखदायी होने पर भी चरित्रहीनता में मेरा बड़ा भाई मन के मुकाबिले में माशा-मात्र मालूम पड़ा। माफ़ी जलालपुर गाँववाले जिसे पाप मानते थे, चुनारवाले चरित्रहीनता, बनारसवालों की नज़र में वह रोज़मर्रा था। ‘आँखें नीचे कर चल रे!’ कहावत की बहू से सास ने कहा था— ‘बनारसवाले आँखों ही से बलात्कार करते हैं।’ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने दुछत्ती के दरवाज़े से देखा था नीचे ठठेरी बाज़ार में किसी परम सुन्दर रमणी के पीछे-पीछे कनफटे बाबा को ताक-झाँक में जाते और कहा— ‘मृग-नैनी को नैन-सर बाबाजी को लाग, गयो कमण्डल… में, चर्रानो बैराग।’ चुनार में चित्त या पट्ट पातक को पापी छिपाने की कोशिश करता, लेकिन बनारस में उसी को मज़ाक-ही-मज़ाक में मुश्क बू की तरह हवा के हवाले किया जाता। कैसा भी अधम पातकी समाज के परमपावन की तरफ़ अँगुली उठाकर उसको प्रमाणित कर सकता था पाषंडी—परम; हृदय आन, मुख आन; डूबकर निगलनेवाला; घउरघप्प! सेन्टर जेल में पहुँचने पर एकबारा अपराधी जब शत-शत दोबारा और सेबारा अपराधियों को देख लेता है—स्वयं से कहीं भयानकतर—तब उसे जो आत्म-सन्तोष होता है वही सन्तोष चुनार से बदमाशी सीखकर आने के बाद बनारस के एक-से-एक प्रतिभाशाली, भाग्यशाली, बदमाशों को देखने पर मुझे हुआ। फलत: मन से हीनता की भावना धुल-सी गई। लगा, यहाँ यही सही कि करो कुछ, बताओ कुछ। या करो भी—बताओ भी। डरो, क्यों? आलोचक ऊपरी मात्र होते हैं—चलते—नहीं तो यहाँ दूसरे की ख़बर लेने जितनी फुरसत है किस भले आदमी को? सामने पड़े, झट से राय दी, आगे बढ़े और भूल एक! सो, छान! छान! किसी रण्डी-भड़वे की न मान! काशी की हवा में ज्ञान इस क़दर कि शंकराचार्य से वहाँ का चाण्डाल बहस कर बैठा था; मंडन मिश्र की मज़दूरन दो-चार सुना गई थी; काशी के तोते तक शंकराचार्य से संस्कृत में टर्रर-टर्रर करने की हिमाकत कर सकते थे।
जब मैं विद्यार्थी था तब की काशी में प्रियंवदा मज़दूर में थीं, चार्वाक चाण्डाल थे, टर्रर-टर्रर तोता-रटन्त श्रुति-धारी द्विज थे—अलबत्ता नहीं थे तो करुणामय संन्यासी दार्शनिक दिव्य शंकराचार्य महाराज। कुछ लोग कमज़ोर भी होते हैं और कुरूप भी। कमज़ोरी भी अगर ‘कट’ वाली हो—अदावाली—तो कलामयी हो उठती है। मेरे एक परम आदरणीय बन्धु थे। अच्छे पढ़े-लिखे, ख़ासे खाते-पीते। कविता का शौक़, कसरत का शौक़, दिलफेंक यार। जवानी में एक हाकी खिलाड़ी नौजवान की सुगठित देह देखी और फ़िदा हो गए। बरसों उनकी भावुकता उस देही से गिर्द भ्रमराती रही। ब्याह और दो-तीन बच्चे तक हो जाने के बाद जनाब की नमकीन निगाहों में दालमण्डी की एक तवायफ़ नाच ही गई। हज़रत का रोम-रोम गा चला वसन्त बहार—ललकार, ललकार! पत्नी से भी जनाब ने बतला दिया कि उनकी जान की राहत तो फलाँ जान हैं। वह मुझसे उम्र में दूने रहे होंगे—ज़ियादा ही, लेकिन—घण्टे-घण्टे–भर वह उस तवायफ़ के नाक-नक़्श के फ़साने मजनूँ-मुख बनाए गाते रहते। बात यह थी कि औक़ातवाले दिखने पर भी वह दिल ही फेंक सकते थे—दिरमोदाम नहीं। और वह थी रण्डी। मजनूँ को भी ख़ाली हाथ देख झाड़ू उठाने वाली और नामालूम खाँ पर भी टके पाते ही टकटकी लगाने वाली। सो, मेरे यार का इश्क़ बेक़रार वसन्त-बहार के आगे न जा पाता। श्रीमान् माशूक की तरह सज-बजकर दालमण्डी जाते!—क्या साज-बाज! घण्टे-भर में दाढ़ी बनाते, आधे घंटे तक मूँछों का ‘कर्व’ या बाँकपन सँवारते, होंठ देखते, नासिका पर सपाटक हाथ फेरते, कपड़ों पर इस्तरी-ब्रश करके भूल जाते—फिर करते। ज़ियादा समय वह पूजा में लगाते थे या अंग्रेज़ी बूट पर पालिश करने में, कहना कठिन है। इसके बाद महफ़िल में जिस आहिस्तगी से उन दिनों तवायफ़ें सजा करती थीं उसी आराम से लैस होकर, हाथ में छड़ी, सर पर क़श्तीनुमा टोपी ओढ़े महाशयजी दालमण्डी की उस तवायफ़ के दीदारों को चलते, जेब में हद-से-हद रुपया आठ आने की खेरची लिये। उस वेश्या के ठीक सामने वाली पानों की दुकान पर दो पैसों की गिलौरियाँ खाने के बाद यह मेरा बाँका यार नौ बजे से बारह बजे रात तक उस मंगलामुखी की तरफ़ देखता ही! जैसे सूरजमुखी देखे सूरज की तरफ़, अनवरत, एक पाँव पर पुलकित गात, पात-पात। कहते तो नहीं थे, पर सोचते वह मन में यही थे कि पैसे नहीं हैं जेब में तो क्या — बड़ी काया तो है, बड़ी आँखें, खड़ी-खड़ी मूँछें तो हैं। फिर विश्वनाथ-अन्नपूर्णा-दर्शन के पुण्य, पूजा-पाठ का प्रभाव। वह सोचते कि आँखों ही से उस वार वनिता को अर्श से फ़र्श पर खींच लाएँगे!
लेकिन पैसे से खिंचनेवाली ऐसे-वैसे जैसे-तैसे से कैसे खिंचती? मेरे मित्र के इस फोटक इश्क़ पर उनका भानजा खूब ही हँसता। वह भी जवान, तगड़ा बनारसी था। उसने मामाजी के प्रेम को नामर्दों का प्रेम बतलाया। वह किसी दिन जब मामाजी पान की दुकान पर खड़े वेश्या को घूर रहे थे तब, दस-बीस रुपये लेकर, उसी रूपा के कोठे पर चढ़ गया। इसके ज़रा ही बाद फ़र्श से मामाजी ने देखा कि उनका योग्य भानजा उनके सपनों की रानी के गाल-से-गाल सटाए ख़ुशहाल निहाल अर्श पर था। इस पर महाशय का दिल कुछ ऐसा चकनाचूर हुआ कि तबीअत हरी रखने के लिए हज़रत ससुराल चले गए। आठ बरस से नहीं गए थे जहाँ। वहाँ जाकर क्या देखते हैं आठ साल पहले उनकी जो साली दस साल की थी वह अब अट्ठारह की हो गई थी। ब्याह उसका कई वर्ष पूर्व हो चुका था लेकिन आराम से उस पर निगाह बनारसी रसज्ञ की अब पड़ी थी। ओ हो! इसका नक़्शा वही है जो उस वेश्या का! दोनों ही जैसे गुलाब के फूल, इस फ़र्क के साथ कि वेश्या का रस सूख रहा था और साली सरासर रसाली थी। मेरे मित्र बातों के सौदागर होने के सबब प्रभाव सामने वाले पर गुरुआई-भरा फ़ौरन डाल देते थे। उनका साला चेले की तरह उनके प्रभाव में था! सो, उन्होंने साले से कहा — साफ़ शब्दों में — कि उन्हें उसकी छोटी बहन जँच गई है, सो उसे उनके कमरे में वह किसी बहाने भेजे। और समझदार पढ़े-लिखे साले ने — आचरण पर सन्देह किए बग़ैर — छोटी बहन को बड़े बहनोई के कमरे में भेज दिया। और हिमाक़त यह कि ससुराल से लौटकर उन्होंने अपनी पत्नी को भी बतला दिया। छोटी-बहन-विजय की वार्ता। फलत: इसके तीसरे ही दिन जेठ की दुपहरी में दुछत्ती के कमरे में झाँकने पर बनारसी रसज्ञजी ने देखा! क्या देखा? देखा उनकी पत्नी उन्हीं के तगड़े, सुदर्शन, कुँवारे छोटे भाई अधरपान कर रही है—पिपासाकुल! मुझे कहना चाहिए कि वह ‘स्पोर्ट’ थे। चुपचाप, दबे-पाँव, छत से बैठक में आ रहे। मुझे कहना चाहिए कि वह साधु थे। सारे-का-सारा यह क़िस्सा उन्होंने ‘सरल-सुभाव-छुआ-छल-नहीं मुझे सुना दिया था।’ मुझे कहना चाहिए, ऐसे अल्हड़-बिल्हड़ आदमी ऐबों के बावजूद मुझे बहुत ही पसन्द आते हैं। कौन है बे-ऐब? बे-ऐब—बस एक ख़ुदा की जात है। ख़ुदा? जात? बाभन के हाथ की लेखनी भूल ही जाती है कि यह एटम युग है और राकेटों में कुत्ते और बन्दर अन्तरिक्ष की तरफ़ उड़ाए जा रहे हैं — अल्लाह के आसन की तरफ़ — भूँकने, बन्दर घुड़कियाँ दिखलाने के लिए।
बनारस देखने के बाद चुनारवाली इनफ़ीरिआरिटी कॉम्प्लेक्स मेरे मन से जाती रही —इस चर्चा में यह वर्णन हुआ है। चुनार में, फिर भी, लुके-छिपे जुआ होता, लेकिन बनारस में तो बागों में, बँगलों में, बजड़ों पर एक तरह खुले आम जुआ होता, शराबें होतीं, सुन्दरियाँ होतीं, वार-नारी, जार-नारी। चुनार में तब दो-ही-चार वेश्याएँ घोड़चढ़ी रही होंगी। सो भी शहर से दूर, सराय के नज़दीक। बनारस में पब्लिक-परियाँ बीच शहर में शत-शत की संख्या में प्रकट वेश्यालयों में थीं और शत-ही-शत संख्या में अप्रकट वेश्यालयों में। ऐसी रसीलियों की कमाई चुनार में सम्भ्रान्तों की नहीं बदमाशों और ब्रिटिश टामियों की थी जो इन्हें ‘लाल बीबी’ कहा करते थे, लेकिन बनारस की बिगड़ी औरतों की गहरी, सही कमाई वहाँ के छिपे-प्रकट रुस्तम मनचले बुद्धि और धनपतियों की थी।
कलकत्ता
‘यद्यपि विश्वनाथजी त्रिपाठी चुनार चले गए हैं, फिर भी चुनार ही के एक मुंशीजी उन्हीं के साथ रहते हैं, वह होंगे; मैं आपको अपने आदमी के साथ त्रिपाठीजी के स्थान पर सिंधीबागान में पहुँचवा देता हूँ।’ मुझे निराश-हताश देख, सम्भवत: मेरी दिक्क़त समझकर सहृदय मूलचन्दजी अग्रवाल ने कहा था। विश्वनाथ भाई के साथ चुनार के जो मुंशीजी रहा करते थे वह मेरे परिचित ही नहीं यजमान भी थे। उसी दिन उन्होंने चुनार सूचना भेज दी कि बेचन भाग आए हैं। एक ही हफ़्ते बाद विश्वनाथ भाई भी चुनार से आ गए थे। उन्हें मेरा वहाँ आना और रहना, उनकी सुविधाओं में ख़लल डालना, सुहाया नहीं था। फिर भी, तिरस्कार उन्होंने नहीं किया। एक ‘बासे’ वाले को कहकर मेरे खाने की व्यवस्था करा दी। जल्द ही उन्होंने मेरे लिए एक नौकरी भी तलाश की — आर.एल. बर्मन कम्पनी में। एक रुपया रोज़ पर मैं उस कम्पनी के दफ़्तर के बाहर की तरफ़ तख़्त पर बैठकर ग्राहकों के पते छपे फ़ार्मों पर लिखा करता। विश्वनाथ त्रिपाठी जब ‘विश्वमित्र’ के लिए विज्ञापन ढूँढ़ने निकलते तब अक्सर मुझे भी साथ ले लेते ताकि वह धन्धा भी मैं समझ की खोपड़ी में ढूँस लूँ। उन्हीं दिनों सन् 1920 वाली मशहूर महा कांग्रेस हुई थी जिसके अध्यक्ष थे लाला लाजपतरायजी! उसी कांग्रेस सेशन में असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ था। प्रस्ताव के विपक्ष में बोले थे मालवीयजी, मोतीलाल नेहरूजी, विपिन चन्द्रपाल जी।
कैसा जोश, कैसा ख़रोश, कैसे-कैसे हृदयस्पर्शी भाषण हुए थे! कितनी इज्ज़त थी गांधीजी की! प्रेसिडेण्ट होने के बावजूद लालाजी महात्माजी को पंखा झल रहे थे। राष्ट्रीय महासभा के उस क्रांतिकारी अधिवेशन के दर्शनों ने मेरे मन में जैसे राष्ट्रीय नशा भर दिया था, प्राणों में एक सपना—गौरव! मुझे लगा बनारस छोड़ राष्ट्रीय-रण के इस मौक़े पर कलकत्ता मैं अकारण ही आया! मुझे पुन: बनारस ही लौट जाना चाहिए। बनारस में फिर भी मेरा व्यक्तित्व विकस रहा था। लेकिन अपार कलकत्ता में तो मैं कुलीगीरी करने क़ाबिल भी कायाधारी नहीं था। कलकत्ता जाने पर, नौकरी तलाशने पर मुझे पता चला कि मैं किसी भी काम-क़ाबिल नहीं था। राष्ट्रीय-भावना के साथ इस नाक़ाबलियत ने भी कलकत्ता छोड़ने को मुझे कम उत्साहित नहीं किया। तब तक चुनार से बड़े भाई का पत्र विश्वनाथ भाई पर आया कि वह मुझे बनारस भेज दें — टिकट के रुपये समय पर मिलने वाला उधार। तब तक मैं एक मास के करीब आर.एल. बर्मन कं. में एड्रेस लिखने की नौकरी कर चुका था। लेकिन बिना नोटिस जो मैं छोड़ चलने पर आमादा हुआ तो कम्पनीवालों ने भी तनख़्वाह के नाम अँगूठा दिखा दिया। विश्वास करें — ज़िन्दगी में वही मेरी एकमात्र नौकरी थी जिसका वेतन आज तक मुझे नहीं मिला है। फिर मेरे पिता की सुगति विचारिए जो सारी ज़िन्दगी पुजारी की नौकरी करते रहे, लेकिन तनख़्वाह के रुपये मन्दिर-मालिक सेठ ही के यहाँ समय पर लेने को छोड़ देते थे। लेकिन जब समय आया, वह बीमार पड़े, तब साहूकार ने रुपये न दिए। न दिए मेरी भगिनी की शादी में— पिता दिवंगत हो गए। रुपये मिलते ही रहे।
जीवन-संक्षेप
सन् 1921 ई. में जेल से आने के बाद नितान्त ग़रीबी में, ग़रीब रेट पर, ‘आज’ में मैं सन् 1924 के मध्य तक राष्ट्रीय आन्दोलन के पक्ष में प्रचारात्मक कहानियाँ, कविताएँ, गद्य-काव्य, एकांकी, व्यंग्य और विनोद बराबर लिखता रहा। सन् ’23 में ‘महात्मा ईसा’ नाटक लिखा, ‘भूत’ नामक हास्य-पत्र मेरे सम्पादन में चालू हुआ। मेरी समाज-सुधारक कहानियों पर काशी के कुछ गुण्डानुमा पंडे सख्त नाराज़ हुए, हाथ-पाँव तोड़ देने की धमकियाँ मिलने लगीं। बीच-बचाव कर रक्षा की श्री शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ के पिता श्री महावीरप्रसाद मिश्र ने जो काशी के विख्यात डण्डेबाज़ दलपति तो थे ही, साथ ही, उत्तम साहित्यिक रुचि के पुरुष भी थे। ‘रुद्र’ जी के पिताश्री मेरा बहुत ही आदर करते थे और जब-जब मैं उनके यहाँ जाता और अक्सर जाता तब-तब चकाचक जलपान वह कराते, साथ ही, चलते समय रुपया-दो रुपया पान खाने को भी देते थे। शिवप्रसाद का यह ‘रुद्र’ नाम मेरे ही संकेत का परिणाम है। सन् ’24 के मध्य तक मैं हिन्दी में काफी चमकीला बन चुका था, लेकिन जीवन-यापन-भर रुपये काशी में कमाना असम्भव था। इस सन् में मैं काकनाडा कांग्रेस में भी शामिल हुआ था। वहाँ से कलकत्ता लौटने पर एक मित्र के साथ ‘मतवाला-मण्डल’ देखने गया। ‘मतवाला’ में मेरी भी कई रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी थीं। सन् ’24 ही में ‘मतवाला’-मण्डल में ही पहले-पहल (आचार्य) शिवपूजन (सहाय) और ‘निराला’ जी से मेरा आकर्षक परिचय हुआ था। सन् ’24 के आरम्भ में गोरखपुर के विख्यात साप्ताहिक ‘स्वदेश’ के दशहरा अंक का सम्पादन भी मैंने किया था, परम भयानक। पत्र छपा था प्रेमचन्दजी के सरस्वती प्रेस में। सारा अंक विस्फोटक आग्नेय मन्त्रों से भरा था। जैसे अनूप शर्मा की यह घनाक्षरी—
क्रान्ति की उषा से होगा रक्त भारतीय-व्योग ताप-भरा तेह का तरणि तमकेहीगा। भारो राजनीति के उदधि के उभारिवेको चारु कालचक्र चन्द्रमा-सा चमकेहीगा। वैरियों का दमन शमन होगा शक्ति ही से युद्ध घोषणा को कोई धर धमकेहीगा। कायरो! क्यों लेते हो कलंक को अकारथ ही भारत के भाग्य का सितारा चमकेहीगा।
उतावले ‘उग्र’ द्वारा सम्पादित ‘स्वदेश’ में सन् ’24 में प्रचण्ड ब्रिटेन के विरुद्ध कहा गया कि ‘युद्ध-घोषणा कोई कर धमकेहीगा।’ राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसके दो वर्ष बाद सन् 1926 ई. ही में लाहौर में, पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पास किया था। ‘स्वदेश’ के उस अंक को लेकर गोरी गवर्नमेंट में तहलका मचा, गवर्नर-इन-कौंसिल ने केस चलाने का निश्चय किया। प्रेमचन्द के भाई महताबराय पकड़े गए, सरस्वती प्रेस के प्रिण्टर। दशरथप्रसाद द्विवेदी गिरफ़्तार हुए ‘स्वदेश’ के संचालक, स्वदेश प्रेस रौंद डाला गया। लेकिन बन्देखाँ तब तक ‘मतवाला’— मण्डल में कलकत्ता थे। गोरखपुर का वारण्ट जब कलकत्ता आया, मैं बम्बई भाग गया। कलकत्ता पहली बार मैं घर से भागकर आया था। बम्बई पहली बार कलकत्ता से भागकर पहुँचा। और एक संगी के संग साइलेन्ट फिल्म कंपनी में काम करने लगा। पीछे वारण्ट था दफ़ा 124-ए बादशाह के विरुद्ध राजद्रोह (डिस अफ़ेक्शन) फैलाने के जुर्म का, लेकिन सामने थी बम्बई, फ़िल्म-कम्पनी, शराब, कबाब और जनाब क्या बतलाऊँ। मैं भूल ही गया जवानी के जोश में कि प्राणों के पीछे वारण्ट था जिसमें फँसने पर बड़ी-से-बड़ी सज़ा भी सहज ही मिल सकती थी। पाँचवे महीने पुलिस सी.आई.डी. ने मालाबार हिल पर मुझे गिरफ़्तार किया। तब गृहस्थ बनी हुई एक वेश्या मुझ पर आसक्त थी और एक अर्धवेश्या परसीक परम सुन्दरी पर मैं स्वयं बुरी तरह मोहित था। पाँव में बेड़ी, हाथ में हथकड़ी, भुजा पर सूती रस्सा बँधवाए तीन-तीन सशस्त्र पुलिसवालों के साथ मैं बम्बई से गोरखपुर भेजा गया। तीन महीने तक केस चलने के बाद मुझे नौ महीने की सख़्त सज़ा मिली। ‘स्वदेश’ संचालक को उसी केस में 27 महीने की सख़्त सज़ा मिली थी। सारी ग़लती मेरी थी, पर चूँकि मैं नाटा—नन्हा-सा दाढ़ी-न-मूँछ था और दशरथप्रसाद द्विवेदी उम्र-रसीदा दाढ़ीवाले सज्जन थे, अत: लोअर कोर्ट से हाईकोर्ट तक ने असल अपराधी बेचारे दशरथप्रसाद द्विवेदी को माना। तब अदालत ने मेरे बारे में घोषित किया था कि ‘यह तो इक्कीस साल का लल्ता है’ (He is a lad of twenty one years) सन् ’27 में जेल से आने के बाद मैंने ‘आज’ में ‘बुढ़ापा’ लिखा था और ‘रुपया’। सन् 26-27 की जेलों में होने पर भी प्राण मेरे अप्रसन्न नहीं थे। देखिए, जेल में क्या-क्या है—
‘बैरक’ है, ‘बर्थ’, ‘बेल’ बेड़ियाँ हैं, बावले हैं, ब्यूटीफुल बालटी की दाल बे-मसाला है। चट्टा है, चटाई, चारु-चीलर हैं चारों ओर तौक़, तसली है, तसला है और ताला है। जाहिर जहान जमा-मार जमादार भी हैं, कच्ची–कच्ची रोटी सड़े साग का नेवाला है। शाला, क़ैदियों की काला कम्बल दुशाला जहाँ… ‘उग्र’ ने वहीं पे फ़िलहाल डेरा डाला है।
1927, 28 और 29 मेरे लेखन-जीवन में ज़बरदस्त कोलाहलकारी रहे। विख्यात ‘मतवाला’-मण्डल से मेरा सम्बन्ध फिर से जुड़ा, गठा और परम दृढ़ हुआ था। इसी दरमियान मेरी पुस्तक ‘चाकलेट’ के वज़़न पर ‘घासलेट’ आन्दोलन मेरे विरुद्ध घनघोर चला था। इन्हीं दिनों में एक नहीं दो-दो बार गांधीजी ने मेरी पुस्तक ‘चाकलेट’ पढ़ी थी और उसके लेखक की सचाई का अनादर ‘चाकलेट’ की निन्दा करने से अस्वीकार कर दिया था। हिन्दीवालों के कौआरोर में एक प्रहार स्पष्ट यह था — आक्षेप मुझ पर — कि मैं अश्लील साहित्य टकों के लिए लिखता था। मेरा विश्वास आज भी यही है कि रुपये ही कमाना हो, तो कहानी-उपन्यास लिखने से कहीं सरल धन्धे और हैं। वही अहंकार। मैंने सोचा — परे करो इस हिन्दी को। चरने दो उन्हें जिन्हें चर्रा रही है मेरी चर्चा — चलो बम्बई चलें; जहाँ अपार समुद्र के तट पर कोई पारसीक नारी हाथ में नारिकेल, चन्द्रमुखी, सूर्योपासन रत होगी। मैं पुन: फ़िल्म कम्पिनयों में चला गया। सन् ’30 से ’38 तक मैं फ़िल्मों में लिखता रहा और मस्तियाँ लेता रहा। इसके बाद क़र्ज़दारों से भागकर पहली बार मैं मालवा — इन्दौर — गया। सन् 1945 तक इन्दौर और उज्जैन में तरह-तरह से लेकिन स्वान्त:सुखाय मैं वही काम करता रहा जो जानता हूँ करना — आग लगाना, कूड़ा जलाना। इसी अरसे में उज्जैन के विख्यात महाकाल मन्दिर में मेरी पहुँच हुई और साल-छह महीने बहुत ही निकट से महाकाल के दर्शन प्रसाद प्रसन्न प्राप्त हुए। इसी अरसे में खण्डवा के ‘स्वराख्य’, इन्दौर की ‘वीणा’, मध्य भारत साहित्य समिति, मालवा के राजनीतिक, सामाजिक जीवन, उज्जैन से ‘विक्रम’ सम्पादन, उज्जैन की राजनीति आदि से मेरा घनघोर सम्पर्क रहा है। सन् ’45 में मैं तीसरी बार बम्बई, इन्दौर से पहुँचा और स्वराज्य होने तक उसी महानगरी में गरजता-बरसता रहा। इस अरसे में भी दो साप्ताहिक मेरे नाम के नीचे आए 1. विक्रम और 2. ‘संग्राम’। स्वराज्य होते ही उत्तर प्रदेश लौटा और मिर्ज़ापुर से ‘मतवाला’ का सम्पादन करने लगा। सन् 1950-51-52 कलकत्ते में बहुत बुरी तरह कटे। ’53 के अन्त में दिल्ली आया। दिल्ली सब्ज़ी मण्डी, पंजाबी बस्ती में रहा 7-8 महीने, फिर तीन साल से ज़ियादा लोधी बस्ती में बसा। तीन ही बरसों से इधर जमुना पार कृष्णनगर में रह रहा हूँ। सागर विश्वविद्यालय आजकल ‘उग्र’ पर रिसर्च करा रहा है। उसी हनुमानचालीसा चुराने वाले पर।
असंबल गान
उपदेशक—
तेरी कन्था के कोने में
कुछ संबल, या संशय है, अरे पथिक, होने में? तेरी.
यदि कुछ हो न ठहरता जा ना,
कन्था अपनी भरता जा ना,
करम दिखा इन बाज़ारों में
कुछ धरता कुछ हरता जा ना।
करता जा खिलवाड़ अमरता
पड़ नश्वखरता के टोने में। तेरी.
दूर देश तुझको जाना है,
पथ के ध्रुव दुख-सुख पाना है।
अरे! गुनगुना इतना गा ना,
पड़ना है आगे रोने में। तेरी.
बीहड़ बाट हाट से आगे
जा मत! मुसका मत भय त्या.गे!
गिरी-गह्वर, नद, निर्झर-झर हैं
पछताएगा अन्तग अभागे!
खो देगा अपने को पागल!
होती हँसी यहाँ खोने में। तेरी.
राही—
खो जाने ही का तो डर है।
इसीलिए संबल संचय में
संशय है, कुछ कोर-कसर है। खो जाने.
इसीलिए यह कन्थाय ख़ाली,
मलिन-मुखी, गलिता, अति-काली
लाद पीठ पर नाच नाचता
गाता आसावरी निराली।
इसीलिए यह गाल बजाता,
इसीलिए यह सूना स्वार है। खो जाने.
दूर देस से मैं आता हूँ,
सच है, दूर देस जाता हूँ।
किन्तुस जिसे पाता हूँ पथ में
खोने ही वाला पाता हूँ!
सुना: मिटे घट गये घनेरे
यह घटिया घाटों का घर है। खो जाने.
यह गिरि-वर, यह नदी मनोहर,
वक्ष फुलाकर, कलकल गाकर,
जाते दूर—सुदूर—नील-दिशि
संबल की यह भूल भुलाकर!
इसीलिए इन बाज़ारों की
नहीं मुझे अब ख़ाक़ ख़बर है!
खो जाने ही का तो डर है।
(सन् 1928 ई.)
परिचय—
महाराज, युवराज, सरदार, जर-दार
जूआ खेलने के लिए जुड़े राज-दरबार।
सोनापुर राज की वसुन्धेरा थी रत्नामयी
और थी खेलाड़ियों को कौड़ियों की दरकार!
किन्तुख उस देश में वराटिका* मिली न एक,
खोज-खोज हारे ख़ास-दास, दस-दस बार।
भाग्यु की परीक्षा की प्रतीक्षा में सभी थे जब
भिक्षा माँगने को पहुँचा मैं तभी राज-द्वार!
मेरे पात्र में थीं चन्द कौड़ियाँ, जिन्हेंब विलोक,
चन्द कौड़ियों पे टूटे सरदार जर-दार!
चन्द कौड़ियों को ललचाने हीरामणि आए,
चन्द कौड़ियों के महाराज थे तलबगार!
मैंने कहा ज्ञान से तमक तान मस्ततक को
भाग्य वानो! दान दूँगा। माँगो हाथ तो पसार?
भीख लेके जीते वे, मैं दान देके हार गया,
हार के गया मैं जीत, जीत के गए वे हार!
- कौड़ी
समाप्त

