बच्चा महाराज
‘बाबू!’ जवान लड़के ने वृद्ध, धनिक और पुत्रवत्सल पिता को सम्बोधित किया।
‘बचवा… !’
‘मिर्ज़ापुर में पुलिस सब-इन्स्पेक्टर की नौकरी मेरा एक दोस्त, जो कि पुलिस में है, मुझे दिलाने को तैयार है। क्या कहते हो?’
‘धन्यभाग्य, बचवा!’ प्रसन्नप्राय पिता ने सुनाया, ‘पुलिस में तो हवलदार भी हो जाना घर में लक्ष्मी का पाँव तोड़कर बैठना होता है।’
‘दोस्त ने लिखा है कि सब-इन्स्पेक्टरी तो धरी-जैसी है, लेकिन…’
‘लेकिन क्या, बचवा?’
‘कोशिश-पैरवी में कुछ तो ख़र्चा-वर्चा लगेगा ही। रुपए डेढ़ सौ लगेंगे, तब मैं सब-इन्स्पेक्टर बन सकूँगा। मेरी चेष्टा भरसक यही रहेगी कि चुनार ही में मेरी नियुक्ति हो।’
चुनार में अपना बेटा छोटा दारोग़ा होगा, इस कल्पना ही ने वृद्ध पिता को कुछ ऐसा गुदगुदाया कि तिजोरी खोलकर उसने उसी समय डेढ़ सौ लाईदार विक्टोरिया रुपए बेटे के आगे गिन दिए। बेटे राम उसी समय दुघड़ी साध दो ही दिन बाद लौटने का वायदा कर मिर्ज़ापुर को रवाना हो गए। एक दिन, दो दिन, तीन और चार दिन जब गुज़र गए तो पाँचवें का भी प्रभात हो गया तब पिता का माथा ठनका। उसे दाल में काला-ही-काला दिखाई पड़ने लगा। तब तक एक जाने-पहचाने महाशय मिर्ज़ापुर से आए, जिनसे वृद्ध व्याकुल बाप ने पूछा, ‘क्यों भाई, मेरे बेटे का भी कोई खोज-पता है?’
‘क्यों नहीं! उसके तो गुलछर्रे हैं आजकल…’ पिता को पूर्ण विश्वास हो गया कि उसका पूत निश्चय ही सब-इन्स्पेक्टर-पुलिस हो गया।
‘गुलछर्रे? तो हो गया वह सब-इन्स्पेक्टर-पुलिस? भई, क्या ख़बर तुमने सुनाई है! चलो मेरे घर, तुम्हारा मुँह मीठा कराऊँ।’
‘मगर कौन भकुवा सब-इन्स्पेक्टर-पुलिस बना?’ हैरान परिचित ने कहा, ‘वह तो पिछले पाँच दिन से मिर्ज़ापुरी इक्के पर दो-दो तवायफ़ें बैठाए, अफ़ीम के ऊपर शराब चढ़ाए वहाँ के अय्याशों में चुनार का झण्डा फहरा रहा है। जाकर देखिए भी।’
इस पर हाय-तौबा करता हुआ बूढ़ा लालची बाप जब तक मिर्ज़ापुर पहुँचा तब तक पुत्र महाशय डेढ़ सौ तो उड़ा ही चुके थे, ऊपर से रण्डी-भड़वों के पचास रुपयों के कर्ज़दार भी हो चुके थे। लाचारी थी, बेटा अपना था, बदनामी का बड़ा भय था। अत: पिता ने पचास रुपए और पानी में डालकर बेटे का उद्धार किया। पिता का नाम था ब्रह्मा मिश्र, पुत्र का महादेव मिश्र उर्फ़ बच्चा महाराज।
मुहल्ला सद्दूपुर के सबसे अधिक धन-पुष्ट ब्राह्मण थे ब्रह्मा मिश्र। हमारे कच्चे मकानों में परम पक्की हवेली एक उन्हीं की थी। पहली पत्नी से बच्चे न होने के सबब ब्रह्मा मिश्र ने दूसरी शादी की थी। तब महादेव मिश्र, एक भाई तथा तीन बहनें पैदा हुईं। महादेव मिश्र उर्फ़ बच्चा महाराज ने क्या पढ़ा था, कहाँ पढ़ा था, मुझे आज भी पता नहीं, पर सारे जीवन वह प्रथम श्रेणी के धूर्त, ऐय्यार, वस्तुत: बदमाश थे। वह उस सीमा के दुष्ट थे जिसके एक ही जूता आगे सहृदय सज्जनता का हलक़ा शुरू हो जाता है। वह बहुत आकर्षक वक्ता, सुरीले, परम रंगीन मिज़ाज, परम धूर्तराज, सर्वभक्षी, सर्वपायी और भगवान् झूठ न कहलाए—सर्व-भोगी थे। जवानी में उन्होंने चेचक का टीका लगाने वाले सरकारी इन्स्पेक्टर का काम कुछ बरसों किया; कुछ बरसों चुनार के चर्च मिशन स्कूल में संस्कृत-हिन्दी टीचर रहे। शेष सारा जीवन बच्चा गुरु ने अद्भुत, आकर्षक आवारगी में बिताया। बच्चा महाराज अभी गत कल तक जीवित रहकर प्राय: नब्बे वर्ष की दीर्घ उम्र में मरे। अन्त काल तक उनकी रंगीन-मिज़ाजी उनके साथ रही। बच्चा गुरु मेरे पिता के समवयस्क, मेरे बड़े भाई को चौपट घाट उतारने वाले और मेरे तो गुरु ही थे। चर्च मिशन स्कूल, चुनार में तीसरी से छठी क्लास तक पं. महादेव मिश्र से मैं कोर्स की किताब की हिन्दी पढ़ता था। बच्चा गुरु अध्यापकी यों करते थे कि किसी पैसे वाले छात्र को दक्षिणा लेकर मानीटर बना देते थे। इसके बाद क्लास में आते ही वह तो कुरसी पर बैठे-बैठे टेबल पर पाँव पसार अफ़ीम के नशे में अध-सो जाते और राज करता था मानीटर। मुहल्ले का होने से उनकी शराब-कबाब, जुआ-मण्डली में लघु सेवक की तरह उपस्थित रहने वाले की हैसियत से, मुझे भी गुरुजी ने मानीटर बना दिया था।
गुरुजी मज़बूत-कमज़ोर दोनों ही प्रकार के छात्रों से ऊपर की आमदनी करना सनातन धर्म की रू से अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मानते थे। चवन्नी से लेकर दस-पाँच रुपए तक सामर्थ्य ताड़कर बच्चा गुरु छात्र या उसके पिता से ले लेते थे। दक्षिणा के बाद कर्ज़ भी लेने में उन्हें संकोच न होता। ग़रीब छात्रों से गाँव का घी, शहद, नया गुड़, तेल के अचार, ईख का रस, बाजरा, अरहर, जो भी सम्भव होता, ले लेते। मानीटर की हैसियत से मैं भी कमज़ोर कामरेडों से मुफ़्त की मिठाइयाँ और फल खा लेता था। हत्थे न चढ़ने वालों को स्वयं साधारण छात्र होने के बावजूद गुरुजी की कृपा से मैं मार तक बैठता था।
बच्चा महाराज महा भयानक, साथ ही, महा विचित्र व्यक्ति! भयानक भी विचित्र होते ही रसज्ञों के देखने की वस्तु: एक रस हो जाता है। है कि नहीं? बच्चा गुरु टीचर रहे हों या वैक्सिनेटर; सरकारी नौकरी में रहे हों या अर्ध-सरकारी; अफ़ीम, शराब, वेश्या और जुआ हमेशा उनके संग रहे। साथ ही, नित्य नेम से पूजा-पाठ भी। युगों तक वह मिट्टी का महादेव बना, हाथ का अर्घा, पार्थि-पूजन किया करते थे। दुर्गासप्तशती का पाठ भी उन्हें प्रिय था। वह स्तुति के श्लोक इतनी तन्मयता से, भावुकता से, स्वर और विरामयुक्त कहते थे कि लगता था इष्टदेव से प्रत्यक्ष बातें कर रहे हैं। शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत भगवती की शिखरणी छन्द वाली स्तुति का गान वह भाव-विभोर होकर करते थे। ‘गीतगोविन्द’ के पद और ‘विनयपत्रिका’ के अनेक पद वह बहुत ही तेजस्विता से उपस्थित करते थे। ज्योतिष और वैद्यक, तन्त्र और मन्त्रों में भी उनकी मार्मिक गति थी। वह बात-बात में कोई तेज़ फ़िकरा, कोई श्लोक-खण्ड, कोई दोहा-चौपाई, शेर या कहावत जोड़ने में निहायत निपुण थे।
लेकिन पूजा के समय जो वह विग्रह के सामने मुँह बना, आँखों में आँसू भर लेते थे, वह यही सोचकर कि भगवान् भी ऊपर-ही-ऊपर देख धोखा खा सकता है। साथ ही, वह ख़ासकर भगवान् को भी पाठ पढ़ा सकते हैं। मुझे आज भी मज़े में याद है बच्चा गुरु के भाव जो वह जुआ में कौड़ी-कप्तेन विपरीत पड़ने पर व्यक्त किया करते। ‘हे नाथ!’ वह भगवान् को सम्बोधित करते—‘कहाँ भूल गए दयालो! दास को? प्रभो, दीनबन्धो, दया करो!’ और कौड़ी-कप्तेन अपने पक्ष में पड़ते ही वह तड़पकर ‘विनयपत्रिका’ सुनाने लगते: जयति राज राजेन्द्र राजीव लोचन राम, नाम कलिकामतरु सामशली। हेलया दलित भूभार भारी!
उन दिनों घर, मैदान, गंगा में नाव पर, पास के गाँवों में, जहाँ भी जुआ होता बच्चा गुरु उसमें ज़रूर उपस्थित होते। इस तरह गुरुजी ने इतनी बड़ी ज़िन्दगी आख़िर बिताई कैसे? जुआ के लिए पुष्कल पैसे आवश्यक होते हैं। ठीक है। बच्चा गुरु ने उसकी युक्ति सोच रखी थी। पहले उन्होंने ख़ासी सम्पत्ति में जो उनका हिस्सा था उसे चुपचाप अपने छोटे भाई के नाम लिख दिया और फिर सूदख़ोर बनियों से उसी सम्पत्ति पर ऋण-पर-ऋण लेना शुरू किया। क़लई खुली तब जब किसी बनिये ने दावा किया। कुर्की लेकर आने पर पता चला कि बच्चा गुरु का तो परिवार की सम्पत्ति से अरसे से कोई वास्ता ही नहीं। मैंने कहा, चुनार में बच्चा गुरु की सबसे ज़्यादा जजमानी थी और उन दिनों, फिर भी, कैसे भी, ब्राह्मण को कष्ट देते हुए सेठ-साहूकार, श्रीमान्, कम्पित होते थे। सो, साहूकारों ने कई हज़ार रुपए बट्टेखाते डाल, कान पकड़, जीभ दाबकर मंजूर किया कि चुनार में कोई गुरु है तो वह है पं. महादेव मिश्र उर्फ़ बच्चा महाराज। हज़ारों वाले तो बच्चा गुरु को ब्राह्मण जान ग़म खाकर रह गए, लेकिन एक कोई बनिया ऐसा भी था जिसने सौ-पचास रुपए के लिए केस, डिग्री करा, अदालत के अहाते ही में गुरु को धर पकड़ा था। निर्णय था कि या तो वे रुपए देते या जेल जाते। बच्चा गुरु को जब हथकड़ी लगने लगी, उन्होंने अधिकारियों से अपने घर चलने को कहा, ताकि वह रुपये दे सकें। हथकड़ी पहने ही सिपाहियों के साथ अपने मुहल्ले में लाए गए, लेकिन इस शान से उनके आने का समाचार सुनते ही उनकी मालदार माता ने एक दमड़ी भी न देने का निश्चय कर घर का मज़बूत दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया था।
लेकिन, गुरुजी गुरु ही थे। चारों तरफ़ से हताश होने पर उन्होंने ऋण-दाता ही को दबोचा— ‘चल, नीच बनिये। ॐ फट् स्वाहा! कर ब्रह्म हत्या’ क्योंकि जेल में मुझे अफ़ीम मिलेगी नहीं और बिना अफ़ीम मैं एक सैकण्ड जी नहीं सकता। चल, मैं ब्रह्म राक्षस बनकर तुझसे न निपटूँ तो ब्रह्मा मिश्र का नुत्फ़ा नहीं। अभी तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण कैसा होता है। बच्चूजी! अब तुम पड़े कठिन रावण के पाले। और पाठक विश्वास करें, वह बनिया भी खून घूँटकर रह गया था, लेकिन गुरुजी से छदाम भी उसके पल्ले न पड़ा था। और साहब, सारे जीवन कोई-न-कोई मतिमन्द, गाँठ का पूरा, उनके हत्थे बराबर चढ़ता ही रहा। अफ़ीम के ऊपर गाँजे की लम्बी चिलम एक ही हाथ की मुट्ठी से फुकफकाकर लपलपाते हुए बच्चा गुरु निहायत लापरवाह भाव से ललकारते थे— अगड़ बम! कमाए दुनिया खाएँ हम! भोले अगड़ धत्ता! चिलम पर चढ़ाकर फूँक दिया कलकत्ता!
मैं समझता हूँ साठ वर्ष की उम्र में बच्चा गुरु ने जुआ कम कर दिया था। अब वह बनारस के विख्यात वेश्या-बाज़ार दाल मण्डी के (जिसका चप्पा-चप्पा उनका जाना-बूझा था) आचार्य बन गए। साठ से प्राय: नब्बे की उम्र तक गुरुजी, सारा बनारस जानता है, सारे बनारस की वेश्याओं के विदित आचार्य थे। हर वेश्या चाहती कि वह उसी के घर पर रहा करें, क्योंकि गुरुजी सुन्दरी स्त्री के पीर-बावर्ची-भिश्ती–खर तक आकर्षक प्रसन्नतापूर्वक बन जाते थे। वह वेश्याओं के घर जप-पूजा, सत्यनारायण, दुर्गासप्तशती के पाठ ललककर करते। उनके बच्चों की जन्म-कुण्डलियाँ बना देते, दलदार गबरू बनारसियों से उनका प्रोपेगण्डा कर देते। वह वेश्या को यार के यहाँ और मालदार आसामी को तवायफ़ के यहाँ स्वयंसेवकों की तरह पहुँचा देते। बच्चा गुरु की यह विशेषता थी कि उनकी सहानुभूति संसार के हर जीव से थी। किसी का कोई भी काम (सेवा नहीं) महज़ सहज रूप से आनन-फानन अंजाम देने को वह सदा ही तत्पर रहते थे। मुहल्ले के कुछ लोग यह मानते कि बच्चा गुरु की परोपकार-तत्परता दलाली कमाने-मात्र की थी और वह दो उलझनों के निकट पार्टियों को पूर्णत: उलझाकर अपना उल्लू सीधा किया करते थे। हो सकता है, उनकी नीयत यही रही हो, लेकिन आज मुझे लगता है कि जन-सेवा — सारी बुराइयों के बावजूद — उनकी जान में घुली-मिली हुई थी। गीता में ‘पण्डित’ उसे माना गया है जो विद्या-विनय-सम्पन्न ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल को भी समदर्शी-भाव एक नज़र से बराबर देखता हो। यथाशक्ति सबका कल्याण साधने में बच्चा गुरु समदर्शी थे। ब्राह्मण की सहायता करते हुए यदि कभी उन्हें चाण्डाल दुखग्रस्त नज़र आया होगा, तो उसी आग्रह से उसके लिए भी उन्होंने सोचा होगा। भले ब्राह्मण का काम करते समय गुरुजी गंगा के गुण-गान करते: त्वत्तीरेवसत: त्वदम्बु पिवत: और भंगी-मेहतर की मदद करते समय उनके लिए बुरी-बुरी गालियाँ मुँह से निकालते। बच्चा गुरु सौ में नब्बे बार निर्विकार लच्छेदार गालियाँ सुनाया करते थे। और तो और, गुरुजी जिन्हें गालियाँ सुनाते थे वे भी सहज प्रसन्न हँसा करते थे। चाहते थे कि गुरुजी और बकें।
और अब मेरे सामने चित्र आता है गुरुजी की विवाहिता धर्म-पत्नी गुलजारी चाची का। शायद वही बच्चा गुरु के जीवन की आदि या बुनियादी ट्रेजेडी रही हों। वह बड़ी कुरूपा थीं। उनका मुँह चेचक के दाग़ों से भरा, गोल, नाक छोटी, होंठ मोटे, छरहरी-लम्बी गुलजारी चाची। वह शायद बेशऊर स्त्री भी थीं। कहाँ बच्चा गुरु-जैसा रंगीन-मिज़ाज वाममार्गी, कहाँ गुलजारी चाची-जैसी रंगभंगिनी वामांगिनी! सो, ज़रूर विस्फोट हुआ होगा। बच्चा गुरु गुलजारी चाची को अपने शयन-कक्ष में कभी न बुलाते, बशर्ते कि अफ़ीम-विषयक कोई हाजत न हो और चन्द क्षणों के लिए भी चाची को देखते ही बड़े ज़ोर-ज़ोर से चीखते, ताकि सारा मोहल्ला सुने और जाने कि बच्चा गुरु अपनी पत्नी को लताड़ रहे हैं। वह उसे बुरी-से-बुरी गालियाँ सुनाते। और वह भी थी कि अपने दुर्भाग्य ही जैसी; बीच में फूटे ढोल-जैसे कण्ठ से कुछ-न-कुछ कु-भाषा बोल ही देती। बच्चा गुरु गुलजारी चाची को अक्सर मारते और अपनी जननी को भी परम अशोभन रूप से डाँटते-फटकारते थे।
गुरुजी जिस भी वेश्या के घर में कुछ दिनों टिककर रहे होंगे, ज़रूर कोई-न-कोई बहुत ख़ूबसूरत देख लेने के बाद। वह वेश्या की नवोढ़ा बेटी को मद्दे-नज़र रख उसकी माता से मुहब्बत करते थे। फिर उसे समझाते कि फलाँ ढंग से अगर यह लड़की पूजन-अनुष्ठान करे तो लखपती तो फँसा ही धरा है। और रंग बाँध, रण्डी को धूर्त्तता में बाँध, उसी के घर में कम-से-कम इक्कीस दिन का अनुष्ठान शुरू करते।
अब आप बच्चा गुरु का हुलिया नोट कर लें— पौने छ: फुट लम्बे, छरहरे, गेहुआँ रंग, बड़ी-बड़ी भावुक आँखें, हमेशा मुखरित होने को फड़कते ओष्ठाधर, साधारण मूँछें, घुटी दाढ़ी, सिर पर इंगलिश-कट केश। बच्चा गुरु फ़ेल्ट टोपी, बनियान, कड़े कालर-कफ़ की कमीज़, शेरवानी, नफ़ीस धोती, जुर्राब और पम्प शू या विलायती कट बूत पहना करते थे। नाक पर हमेशा चश्मे, हाथ में बराबर छड़ी। अँगुलियों में अँगूठियाँ, जेब में रेल-गार्ड घड़ी (जो उन्होंने जुए में किसी जुआरी गार्ड से जीती थी), एक हाथ में मलाई का पुरवा, दूसरे में नमकीन और मिठाई के दोने। साथ में एक-दो गण या चेले। अफ़ीम, गाँजा या मदिरा, अथवा इनमें से दो या तीनों के नशे में धुत वह जब रास्ते में चलते थे, सारी राह पाँवों से कहीं ज़्यादा तेज़ बच्चा गुरु की जुबान चलती थी।
अब जब चर्चा चल ही पड़ी है, तो और एक चित्र गुरुजी का दिखलाऊँ। बच्चा गुरु ब्राह्मण-वेश में चन्दन और चश्मे चढ़ाए, उत्तरीय ओढ़े, ऊन के आसन पर नशे में चक्क जमे कोई मन्त्र कई बार जपने के बाद सामने बैठी युवती की ओर फूकें मार रहे हैं। युवती गुरु की चहेती वेश्या की बेटी है। नथुनी अभी उतरी नहीं है। वह सुमुखी, सुनयना, गौरी, मतवाली —गुरु की नज़रों में ब्लैक लेबिल जानीवाकर व्हिस्की की उल्लास-लासमयी प्याली। युवती सुनयना को उसकी माता की हिदायत थी कि वह बराबर गुरुजी की तरफ़ देखती रहे, ध्यान से, ताकि पूरी तरह लाभ हो मन्त्र-अनुष्ठान से।
वेश्या-बाज़ार में यार की तरह, ऐयार की तरह, तन्त्री की तरह, मन्त्री की तरह, बुजुर्ग की तरह, बाबा की तरह, तरह-तरह की सूरतें हर तरह से देखते ज़िन्दगी के राजपथ से बच्चा गुरु लहर-बहर प्राय: नब्बे की उम्र में गुज़रे। अन्त में वे धनुष की तरह झुककर चलते थे। परन्तु उनकी आँखें बोलतीं, बड़ी और आवाज़ कड़कदार अन्त घड़ी तक वैसी ही रही। बच्चा महाराज किसी का भी बुरा नहीं चाहते थे, फिर भी, उनके विचित्र चरित्र के आकर्षण से मुहल्ले के तरुण बरबाद हो गए। कुछ नहीं तो सैकड़ों तरुणों को उन्होंने हराम-घाट पर इस उत्साह से उतार दिया होगा मानो राम ही का काम अंजाम दे रहे हैं!
पं. जगन्नाथ पाँडे
अब मैं चौदह साल का हो चला था कि रामलीला-मण्डली से छुट्टी मनाने बड़़े भाई के संग चुनार आया। इस बार अलीगढ़ में किसी बात पर महन्त राममनोहरदास और मेरे बड़े भाई में वाद-विवाद हो गया था, जिस पर भाई ने लीला में स्वयं काम करने या मुझे करने देने से इन्कार कर दिया था। महन्त ने धमकाया था कि लीला में विघ्न पड़ा तो वह हमें पुलिस के हवाले कर देगा। सो, अलीगढ़ से भाई साहब रामलीला-मण्डली-जीवन से ऊबकर आए थे।
जानकार जानते होंगे कि चौदह-पन्द्रह साल की वय में जवाहरलाल और श्रीप्रकाश लन्दन में शिक्षा पा रहे थे — उत्तम-से-उत्तम। लेकिन उसी उम्र में मुझे क्या शिक्षा मिली थी, मेरा जी ही जानता था। सच तो यह है कि शब्द शिक्षा मेरे निकट आते-आते भिक्षा बन जाया करता था। रामलीला-मण्डली की आवारगी से मैं उतना नहीं परेशान था, जितना कि बड़े भाई के गाँजा-मत्त क्रोधी स्वभाव से। उनकी-मेरी संगत क़साई-बकरे का साथ। क़साई भी वह जिसके बारे में कहावत है — ख़स्सी जान से गया, क़साई को कोई ज़ायका ही नहीं मिला। ख़ैर!
इस बार जो हम घर पर आए तो न जाने क्या मेरे सौभाग्य जागे कि मेरे पुत्रहीन पितृव्य (चचा) ने, चाची की सलाह मानकर, मुझे गोद लेने का इरादा मेरे बड़े भाई पर ज़ाहिर किया। इस प्रस्ताव से बड़े भाई का गला ही छूटता था, सो उन्हें राज़ी होने में देर न लगी। मैं चचा की गोद चला गया। अब उन्होंने, बाक़ायदा, मेरी शिक्षा-दीक्षा का निर्णय किया। फलत: चौदह वर्ष की वय में चुनार के चर्च मिशन स्कूल में मेरा नाम थर्ड क्लास में लिखाया गया। और मैंने स्कूल का मुँह देखा। थर्ड ही क्लास में दुनियादारी, ऐयारी और यारी में मैं टीचर की कुरसी पर आसीन होने योग्य था। थर्ड, फोर्थ, फि़फ्थ पास कर सिक्स में मैं पहुँचा ही था कि मेरी चाची के एक सुन्दर-सा पुत्र पैदा हो गया। सो, चचा-चाची का वात्सल्य-बाज़ार-भाव गिरते देर न लगी। गोद भी मैं ज़ुबानी लिया गया था, विधि-विरहित, सो मुझे पुन: कठोर धरती पर धम-से पटक देने में अदूरदर्शियों को देर न लगी। चचाजी अपने परिवार के साथ काशी चले गए। मैं पुन: उसी भाई के ग़ैर-ज़िम्मेदार चंगुल में लाचार जकड़ा गया। ‘पुनि मो कहँ सोइ दिन, सोइ राती।’ फ़ीस की कमी, कपड़ों की कमी, राशन की कमी। आधिक्य उपदेशों और पिटाई की! घास-न-भुस खरहरा दस बार। इस सबके ऊपर कष्टदायी था भाई का बराबर जुआरत रहना। जीवन को सम्यक् कर्म के सहारे न छोड़ भाई साहब ने जुआ के आसरे छोड़ रखा था।
इसी बीच स्कूल में एक घटना घटी। मौलवी लियाक़त अली नामक एक कठमुल्लाजी थे, जो उर्दू, फ़ारसी और अर्थमेटिक छह-सात-आठवीं क्लासों को पढ़ाया करते थे। उनके विचार उस समय ही हवा के अनुसार हिन्दू-भावना-विरोधी थे। कई बार क्लासों में पढ़ाते-पढ़ाते वह कोई ऐसी बात बक जाते जिससे हिन्दू विद्यार्थियों को मार्मिक चोट लगती। उनकी इन हरकतों से हिन्दू-विद्यार्थी खिन्न और क्रुद्ध होने पर भी विवश थे। इधर मैं अपने भाई के अनुचित आचरणों से आकुल हो विद्रोही बनने को ललक रहा था कि मौका आया। मौलवी ने एक दिन सेवन्थ क्लास में सुनाया कि हिन्दुओं के देवता तो मेरे पाजामे में बन्द रहते हैं। उस दिन क्लास के बाद कुछ लड़के बहुत ही नाराज़ नज़र आए। तय पाया कि मौलवी का इलाज करने के लिए बनारस के जयनारायण हवाई स्कूल के प्रिंसिपल साहब को तार से कठमुल्ला के दुर्व्यहार की सूचना दी जाए। लेकिन अपने नाम के तार भेजने को कोई तैयार नहीं था। बिल्ली को घण्टी बाँधने में भय था रस्टिकेशन (स्कूल से बाहर किए जाने) का। मैंने सोचा, रस्टिकेट होने में यह लाभ रहेगा कि पढ़ने से जान बचेगी, सो तार मैंने अपने नाम दिलवा दिया— ‘मौलवी लियाकतअली, मिशन टीचर इन्सल्ट्स अवर रिलिजस फ़ीलिंग्स; नो सेटिसफैक्ट्री इन्क्वायिरी।— बेचन पाँडे।’ असल में चुनार का चर्च मिशन स्कूल काशी के जयनारायण मिशन स्कूल के अधीन था। अत: तार पाते ही अंग्रेज़ प्रिंसिपल साहब चुनार में, और बन्देख़ाँ स्कूल से ग़ायब। क्योंकि रस्टिकेट होना और बात थी और बेंत खाना बिलकुल ही और बात। विद्यार्थी को डिसिप्लिन में रहना चाहिए। मैंने डिसिप्लिन के ख़िलाफ काम किया था। पाते तो वे मुझे आदर्श बनाने के लिए सारे स्कूल के सामने बेंतियाते। नहीं पाया, तो रजिस्टर से मेरा नाम ही उड़ा दिया। लेकिन बचे मौलवी साहब भी नहीं। प्रिंसिपल ने उनकी सख़्त तम्बीह की।
संयोगवशात् उन्हीं दिनों काशी में चचा के यहाँ उनकी लड़की का गौना पड़ा, जिसमें सम्मिलित होने के लिए हमारे घरवाले भी बनारस गए थे। मौक़ा पाकर, वहीं, चचा से मैं गिड़गिड़ाया कि वे मेरी भी पढ़ाई का प्रबन्ध करें, नहीं तो मैं कहीं का भी न रहूँगा। उन दिनों चचा साहब की चलती थी। ख़ासी आमदनी और ख़ासा ख़र्चा था। काशी में उन्हीं के व्यय से उनका दामाद पढ़ता था और एक साला भी। मुझे तो चन्द ही महीनों पहले वह चुनार में पढ़ा ही रहे थे। उन्होंने मुझे भी काशी में रहकर पढ़ने की इजाज़त दे दी। चर्च मिशन स्कूल चुनार से मुझे जो सर्टिफिकेट मिला उसमें कन्डक्ट फ़ेयर लिखा गया। ख़ैर! बनारस के विख्यात हिन्दू (कालिजिएट) स्कूल में छठे दरजे में ले लिया गया। उस समय स्थानापन्न प्रधानाध्यापक के पद पर देव-तुल्य बालकों के हितैषी श्री कालीप्रसन्न चक्रवर्ती महोदय थे। चक्रवर्तीजी ने जब मुझसे सर्टिफिकेट में कन्डक्ट फ़ेयर का सबब पूछा तब चपल वाचालतापूर्वक मैंने बतलाया था, क्योंकि वह क्रिश्चियन स्कूल था और मैं था ब्राह्मण, अत: यह स्थिति उत्पन्न हुई। और लियाक़तअली का क़िस्सा भी मैं सुना गया था। मैंने लिखा है ऊपर, चक्रवर्ती महाशय बालकों के वरदानी हितैषी थे। करेक्टर मेरा बैड भी लिखा होता तो भी भरसक वह सरस्वती-मन्दिर से मुझे विमुख न फेरते। उनका बड़ा मान था, महामना मालवीयजी की नज़रों में, काशी के बड़े-बड़ों में। हिन्दू स्कूल से छठी और सातवीं क्लासें चचा की कृपा से मैंने पास कीं। इसके बाद चचा ने काशी के खोजवाँ मुहल्ले में एक महान ख़रीदा और भदैनी से वहीं जाकर रहने लगे, हमें अपने-अपने रस्ते लगने का संकेत कर।
मैं अब निराश्रय होने के बाद, लक्ष्मीकुण्ड के विख्यात लक्ष्मी-मन्दिर में अपने जलालपुर गाँव के काका रामानन्द दुबे के साथ रहने लगा। रामानन्दजी ब्राह्मण-वृत्ति से चार पैसे कमाते थे। अन्नपूर्णा-मन्दिर में भी उनका प्रवेश था। मेरा ख़याल है, उदार श्री कालीप्रसन्न चक्रवर्ती ही ने दिवंगत दानवीर बाबू शिवप्रसादजी गुप्त के नाम एक रुक्का लिखकर मुझे दिया था, ताकि बाबू साहब मेरी फ़ीस और भोजन की व्यवस्था कृपया कर दें। रुक्का लेकर मैं ‘सेवा उपवन’ गया— ढाई कोस पैदल, नंगे पाँव। शिवप्रसादजी-जैसे बड़े आदमी मुझसे क्या मिलते — अलबत्ता काम मेरा हो गया और मैं ‘सेवा उपवन’ से महीने-भर खाने क़ाबिल आटा, दाल, चावल, तेल, नमक और लकड़ी के कुछ नक़द पैसे शायद लेकर यानी सिर पर लादकर नगवा से महालक्ष्मीजी आया। साल-भर तक इसी तरह मैं ‘सेवा उपवन’ के अन्नसत्र से सामग्री सिर पर लादकर ले आता।
अब मैं आठवें दरजे में था। तब स्कूल के हेडमास्टर श्री गुरुसेवक सिंह उपाध्याय थे। महामना मालवीयजी ने उपाध्यायजी की शिक्षा-सम्बन्धी योग्यता से मुग्ध होकर उन्हें सरकार से हिन्दू स्कूल का प्रधान बनने के लिए कुछ वर्षों के लिए उधार माँग लिया था। गुरुसेवकजी सरकारी ड्यूटी से ताज़ा-ताज़ा आने के सबब श्रेष्ठ हेडमास्टर होने पर भी ‘छुट्टी पर डिप्टी-कलेक्टर’ भी थे। आते ही उन्होंने विद्यार्थियों पर नियंत्रण का नीरस पंजा कसा — सिर पर टोपी क्यों नहीं है? ये जुल्फ़ें सँवरी क्यों हैं? बोलते वक्त मुस्कराते क्यों हो? रामू श्यामू के गले में हाथ डालकर क्यों चला? ख़बरदार जो कोई विद्यार्थी किसी के गले में हाथ डालकर चलता पाया गया! ठीक नहीं होगा। क्या जनानी सूरत बना रखी है? मर्दों की तरह रहो।
उपाध्यायजी की बातें सौ-में-सौ ठीक होती थीं — शायद कहने का ढंग या उस ढंग से स्नेह-संचार सम्यक् नहीं होता था। आज तो मैं यही मानूँगा कि उनकी बातें ठीक थीं, हमारी ही बुद्धि विपरीत थी, ख़ासकर मेरी। एक दिन विद्यार्थियों और अध्यापकों की एक गोष्ठी में तुकबन्दी पढ़कर उपाध्यायजी के लहज़े ही में मैंने सुनाई जो नितान्त अनुचित बात थी, भयानक दुस्साहस था। जब मैं वह तुकबन्दी पढ़ रहा था ‘अनुचित-अनुचित-भाव’ में कई अध्यापक कुरसी से उचक तक पड़े थे। दूसरे दिन स्कूली पढ़ाई समाप्त होने के बाद ही उपाध्यायजी ने मुझे हेडमास्टर के कमरे में बुलाया। चाहा उन्होंने कि मैं क्षमा चाहूँ वैसी तुकबन्दी, उस भाव से पढ़ने के लिए। लेकिन मैं ढीठ ही रहा; धृष्ट भी। दूसरी ओर वार्षिक परीक्षा में भी फेल हो गया। परीक्षा में फेल होना असाधारण दुर्भाग्य! अब बाबू शिवप्रसाद गुप्त के सत्र से न तो आटा मिलने की आशा, न दाल। फ़ीस तक मोहाल। सो, मैंने बनारस में निराधार ठोकरें खाने से बेहतर अपने घर की लातों को समझा। मैं भाई के यहाँ चुनार भाग आया। बड़े भाई साहब मालगुजारी की तहसील-वसूली के सिलसिले में गाँव (जलालपुर माफ़ी) गए हुए थे।
दूसरे दिन गाँव की किसी अहीरन ने मुझे दस रुपए का एक नोट दिया कि मैं भाभी को दे दूँ, भाई साहब ने भेजा है। दस का नोट हाथ लगते ही भाई के भय के मारे — कि मुझे फ़ेल हुआ सुनकर वह क्या न कर डाले — मैं मात्र धोती-कमीज़ और एक अँगोछा लिये चुनार स्टेशन चला आया। समय साध, पहली ही ट्रेन से कलकत्ता भाग जाने के लिए।
कलकत्ता शहर में पहली बार मैं भूखे, निराश्रय, भगोड़े की तरह पहुँचा था। कलकत्ते में मेरे पड़ोसी भाई विश्वनाथ त्रिपाठी रहते थे, जिनका (सन् 1919 के अन्त में भी) ‘विश्वमित्र’ के विज्ञापन-विभाग से तेजस्वी सम्बन्ध था। मुझे मालूम था कि तब ‘विश्वमित्र’ नारायण बाबू लेन अफ़ीम चौरस्ता से निकलता था। वहीं पहुँचने से विश्वनाथ भाई के डेरे का पता चलता। हवड़ा पुल पार ट्राम पर सवार हो मैंने नारायण बाबू लेन का टिकट माँगा, तो कन्डक्टर ने मुझे नीचे उतार दिया। कितना भटका मैं महानगरी के महा मकानों के वन में ‘विश्वमित्र’ कार्यालय ढूँढ़ता! और पानी बरसने लगा। जब मैं मछुआ बाज़ार, क़साईपाड़े में भटक रहा था, बरसात का पानी पाँवों के नीचे घुटने-घुटने बह रहा था। बड़ी मुश्किलों, बड़े फेरों के बाद मैं ‘विश्वमित्र’ कार्यालय के द्वार पर पहुँचा था। सामने सीढ़ियों का सिलसिला। दफ़्तर ऊपर के तले में था। नीचे रुककर पहले मैंने तरबतर धोती और कमीज़ निचोड़ी, तन का जल भी यथासाध्य सुखाया। फिर गीले ही कपड़े मैं ऊपर की तरफ़ बढ़ा। ‘विश्वमित्र’ के विख्यात संचालक बाबू मूलचन्दजी अग्रवाल से मेरी पहली मुलाकात इसी ठाट में हुई थी। मैंने उनसे कहा था — ‘मैं चुनार से आ रहा हूँ। विश्वनाथ त्रिपाठी का पता चाहता हूँ।’ ‘विश्वनाथजी तो,’ निराश, मगर सदय, अग्रवालजी ने बतलाया, ‘कल ही रात चुनार चले गए!’
लाला भगवान ‘दीन’
अरसा हुआ वाराणसी के दैनिक अखबार ‘आज’ में आदरणीय पं. श्रीकृष्णदत्तजी पालीवाल की चर्चा करते हुए मैंने लिखा था कि मेरे पाँच गुरु हैं, जिनमें एक पालीवालजी भी हैं। उन पाँचों में मैं अपने उन ज्येष्ठ अग्रज को भी मानता हूँ जिनकी पिछले पृष्ठों में मैंने भूरि-भूरि भर्त्सना की है। बेशक यह ग़ैर-ज़िम्मेदार, बदमाश, बदचलन, बिल्कुल बद व्यक्ति थे, लेकिन जब मैं क ख ग लिखना भी नहीं जानता था, तब उन्हें साहित्य पढ़ने ही नहीं यथाशक्ति लिखने का भी शौक़ था। तत्कालीन समस्यापूर्ति (‘रसिक रहस्य’, ‘प्रियंवदा’ आदि) मासिक पत्रों में अपने-तो-अपने मेरी भावज के नाम भी रचकर समस्यापूर्तियाँ प्रकाशित कराते थे। एक बंगाली डॉक्टर को हिन्दी पढ़ाते-पढ़ाते उन्होंने बँगला भाषा सहज ही सीख ली थी। फलत: बँगला पुस्तकों के सस्ते संस्करण तथा ‘भारतवर्ष’ नामक विख्यात बँगला मासिक पत्र भी वह मँगाया करते थे। वह हमारे सामने बैठकर कवित्त रचते, लेख लिखते। प्रत्यक्ष न सही, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से भाई साहब के इस विद्या-व्यसन का बेचन पर बहुत शुभ्र प्रभाव अवश्य पड़ा होगा। सो, वह ख़राब आदमी — मेरा बड़ा भाई —मेरा आदि-गुरु था। पालीवालजी के दर्शन तो बहुत बाद में प्राप्त हुए। बीच में पं. काशीपति त्रिपाठी, लाला भगवान ‘दीन’ और पण्डित बाबूराव विष्णु पराड़कर के शुभ नाम हैं। काशीपति त्रिपाठी और लाला भगवान ‘दीन’ मुझे तब मिल जब कमलापति त्रिपाठी से मेरा परिचय हुआ। वैसे कमलापतिजी हिन्दू स्कूल और मेरी ही कक्षा में पढ़ते थे, लेकिन मैं था फटे हाल अदना बालक और कमलापति थे प्रतिष्ठित पैसापति-पुत्र। ब्राह्मण हमारे ही रंग के लेकिन अधिक चटकदार। सरयूपारीणों में पंक्ति, यानी परम श्रेष्ठ। कमलापति धवल-नवल वस्त्र धारण कर माथे में भस्मी लगाए स्कूल आते। मैं जाता हीन-दीन मलीन कपड़े पहने — धूल उड़ती चेहरे पर। मुझमें और कमलापति में ऐसा कोई भी साम्य न था कि हम मिलते। वह तुंग हिमालय-श्रृंग, मैं धूलि धॅंसी धरती की। लेकिन एक घटना घटी, जिससे मैं रातों-रात हिन्दू स्कूल के विद्यार्थियों में विशेषत: विज्ञापित हो गया।
उन दिनों प्रधानाध्यापक थे रतिलालजी देसाई महोदय। अत: गांधीजी का जन्म-दिवस स्कूल में अधिक उत्साह से मनाया गया था। खचाखच भरे हॉल में सभा हुई थी; निमन्त्रित एवं स्कूल के विद्वानों के गांधीजी के आदर्शों पर भाषण हुए थे। उसी सभा में महात्माजी पर मैंने एक तुकबन्दी (रोला छन्द में) पढ़ी थी। बिलकुल गलत-सलत, रद्दी। लेकिन उसमें गांधीजी का नाम था, साथ ही, विदेशियों के विरुद्ध विचार थे। बस, फिर क्या था! वह तो राष्ट्रीय भावना से भरी संस्था थी ही। हो-हो, हा-हा! तालियों की गड़गड़ाहट। और दूसरे दिन बेचन पाँडे हिन्दू स्कूल में माननीय कवि! बनारस के स्कूली प्रतिभाशालियों की काव्य-शक्ति की उस परीक्षा में, जिसमें परीक्षा-पत्र की तरह रचना लिखकर यशस्वी महाकवि सुमित्रानन्दन पन्त, शील्ड और प्रथम पुरस्कार जीतकर ले गए थे, उसी में मेरी तुकबन्दी मुकाबिले में दोयम मानी गई थी। मुझे भी द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था। यद्यपि रचना श्रेष्ठ पन्तजी की थी, मेरी कुछ भी नहीं थी, लेकिन स्कूल में प्रतिभा का अभाव होने से मुझ अंधे के हाथ भी बटेर लग गई थी। इन्हीं घटनाओं के निकट कभी कमलापति त्रिपाठी से मेरा परिचय हुआ होगा, जो पात्र परिचय नहीं, हम दोनों ही के जीवन में ज़बरदस्त मोड़ बनकर रहा। मेरा ठौर कहाँ, ठिकाना कहाँ; सो, बरसों मैं कमलापति ही के द्वार पर पड़ा रहता। विख्यात नाटककार श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र भी उन्हीं दिनों कमलापति ही के विशाल भवन में संभवत: किराएदार की तरह रहा करते थे। कमलापति के फाटकवाले कमरे में विशेषत: उन्हीं के घर की पुस्तकों से हमने एक पुस्तकालय खोला था— श्री लक्ष्मीनारायण पुस्तकालय। वहीं से हम ‘उग्र’ नाम का एक हस्तलिखित, सचित्र मासिक पत्र भी प्रकाशित करते थे। कमलापति के घर में मेरी क़द्र पहले उनके बड़े भाई काशीपतिजी ने समझी ही नहीं, यों विघोषित किया कि उनके परिवार में और पड़ोस में और परिचितों में भी ज़िक्र मेरा मुझसे बेहतर प्रमाणित होने लगा। काशीपतिजी को हम सब ‘बड़के भैया’ कहा करते थे। उनके गुरुदेव थे गदाधर शर्मा नाम सत्पुरुष, जिनका देहान्त हो चुका था। गदाधरजी को काशीपतिजी परम भावुकता से स्मरण किया करते थे। उनका अभाव उन्हें जैसे खटकता था। उन्हीं की वार्षिक तिथि आई और उस अवसर पर काशीपतिजी को प्रसन्न करने के लिए मैंने घनाक्षरी छन्द में गुरुजी के बारे में, काशीपतिजी की ओर से एक कवित्त रचना—
काहू करसी को मैं न रह्यौं, पर, जाकी कृपा
तनु-तरु माहिं बुद्धि पाई सुधा-फर-सी।
नेह दिन दूनों रात चौगुनो ठयो जो रह्यौ
भूलिहू न जाकी दृष्टि मो पै भई पर-सी।
वासना ज़हर-सी, हर-सी थी कामवासना न,
रही मुख-मण्डल पै छटा गदाधर-सी।
बरसी गयी है बिनु जाके मम-आस-लता
ताहि गुरुदेव जू की आई आजु बरसी।
लेकिन यह अध्याय काशीपतिजी अथवा कमलापतिजी का नहीं, यह तो श्रद्धेय गुरुदेव लाला भगवान ‘दीन’ जी का अध्याय है जो मेरे भाई के बाद, दूसरे पथदर्शक थे। असल में कमलापति के यहाँ पहुँचने के कारण ही मैं लालाजी के निकट पहुँच पाया था, अत: पति-भाइयों की चर्चा इस प्रसंग में आवश्यक हुई।
बात यों बनी। मैंने ध्रुवचरित पर एक खण्ड-काव्य लिखा था, फ़र्मे-सवा फ़र्मे का। कमलापति की विदुषी भानजी स्वर्गीया श्यामकुमारी मिश्र ने उसे छपाने-योग्य रुपए दिए थे। पाण्डुलिपि और रुपये लेकर जब मैं भूमिहार ब्राह्मण प्रेस में गया, तब उसे देखने के बाद प्रेस के योग्य संचालक ने बतलाया कि रचना में दोष अनेक हैं, अच्छा हो छपाने से पूर्व संशोधन करा लिया जाए। सो, मैं स्वरचित ‘ध्रुव-धारणा’ की पाण्डुलिपि लेकर जगन्नाथ शर्मा के बड़े भाई चण्डिकाप्रसाद शर्मा के साथ लालाजी के डेरे पर गया।
लाला भगवान ‘दीन’ जी की पर्सनेलिटी उनके उपनाम के अनुरूप ही थी। मुँह पर चेचक के दाग़, पक्का रंग, ठिगना क़द, मटमैला, भद्दा मुंशियाना लिबास। अलबत्ता लालाजी जब बोलने लगते थे तब उनके व्यक्तित्व की असाधारणता स्पष्ट हो जाती थी। लालाजी ने कई दिन तक परिश्रम कर मेरा खण्ड-काव्य प्रेस-योग्य तो बना ही दिया। वह काव्य महाकवि अयोध्यासिंह का ‘प्रिय प्रवास’ परम प्रेमपूर्वक कई बार पढ़ने के बाद प्राय: उन्हीं छन्दों में लिखा गया था। आरम्भ हुआ था कमलापति की ख़ुशामद से—
जिस प्रकार पयोदधि में सदा
कमल-लोचन श्री-युत शोभते
बस, उसी विधि से उर-‘उग्र’ में
निवसिये बसिये कमलापते!
लाल भगवान ‘दीन’ की ‘हॉबी’ थी पढ़ाना-पढ़ना, पढ़ना-पढ़ाना। एक विद्यालय खोलकर नियम से वह विद्यार्थियों को उसमें सम्मेलन का कोर्स, निष्काम पढ़ाया करते थे। लिखने-पढ़ने से फ़ुरसत पाते ही लालाजी विद्यार्थियों को घर भी पढ़ाया करते। हिन्दू विश्वविद्यालय के लेक्चरर तो थे ही। लालाजी अखाड़िया स्वभाव के दंगली विद्वान थे। भाष्य, समीक्षा, निबन्ध, काव्य —इ न सब कलाओं में लालाजी गम्भीर निपुण थे। सबसे ऊपर उनका हृदय सहज-कोमल स्नेहमय था। प्रसन्न-वदन ‘विनयपत्रिका’ विद्यार्थियों को पढ़ाते-पढ़ाते लालाजी भक्ति-विभोर, सजल-नयन, गद्गद-गिरा हो जाते थे। आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र, सलोने लेखक श्रीकृष्णदेव प्रसाद गौड़ ‘बेढब’, कोशकार स्व. मुंशी कालिकाप्रसाद लालाजी के शिष्यों में से हैं। मुझमें यदि कुछ प्रतिभा थी तो उसे लालाजी के मात्र आशीर्वाद का पोष प्राप्त हुआ। पढ़ा वह मुझे न पाए।
पढ़ा भी कहीं हर जन्म में जाता है? किसी जन्म में पढ़ लिया — बस; जन्म–जन्मान्तरों के लिए बस हो गया। ‘गुरु-गृह गये पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब पाई’ गाया गोस्वामीजी। तुलसी के राम सारी विद्याओं से पूर्व (जन्म के) परिचित थे, सो उन्हें अल्पकाल ही में सारा ज्ञान उपस्थित हो गया था। दूसरी बात यह कि यदि प्रेम के महज़ ढाई अक्षर पढ़ लेने से पण्डिताई का बिल्ला मिल सकता हो तो ढाई हज़ार पुस्तकें पढ़ने के बाद हज़ारीप्रसाद बने वह — मेरा मतलब वही — जो अक़्ल का जहाज़ हो।
एक बात बताऊँ? मधुर महाकवि श्री जयशंकर प्रसाद की तम्बाकू-जर्दा की दुकान वेश्याओं के मोहल्ले के सिंह-द्वार पर थी। ‘प्रसाद’ जी की दुकान पर आध घंटा बैठने ही से वेश्या बाज़ार की बानगी बहुत-कुछ मिल जाया करती थी। लाला भगवान ‘दीन’ का भाड़े का मकान तो बिलकुल ही पिछवाड़े था, उस आकर्षक दाल मण्डी के। जयशंकरजी वैसे गोवर्धन सराय में रहते थे, लेकिन दुकान से आते-जाते शत-शत मंगला-मुखियों का दर्शन वेश्यागामी का बिल्ला लगाए बगैर ही मिलता था। लाला भगवान ‘दीन’ हमेशा तम्बाकू जयशंकर ही की दुकान की पीते थे। ‘प्रसाद’ जी जब-जब दुकान पर होते तब-तब सुखद हास्य-व्यंग्य की दो-दो चोंचें ज़रूर होती थीं।
मुझ पर तत्कालीन महारथियों की कृपा भूरि-भूरि थी। ‘ध्रुव-धारणा’ के बाद दूसरी कृति जब मैंने ‘महात्मा ईसा’ के रूप में प्रस्तुत की तब उसका सम्यक् संशोधन लालाजी ने किया था। पुनर्वाचन प्रेमचन्दजी ने। प्रेमचन्दजी ने वह राय लिखी ईसा नाटक के बारे में कि कोई आज भी पुस्तक के आरम्भ में पढ़ ले। श्रद्धेय सम्पूर्णानन्दजी की स्पष्ट सम्मति भी छपने के पूर्व ही मुझे प्राप्त हो चुकी थी। पहले सौ-में-सौ साहित्यिक ऐसे होते थे जो कहीं ज़रा भी प्रतिभा, ज़रा भी प्रसाद देखते ही उसका यथोचित आदर करते थे। आज जैसे वह चीज़ चली ही गई है। आज भी पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ को लिखना ख़ाक-पत्थर आता है, आप जानते हैं — लेकिन आज से प्राय: चालीस वर्ष पूर्व विख्यात पत्रकार और कलामर्मज्ञ ‘अभ्युदय’ के सम्पादक पं. कृष्णकान्त मालवीय महोदय जब मुझ पर मुग्ध हुए तब काशी आने पर ‘मर्यादा’ कार्यालय, ज्ञान-मण्डल, बुलवाकर उन्होंने श्रद्धेय सम्पूर्णानन्दजी से आग्रह किया था कि वह मुझ पर कृपालु रहें, ‘क्योंकि इनमें जो लेखक है वह असाधारण है।’
उन्हीं दिनों एक घटना और विचित्र ही घटित हुई थी। कानपुर से, ‘प्रताप’ पत्र से, श्री बेनीमाधव खन्ना नामक किन्हीं सज्जन ने हिन्दी-कवियों से एक राष्ट्रीय-गान-रचना प्रतिद्वन्द्विता में शामिल होने का आग्रह किया था। विजयी को हज़ार रुपए पुरस्कार की घोषणा थी। प्रतियोगिता के जजों में पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, (सी. पी. के) जगन्नाथप्रसाद ‘भानु’, रामदासजी गौड़-जैसे परमाचार्य लोग थे। इस प्रतिस्पर्धा के लिए लालाजी ने भी जब एक गान प्रस्तुत किया, तब मेरे मन में भी आया कि अँधेरे में एक तीर मारने में घाटा ही क्या है। मैंने भी एक गीत गढ़कर भेज दिया। जब परिणाम प्रकट हुआ, तब जजों ने एक भी रचना राष्ट्रीय-गान होने योग्य नहीं मानी। वैसे हज़ार रचनाओं में चार रचनाएँ एक श्रेणी की मानी गई थीं। उन चारों रचनाकारों के अब नाम सुनिए— मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय, कुल पहाड़ के एक कोई शिवकुमार शर्मा, और पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’। लालाजी की रचना रसज्ञों को स्पर्श न कर पाई। मेरा नाम बड़़े-बड़ों के साथ विज्ञापन में आया। इस वाकया से गुरु गुड़ ही रहते हैं, पर चेले के चीनी बन चलने की चाशनी में तार-पर-तार पड़ने लगते हैं।
नीचे मैं उस काल की लिखी एक-दो घनाक्षरियाँ उद्धृत करता हूँ, जिन्हें ज़रा इधर-या-उधर छूकर लालाजी ने चमका दिया होगा, साथ ही, जिनमें न जाने क्या पाकर वह मुझ पर वरद हो उठे होंगे।
सुख का पता
बागन में, वारिज में, वल्लरी में, वापिका में,
बौर में, बसन्त–द्रुमहू के खोजि डार्यों मैं।
वृन्दावन कुंज, वन व्रजबनितान-पुंज,
गुंजरत मंजुल मलिन्द पंखि हार्यों मैं।
वाराणसी धाम, वामदेवजू को नाम, दिव्य
देवसरि धार में न देखि निरधार्यों मैं—
विश्व बीच है न सुख। ‘उग्र’, पर इते माहिं
कारागार श्रृंखलानिहार में निहार्यों मैं!
ज्ञानमण्डल
‘उग्र’ तप करि कै उदारता रिझायौ विधि
माँगो वरदान— ‘मोहि अमर बनाइए!’
बोले कमलासन— ‘न मेरो अधिकार इतो’
जाइ, पति कमला सन विनय सुनाइए।
कहे हरि तूठि— ‘हर पास चलि जाँचै किन?’
शम्भु भाखे ‘शिव परसाद* पास जाइए।’
शिव परसाद— ‘एवमस्तु!’ कहि बोले,
‘अब, बैठि ज्ञानमण्डल अखण्ड गीत गाइए।’
बर्फ़ और परस्त्री : पूर्ण रूपक
काम गरमी में दिखरात वह ज्योंही ‘उग्र’,
त्यों ही चलि जात मन पाइबे को ललचात।
दरस-परस में सुरूपवान, सीतल है,
हीतल में जाइ—अनुभावी कहें—होत तात!
अधर लगाइ रस लेत ठरि जात रद,
बुध बतरावैं छुइवेते गात गरि जात!
प्यास न बुझात, अधिकात दिन-रात बरु,
बरफ़ हमें तो पर-नारी सम है जनात।
(ये कवित्त सन् 1921-22-23 की रचनाएँ हैं। ज्ञानमण्डल वाला छन्द गणेशजी द्वारा सम्पादित ‘प्रताप’ में छपा था।)
- विख्यात दिवंगत दानी, समाज-सुधारक, ज्ञानमण्डल के संचालक-संस्थापक।

