पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर
यह चर्चा सन् 1920 और 21 ई. के बीच की होगी। यह सब मैं स्मरण से लिख रहा हूँ, क्योंकि डायरी रखने की आदत मैंने नहीं पाली, इस ख़ौफ़ से कि कहीं राजा हरिश्चन्द्र की तरह अपना ही सत्य या तेज, अपने ही को भस्म न कर डाले! यह चर्चा तब की है जब ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उपवास करके आयरलैंड के महात्मा मैक्स्विनी शहीद हुए थे। उन दिनों देश में राष्ट्रीयता की लहर तेज़ प्रवाहित हो रही थी, जिसमें मेरे भी प्राण प्रसन्न डुबकियाँ लगाने को लालायित रहते थे।
मैंने शहीद मैक्स्विनी पर एक लम्बी कविता लिखी। वह हिन्दू स्कूल के तेजस्वी हिन्दी अध्यापक पं. साँवलीजी नागर को मैंने सुनाई। सुनते ही वह प्रसन्न हो उठे। बोले—चलो, ज्ञानमण्डल, पराड़करजी से कहूँगा कि वह यह कविता ‘आज’ में छापें। उन दिनों ज्ञानमण्डल भाड़े के बँगले में दुर्गाकुण्ड मुहल्ले में था। शिष्य-वत्सल बेचारे नागरजी पक्के मुहल्ले से पैदल प्राय: एक कोस चलकर मुझे ज्ञानमण्डल ले गए। वहाँ पहुँचने पर मुझको दरवाज़े ही पर रुकने का संकेत कर वह अन्दर गए, जहाँ उस समय शिवप्रसादजी गुप्त और श्रीप्रकाशजी बैठे हुए थे। नागरजी का, उत्तम शिक्षक के नाते, काशी में आदर था। अच्छे-अच्छे जानते-मानते थे। ज्ञानमण्डल का श्रेष्ठिवर्ग भी उनका सम्मान करता था। उन्होंने गुप्तजी और श्रीप्रकाशजी को सम्मिलित सम्बोधित करते हुए कहा— श्रीमानजी, मेरा एक शिष्य एक कविता लेकर आया है। सामयिक है। कहिए तो उसे अन्दर बुलाऊँ। और अविलम्ब मैं बाबू शिवप्रसाद गुप्त और बैरिस्टर श्रीप्रकाशजी के सामने उपस्थित हुआ। नागरजी ने कहा — ‘सुनाओ अपनी कविता पढ़कर।’ मेरा दिल धड़क रहा था। साहस बटोरकर काशी के उन दिग्गज श्रीमानों को मैंने अपनी कविता सुना ही दी। और रंग जम गया। गुप्तजी भी प्रसन्न हुए, प्रकाशजी भी। गुप्तजी ने मैनेजर से पूछा — ‘क्या सवेरे निकलने वाले “आज” में इतनी बड़ी कविता के लिए स्थान निकल सकता है? पूछो फ़ोरमैन से।’ फ़ोरमैन ने बतलाया कि सातवें पृष्ठ के अन्तिम कालम में चाहें तो कविता दी जा सकती है। ‘आज’ में वह मेरी पहली कविता छपी थी।
इस वाक़या के कुछ ही दिनों बाद मैंने पहली कहानी लिखी— ‘गांधी आश्रम’—कि ‘आज’ ही में छपे। ‘आज’ के एक सहकारी सम्पादक श्री हरिहरनाथजी बी.ए. थे। बड़े ही सरल-चित्त कायस्थ। उन्होंने पढ़ने के बाद वादा किया कि कहानी पेपर में छपाने का उद्योग करेंगे। पूछना था श्रीप्रकाशजी से। मैं बैठा प्रतीक्षा करता रहा। श्रीप्रकाशजी आए रात के आठ-साढ़े आठ बजे। उन्हें देखते ही उनके रौब के मारे मैं उनकी कुरसी के ठीक पीछेवाली कोठरी में दुबक रहा। मौक़ा पाते ही हरिहरनाथजी ने मेरी कहानी श्रीप्रकाशजी की सरकार में पेश कर दी। ‘क्या है यह?’ पूछा उन्होंने। ‘एक कहानी है।’ ‘किसकी लिखी हुई है यह?’ ‘उसी लड़के की जिसकी कविता मैक्स्विनी पर आपने छापी थी।’ ‘लड़के की कहानी!’ लड़कों की रचनाओं के लिए ‘आज’ नहीं है।’ कहकर उन्होंने कहानी बिना पढ़े ही अस्वीकृत कर दी। उनका निर्णय सुन उनके पीछे-पीछे मैं सुन्न रह गया। लेकिन जय हो मुंशी हरिहरनाथ की! उन्होंने वह कहानी मुझे लौटाई नहीं, बल्कि पण्डित बाबूराव विष्णु पराड़कर के सामने उसे रख दिया। पराड़करजी ने रचना पढ़ी, आवश्यक सुधार किए, छपने को दे दी। छपने के बाद मुझे पता चला कि मेरा दिल टूटे नहीं, इसके लिए हरिहरनाथजी ने क्या उपाय किया था। वह कहानी पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के नाम से नहीं, मेरे एक अन्य — शशिमोहन शर्मा — नाम से छपी थी। तब तक मैंने ‘उग्र’ उपनाम नहीं रखा था। ‘उग्र’ उपनाम तो मैंने राष्ट्रीय गान-द्वन्द्व में सम्मिलित होने से पूर्व चुना था। आज मुझे अपने लिए उपनाम चुनना हो, तो सम्भव है —बुरा न होने पर भी — ‘उग्र’ मैं न चुनूँ। लेकिन आज से चालीस वर्ष पूर्व राष्ट्र-भक्त लेखक ऐसे कर्कश उपनाम इसलिए चुना करते थे कि बलवान ब्रिटिश साम्राज्य के नृशंस शासक नाम ही से दहल जाएँ। शायद शक्तिहीनता छिपाने के लिए लोग प्रचण्ड नामोपनाम चुना करते थे; जैसे— ‘त्रिशूल’, जैसे ‘वज्रपाणि’, जैसे ‘धूमकेतु’, जैसे ‘भीष्म’, ‘भीम’, ‘भयंकर’, ‘प्रलयंकर’ या अपना ढाई अक्षर का ‘उग्र’। क्या हुआ कि पण्डित पराड़करजी मेरी लेखनी की तरफ़ आकर्षित हुए — मुझे पता नहीं। वह रूखे दीखनेवाले महापुरुष थे, प्राय: चुप रहने वाले।
मेरी लेखनी में अंग्रेज़ी राज के प्रति घोर घृणा तथा क्रान्तिकारियों के लिए तरल महामोह जो था — मैं समझता हूँ — उसी पर वह मुक्त-प्राण महाराष्ट्रीय मोहित हुए होंगे। उन्होंने बे-बोले ही मानो मुझे गोद ले लिया। सारे ज्ञानमण्डल की कानाफूसी एक तरफ़ रख, अपना काम छोड़, घंटों तक वह मेरी कहानियों को व्याकरण की पटरी पर लाते, ग़लत-बयानियाँ सुधारते, बदशक़्ल शब्द या मुहावरे काट-छाँटकर, सुन्दरता सँवारकर वह मेरी शूद्र रचनाओं को दिव्य द्विजत्व दिया करते थे। जब वह मेरी कहानी पढ़ते-पढ़ते हँसने लगते अथवा सजल हो उठते, तब मुझमें, बिना बोले ही, आत्मविश्वास घट-घट उँडेल देते थे। अक्सर मैं घोर राजविद्रोह लिख मारता था, जिसे पढ़ते ही अस्वीकृति से माथा हिलाते वह कहते— ‘नहीं, नहीं, आपने लिखा सुन्दर है, सच है, पर कानून लोचदार होता है। संस्था श्रीमानों की है। इस तरह आप सबको संकट में डाल देंगे।’ फिर पराड़करजी उस रचना-रूपी बिच्छू को सुधारते यों कि बिच्छू का रूप तो बदल जाता, लेकिन शब्दों के (कामाफ़्लाज) मायाजाल में मारक डंक और विष बना-का-बना ही रहता। अक्सर मेरी रचनाओं की क्रान्तिकारी उग्रता से चमककर श्रीमान् लोग सावधान करते पराड़करजी को कि कहीं ‘उग्र’ की लेखनी संस्था को खड्डे में न खींच ले जाए। फिर भी, पराड़करजी छापते। यह द्वन्द्व तब तक चलता रहा — चार-पाँच बरसों तक — जब तक पराड़करजी की कृपा से रचनाकार की हैसियत से मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो गया। इस अरसे में उत्तर प्रदेश का यह जो भारत-प्रसिद्ध दैनिक अख़बार ‘आज’ है, मेरे अभ्यास का पूर्ण साधन बना रहा। इसके प्रमाणों से ‘आज’ की फ़ाइल-की-फ़ाइल भरी हुई हैं। मेरी लिखी पहली समालोचना ‘मर्यादा’ मासिक में इन्हीं दिनों छपी थी, जिसके सम्पादक थे श्रद्धेय सम्पूर्णानन्दजी। गर्वीले सम्पूर्णानन्दजी के ज्ञान-विज्ञान-चर्बीले चश्मों में भी मेरी लेखनी के लिए स्नेह पर्याप्त था। मैं कहानी, कविता, हास्य, आक्रमण, जो भी लिखता था वह पराड़करजी के प्रसाद से तुरन्त ही पब्लिक के सामने आ जाता था। ‘ऊटपटाँग’ शीर्षक से बरसों मैंने हास्य–व्यंग्य के नोट्स ‘आज’ में लिखे हैं — ‘अष्टावक्र’ उपनाम से।
इस लिखने-लिखाने की मज़दूरी मुझे शुरू-शुरू में दस आने कालम के हिसाब से मिलती थी। वह भी इस शर्त के साथ कि तीन रुपए मासिक से अधिक कालम मैं न लिखूँ। सौभाग्य का तेवर तो देखिए! बाल-अभ्यास के लिए पाँच लाख का प्रतिष्ठित दैनिक पत्र बाबा के माल की तरह अपना, पर जेब-खर्च के लिए रुपये तीस मासिक से अधिक की गुंजायश नहीं! लेकिन ‘आज’ की वजह से मेरी वह प्रचण्ड पब्लिसिटी हुई, नगर में, प्रदेश में, हिन्दी-हद तक सारे देश में कि ज्ञानमण्डल के वरदानों को मैं चाँदी के बटखरों से क्यों तोलूँ?
आपने पढ़ लिया कि मैं शिवप्रसादजी गुप्त के ‘सेवा उपवन’ से भीख के अन्न सिर पर लादकर ले आता था। ज्ञानमण्डल और ‘आज’ भी उन्हीं देवता-स्वरूप शिवप्रसाद के दिव्य प्रसाद थे। (हैं भी।) लेकिन शिवप्रसादजी मुझे ‘आज’ में उस ओज से न लिखने देते जिस तेज की महाराज पराड़कर ने सुविधा दे रखी थी। मौलिकता न हो न सही, पाठकों की नीरसता भंग करने के लिए तब के ‘आज’ में प्रकाशित दो-चार कविताएँ महज स्मरण से यहाँ उपस्थित करता हूँ।
परतन्त्र!
प्रभु, परतन्त्र हैं हम आज!
दलित हैं पर-पद प्रबल से गलित हैं सब साज। प्रभु.
देश पर, निज वेश पर, सर्वेश पर का राज,
पर-कृपा निर्भर स्व–पूजा, ध्यान और नमाज। प्रभु.
पर-उदर निज अन्न से भर हम रहें मुहताज…
पर-कुशल, निज अपकुशलहित देव विविध ख़िराज। प्रभु.
अपर-पर-बस जग न हम सम दास गन सिर ताज। प्रभु.
(सन् 1920-21 ई.)
कामना
भयंकर ज्वालाएँ
जाग उठें, सब ओर आग की हो जाये भरमार!
मधुर रागिनी नहीं चाहते—
और न स्वर सुकुमार!
वज्र-नाद-सा बोल उठे हम सबके उर का तार!
पावस की घनघोर घटाओं-सी
चारों ओर नभ में धुएँ की राशि व्याप उठे,
और उसमें से हमारी दिव्य आशाएँ
चंचला-सी चमकें अनन्त चिनगारियाँ!
ऐसे समय
ओ हो हो! आ हा हा!
उग्र-रूप विश्वामित्र,
दुष्ट-दल-नाशक भृगु,
रावण-दर्प-हारी राम,
कुरु-बल-वन-दावानल, कर्मवीर-कृष्ण ऐसा,
अथवा पिनाकी भूतनाथ श्री कपालभृत
ऐसा वीर-भारत हमारा उग्र नाच उठे!
एवमस्तु!
(सन् 1920-21 ई.)
व्यंग्य
‘मिस’ माधुरी को मुख ‘लोफ़र’ निहारि, हारि,
फीके पड़ गए मुँह नीके-नीके गुल के।
वसन सफेद वाके तन की सफेदी देख
मलिन बना ही रहा—साठ बार धुल के।
चूल्हे पड़े, जले, काहू काम के रहे न फिर,
देखि हलकाई वाकी फूले-फूले फुलके।
‘काऊ’, ‘किड’, ‘बुल’ के, हरिन चुलबुल के,
सुजात गड़ि पायन चरम बुलबुल के!
हास्य
खेत-खेत खाद खाय तपके तमाखू हुआ,
गया परदेस, कहो कैसी बुद्धिमत्ता है?
विकट मेशीन बीच पड़ उड़वाया लत्ता,
बना सिगरेट, फिर लौटा कलकत्ता है!
हाट में बिकाया, आया हाथ में उसी के फिर
ख़ाक़ भी हुआ, तो होठ ही पे! क्या महत्ता है!!
‘सत्ता’ हुआ ‘मिस’ पे बेचारा कवि ‘लोफ़र’ भी
बोल उठा विश्व : यह प्रेम अलबत्ता है!
पूज्य पराड़करजी का बंगाल के बड़े-बड़े बमबाज़ योगी-मिजाज़ क्रान्तिकारियों से सम्बन्ध था। दिल्ली के दफ़्तर में यह जो साक्षात् शहीद हैं गुप्त मन्मथनाथजी यह भी मेरे क्लास-भाई हैं। हिन्दू स्कूल के मन्मथनाथजी भी विद्यार्थी थे। प्रचण्ड और दार्शनिक षड्यन्त्रकारियों से मेरा सम्पर्क भी कम नहीं था, लेकिन पराड़करजी या मन्मथनाथ के सबब नहीं। मेरी लेखनी से चिनगारियाँ झड़ते देख दिवंगत श्री शचीन्द्रनाथजी सान्याल और फाँसी पा जाने वाले शहीद श्री राजेन्द्र लाहिड़ी ने ललककर मेरा संग्रह किया था। शचीन्द्र बाबू ने राजेन्द्र लाहिड़ी को मेरे घर भेजा, मेरी उग्रता की गहराई को जाँचने के लिए। मेरे स्वभाव में उत्सुकता, भावुकता जितनी गम्भीरता, दृढ़ता, उतनी नहीं थी। क़लम से लिखकर ‘रिस्क’ लेना हो तो (कायर होते हुए भी) शहीदों का पीछा मैं काले कोसों तक न छोड़ूँ। क़लम से मारना हो तो सारे विश्व के अनाचारियों को बिना नरक भेजे मैं न मानूँ, लेकिन बन्दूक, तलवार से प्राण लेना हो तो वह मेरा शेवा नहीं।
मेरी परिभाषा : चाणक्य ने नन्द साम्राज्य का नाश कर दिया लेकिन अपने हाथ से किसी को एक थप्पड़ भी लगाए बग़ैर। और मुझे बुलाया गया। तीन और बंगाली जवानों के साथ बनारस से इलाहाबाद सचमुच कोई षड्यन्त्रकारी उपद्रव: राजनीतिक डाका डालने के लिए! चला तो गया मैं बंगालियों के साथ बनारस से इलाहाबाद, लेकिन वैसे ही जैसे काली मन्दिर में नहलाए जाने के बाद बलि-पशु यूप की तरफ़ जाता है। इलाहाबाद में चौबीस घण्टे इन्तज़ार करने पर भी अन्य आदमियों के साथ जब योगेश बाबू नहीं आए तब एक प्रकार से जान-बची-लाखों-पाए भाव से हम तीनों छोटी लाइन से पुन: बनारस लौटे। लेकिन बीच के एक जंक्शन पर बनारस से आने वाली गाड़ी में आधा दर्जन तगड़े वीरों के साथ योगेश बाबू नज़र आए। उन्होंने हमें अपने डिब्बे में बुलाकर इलाहाबाद लौट चलने का जब आदेश दिया तब बन्देख़ाँ बेशर्म बहाने बनाने लगे : कि भाभी से दो ही दिनों में लौट आने का वचन देकर आया हूँ। इस पर बहादुर योगेश बाबू ने जिस घृणा-भरी दृष्टि से मेरी तरफ़ तरेरकर ताका था, वह आज भी मुझे भूली नहीं है। दोनों बंगाली बहादुर इलाहाबाद लौट गए। मैं बनारस बच आया। फिर भी श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल तथा क्रान्तिकारी मण्डल मेरा आदर करता था। शचीन बाबू ने तो अपने संस्मरण में एकाधिक बार मेरी चर्चा भी की है। वह मेरी लेखनी में जो आग थी उसी से परम सन्तुष्ट थे। मुझमें जो नहीं था उसके लिए तिरस्कार सान्याल महाशय के दर्शन में नहीं था। सान्याल बाबू दुखों के दाह से सुवर्ण की तरह दप्-दप् दहकते दार्शनिक थे। कसौटी की तरह श्याम। बड़ी-बड़ी, डोरीली, करुण, आँखें!
बाबू शिवप्रसाद गुप्त
तो? तो क्या बाबू शिवप्रसाद गुप्त को भी स्वर्ग के फाटक से नहीं गुज़रने दिया गया? बाइबिल में लिखा है : सुई के सूराख़ से ऊँट निकल जाए — भले, परन्तु धनवान स्वर्ग के फाटक से त्रिकाल में भी नहीं गुज़र सकता। बाबू शिवप्रसाद गुप्त ग़ैर-मामूली धनवान—कहते हैं करोड़पति—ज़मींदार-साहूकार के उत्तराधिकारी थे। अगर मुझे मज़े में विदित न होता कि दोष देवताओं में भी होता है, तो दिवंगत बाबू साहब को मैं आदमी न कह देवता ही कहता। लेकिन जहाँ तक मुझे मालूम है देवताओं का दिल नहीं होता और आदमी यदि भरत बन जाए या बुद्ध, ईसा या श्री रामकृष्ण परमहंस या गांधी तो वह सर-से-पाँव तक दिल-ही-दिल दिव्य दिखलाई देता है। सावन के सघल-घन की तरह शिवप्रसादजी सहज स्वभाव से सभी के लिए जीवन-मय-सजल थे। उनके रहते ‘सेवा उपवन’ एक विशाल अतिथि-निवास था। किसी तरह का भी गुणी हो, गुप्तजी के मन में उसके लिए उदार आदर-भाव सुरक्षित था। विद्यार्थियों को, विद्यालयों को, समाज-सेवकों को, राष्ट्र-कर्मियों को, नेताओं को मालवीयजी और गांधीजी को बाबू शिवप्रसाद गुप्त मुक्तहस्त दान दिया करते थे, वह भी भावपूर्ण भक्ति से। महामना मालवीयजी पर तो वह लोटपोट-मुग्ध थे, उन्हें पिता अपने को पुत्र और गोविन्द मालवीय को भाई कहा करते थे। मालवीयजी भी बाबू शिवप्रसाद गुप्त को इतना मानते थे कि काशी में उन्हीं के यहाँ रहते, उन्हीं का अन्न पाते थे। ज्ञानमण्डल को ज्ञानमण्डल बनाने में शिवप्रसादजी के लक्ष-लक्ष रुपये अलक्ष हो गए। ‘आज’ को ‘आज’ बनाने में। ‘भारतमाता का मन्दिर’ की भव्य कल्पना को दिव्य आकार देना, काशी विद्यापीठ की बुनियाद डालना दिवंगत गुप्तजी ही का प्रसाद है।
काशी में जो भी राष्ट्रीय चेतना जाग्रत हुई उसकी प्रेरणा में गांधीजी के बाद बाबू शिवप्रसाद गुप्त ही का नाम लेना मुझे समुचित लगता है। शिवप्रसादजी के प्रसाद का पुण्य-प्रकाश सारे उत्तर प्रदेश में, खुशबू सारे देश में थी। शिवप्रसादजी इतने मोटे थे कि लगता था उनका विशाल हृदय बूझकर ही विधाता ने वह बड़ा-घर उन्हें बख़्शा था। शिवप्रसादजी का बँगला बड़ा, मोटर बड़ी, कैसे बड़े-बड़े वायलर घोड़ों की जोड़ी थी उनकी, जिसके पीछे वर्दी-धारी दो-दो साईस राहगीरों को तेज़ स्वर से सावधान करते रहते थे। शिवप्रसादजी खाने और खिलाने के भी बड़े शौकीन थे। घर की बात अलग, यात्रा में भी उनके साथ पूरा भण्डारा चला करता था। काशी में आकर कोई भी बड़ा आदमी ‘सेवा उपवन’ ही में सुविधा, आतिथ्य और सुख पाता था। अक्षरश: रईस थे श्रद्धेय शिवप्रसादजी गुप्त। ऐसे जैसे को जेल तो कदापि नहीं होना चाहिए थी। लेकिन भला अंग्रेज़ कब छोड़नेवाला था। उन्हें भी सीख़चों में बन्द किया ही गया। शिवप्रसादजी-जैसे रईस को जेल देना फाँसी देने के बराबर था। हृदयहीन कानून ने ऐसा समझा ही नहीं। वह जेल ही में बीमार पड़ गए। छूटे, तो उन्हें फ़ालिज मार गया। फ़ालिज मार गया? शिवप्रसाद गुप्त को? ऐसे नेक-दिल आदमी को जिसकी तुलना देवता से भी करने को मैं तैयार नहीं? तो यह सारे-का-सारा उत्तम अभियान, विधिविहित दान, सबकी पूजा, सबका सम्मान, सबके लिए अपार मोहमय प्यार सदाचार नहीं, अपराध था? क्योंकि शिवप्रसादजी को विकराल, भयानक दण्ड मिला— जिसे छ: महीने की फाँसी कहते हैं। जिस ‘सेवा उपवन’ में उन्होंने सारे संसार की सेवा की थी उसी में बहुत दिनों तक वह पक्षाघात से परम पीड़ित पहियादार गाड़ी पर झुँझलाते, खुनसाते घुमाए जाते थे। वह अक्सर बनारसी बोली में व्यथा-विह्वल दोहाइयाँ दिया करते थे — ‘रमवाँ, रे रमवाँ! कौन गुनहवाँ करली रे रमवाँ!’ तो? तो क्या बाबू शिवप्रसाद गुप्त को भी स्वर्ग के फाटक से नहीं गुज़रने दिया गया? बाइबिल में लिखा है : सुई के सूराख़ से ऊँट निकल जाए— भले, परन्तु धनवान स्वर्ग के फाटक से त्रिकाल में भी नहीं गुज़र सकता।
बाबू शिवप्रसाद गुप्त के जीवन और मृत्यु से जब मैं बच्चा महाराज के जीवन और मरण की तुलना करने चलता हूँ तो मेरी मति हैरान-परेशान रह जाती है। यद्यपि मनुष्य की दृष्टि से दोनों में कोई भी तुलना करना अनुचित-जैसा लगता है, लेकिन दैवयोग से मेरे तो दोनों ही गुरुजन थे। बच्चा महाराज ने हारकर कभी राम की पुकार नहीं लगाई। असल में वह अपने प्राइवेट अफ़ेयर्स में राम की भी दस्तंदाज़ी नहीं चाहते थे। और जैसे राम को भी बच्चा गुरु की यह सर्वतन्त्र-स्वतन्त्रता मोहक मालूम पड़ती थी। तभी तो आराम-भरा जीवन उन्हें वरदान मिला था।
पं. कमलापति त्रिपाठी
सो, तुम जीते – कमला, और बहुत ख़ूब जीते। अभी गत कल ही की तो बात है। तुम प्रादेशिक साहित्य-सम्मेलन के अध्यक्ष बने थे (सन् 1948-49)। उन्हीं दिनों लखनऊ में मैं भी मोहक मिनिस्टर श्री केशवदेव मालवीय का मेहमान था। अत:, सहज ही, उस जलसे में हाज़िर था जिसके तुम जनाबे-सद्र थे। पहले दिन की कार्रवाई ख़त्म होने के बाद ही मंच से दर्शकों के बीच में आने पर मुझे पहचान तुमने मेरे कन्धे पर परिचित हाथ रखा था और — परिचित ही अदा में—मैंने गुज़ारिश की थी हिं.सा. सम्मेलन के अध्यक्ष से कि आगामी कल के जलसे में मुझे भी चन्द अल्फ़ाज बोलने की इजाज़त दें। लेकिन तुमने तद्दन ना कर दिया था: ‘तुम न जाने क्या बोलो— मैं तुम्हें बोलने नहीं दूँगा।’ तब तुम मिनिस्टर नहीं — महज़ एम.एल.ए. थे, लेकिन तब भी तपना तुमने प्राय: मिनिस्टरों की तरह ही शुरू कर दिया था। मैं रहता था मिर्ज़ापुर तथा ‘मतवाला’ वाले महादेवप्रसाद सेठ के योग्य-पुत्र के करते फिर से प्रकाशित ‘मतवाला’ का सम्पादक था। दूसरे दिन तुमने सभा में मुझे बोलने नहीं दिया था। पाँचवे दिन अपने पेपर में मैंने तुम्हारे दर्शन की, भाषण की, हिन्दी साहित्यिक-आसन पर से पालिटीशियन मुख्यमन्त्री पन्त के पद-पल्लव पकड़ने के आचरण की भर्त्सना की थी — ज़रा भी अपनत्व दिखाए बग़ैर। इसके बाद मिर्ज़ापुर से बनारस जाने पर, जान-बूझकर, तुम्हारी प्रतिक्रिया ताड़ने के लिए मैं तुम्हारे घर गया था। दरबार तुम्हारा भरा था, मैंने देखा। मुझे देखते ही चेहरे पर अहंकार तुम्हारा उभरा था। मेरी तरफ़ से दीठ हटा, पीठ दिखाते तीव्र-तिरस्कार से तुमने कहा था: ‘कोई मुझसे पॉलिटिक्स में भिड़ावे (फिर देखें…)।’
उस समय मैंने नहीं समझा था कि तुम्हारे इस पॉलिटिक्स-परिज्ञान-अहंकार के पीछे इतना कूट-प्रभुत्वपूर्ण ‘पावर’ था। तुम सिंचाई मन्त्री बन गए जब तक भी मैंने अहंकार योग्य कोई खुसूसियत तुममें नहीं देखी थी। लेकिन जब काल ने तुम्हारे पक्ष में ‘किक’ मार सी.बी. गुप्त को पाताल पठाया और सम्पूर्णानन्द को प्रान्तीय प्रभुत्व के आकाश की तरफ़ उछाला तब जैसे रातोंरात तुम्हारा साइज़ यू.पी. के पाताल से (नक्षत्र-ग्रह-चन्द्रार्क-मण्डित) आकाश तक विराट हो गया था। तुम्हारा यह विराट रूप मुझे बहुत ही भाया। जीवन में जीवट से डटने की क्षमता, बल, ‘पावर’ मुझे बहुत ही सुहाते हैं। मैंने कहा, ‘भाते हैं’ ‘सुहाते हैं’। ‘लुभाते’ ये मुझे उतना नहीं। देखो तो, जब से तुम ‘पावर’ में हो मेरी-तुम्हारी भेंट तक नहीं। लखनऊ तो दूर मैं बनारस भी नहीं गया, मिर्ज़ापुर नहीं गया। तब से जब से तुम वैसे शक्तिशाली बने जिसकी कल्पना तक मैं न कर पा सका था। वैसे ही—ठीक वैसे ही कमला—जैसे अलिफ़ लैला के दीन अलादीन को अपने ही हाथ के चिराग़ में प्रचण्ड शक्तिशाली ‘जिन’ के होने की कल्पना तक नहीं थी। विश्वास रखो, मैं तुम पर एक अक्षर भी न लिखता — यह सब तो अपना अहंकार प्रकट करने के लिए लिखा है — ख़ासकर प्रान्त में उन साहित्यिकों, क़लम-बाज़ों, आचार्यों, तथाकथित प्रतिभाशालियों पर जो आज तुम्हारे प्रसाद से प्रसादीलाल बने हुए हैं। मेरा दावा है आज यू.पी. के जो भी तुम्हारे सामने झुककर सम्पूर्णानन्दित हैं वे सभी मेरे सामने भी सरासर झुके हुए हैं। याद तो करो सन् 1921 ई. की घटना। गांधीजी काशी आए हुए थे और टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज के दुमंजिले पर हिन्दू-विश्वविद्यालय के एक-से-एक विवेकी आचार्य को असहयोग का प्रोग्राम सुतर्कित रीति से समझा रहे थे। और तुम थे। और मैं था। हमने तय किया कि महात्माजी जब गोष्ठीवाले कमरे के बाहर निकलें तब अचानक लपककर पावन चरण-स्पर्श किया जाए। और हम कर गुज़रे लड़कपन। बड़े-बड़ों के आगे-आगे आते गांधीजी के गतिवान चरण एक ओर से तुमने ओर एक ओर से मैंने पकड़ ही लिये थे। गांधीजी चमककर शान्त रह गए थे। मुझे याद है — मेरे हाथ में उनका दाहिना चरण आया था और तुम्हारे बायाँ। युग-पुरुष के वामपद की विभूति अगर वही है जिससे तुम मण्डित हो कमलापति पण्डित! तब महात्मा के दक्षिण पद की विभूति में क्या होगा उसकी कल्पना की अनुभूति भी ब्रह्म-पद-प्रसूति मालूम पड़ती है।
महात्मा पद-रज-ग्रहण के चन्द ही दिनों बाद इस बात पर मेरी-तुम्हारी शर्त लगी थी पाँच-पाँच रुपये की कि आगे जेल कौन जाता है। जेल तुम भी गए, लेकिन मैं तुमसे पहले पहुँचा था। और हम दोनों एक ही भाव में, एक ही बैरक में, एक ही ‘झिरी’ में, एक ही जेल में सन् उन्नीस सौ बीस और एक में थे! उसी जेल में उसी समय कृपलानीजी, सम्पूर्णानन्दजी और सारी यू.पी. के कई सौ पॉलिटिकल बन्दी भी थे! आज यह सब मैं इसलिए लिखता हूँ कि तुममें जो श्रेष्ठ है, तेजस्वी है, उसमें मैं हूँ। भले मैं ही न होऊँ तुम्हारे पूज्यपिता परम पण्डित थे; तुम्हारे भारत-विख्यात नानाजी परम पण्डित थे। लेकिन जेल तो मैं ही तुम्हें ले गया, अख़बार-नवीसी की तरफ़ तो मैं ही तुम्हें ले गया। मतलब महज़ यह कि तुम्हारे शुभ में मेरा अनुराग आज भी है और अशुभ में भगवान् न करें किसी का अनुराग हो। हरिश्चन्द्र ने कहा — कोई हमसे सत्य में भिड़ाए, रामचन्द्र ने कहा, कोई हमसे मर्यादा में भिड़ाए, गौतम बुद्ध ने कहा, कोई मुझसे करुणा में भिड़ाए, लेकिन कमलापति पंडित ने पलटा लेकर कहा, कोई हमसे पॉलिटिक्स में भिड़ाए! तो कमला! इस पॉलिटिक्स में तुम्हारे सत्य, मर्यादा और करुणा तो होगी ही? या माडर्न पॉलिटिक्स उक्त गुणों से विरहित होता है? भाई रे, दोहाई है, इतना बड़ा हो गया चुनार का पँडवा, पर, पूछो तो पॉलिटिक्स का ‘प’ भी लिखना मुझे नहीं आता। जब तुम कृषि या सिंचाई मन्त्री बने थे, मैं संयोग से लखनऊ में था। तुम्हारे यहाँ गया जो तुम अन्दर थे; बाहर दरबार लगा था।
तुम बाहर आए तो स्व. परमहंस राघवदास ने तुम्हें सुनाया था कि उग्रजी कह रहे थे कि काम अभी छोटे भाई कर रहे हैं, बड़े भाई का नम्बर बाद में आएगा। शायद परमहंसजी का कथन तुम्हें सुहाया नहीं था। मैं दूसरे दिन गया तो तुम तख़लिए में सुलभ हुए थे। इसके बाद मैं उत्तर प्रदेश के बाहर-ही-बाहर रहा। अक्सर पत्रों में पढ़ता तुम्हारे बारे में। कमाल मेरे भाई! तुमने करके दिखा दिया! लेकिन किसको दिखलाया? बेचन को? परिवारियों को? रिश्तेदारों को? बनारसवालों को? या प्रदेश की भूखी, दुखी जनता को? काफ़ी दिनों तक तुम शक्तिशाली रहे! इस अरसे में जनता का हित कितना हुआ? मैं नहीं जानता। मैं लखनऊ से काफ़ी दूर रहता हूँ। लेकिन इसी के उत्तर में तुम्हारा भविष्य है, यह मैं जानता हूँ। मालूम नहीं कमला कि आज तुम भले हो या बुरे। बुरे हो तो बुरा नहीं। चारों ओर ही बुरे-ही-बुरे हैं, परन्तु यदि भले हो तुम मेरी जान! तो आज बहुत ही भले लगोगे, क्योंकि भले लोग नज़र आ नहीं रहे हैं।

