अपनी खबर – पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ | हिन्‍दी आत्‍मकथा

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नागा भागवतदास

यह सन् 1910 ई. है। और यह नगर? इसका नाम है मिण्‍टगुमरी! मिण्‍टगुमरी? यह नगर कहाँ है रे बाबा! यह नगर इस समय पश्चिमी पाकिस्‍तान में है, लेकिन जब की बात लिखी जा रही है तब ब्रिटिश भारत में पंजाब में था। और यह सब क्‍या है? यह सब रामलीला की तैयारी है। कई दिन से अयोध्‍याजी से कोई रामलीला-मण्‍डली आई हुई है। इस मण्‍डली ने पहले सरगोधा मण्‍डी में लीलाएँ दिखलाईं थीं, जिससे वहाँ की हिन्‍दी-पंजाबी-सिख जनता बहुत ही धन्‍य हुई थी। सरगोधा मण्‍डी से इस रामलीला-मण्‍डली की प्रशंसाएँ भक्‍त दर्शकों से सुनने के बाद मिण्‍टगुमरी के भक्‍त दर्शनार्थियों ने वहाँ जाकर सारी मण्‍डली के किराया-भोजन-भर रकम पेशगी देकर दस दिन में रामलीला दिखलाने के लिए उत्‍साह, श्रद्धा और आग्रह से अपने यहाँ आमन्त्रित किया था।

ये लीलाधारी जब स्‍टेशन पर उतरे तभी मिण्‍टगुमरी के दर्शनार्थियों की भीड़-सी लग गई थी। कितना सामान! दस बड़े-बड़े काठ के बक्‍से, बीसियों लोहे के ट्रंक। सबमें रामलीला की आवश्‍यक वस्‍तुएँ। लीला-भूमि बनाने का बाँस-बल्‍ली-पटरे वग़ैरह सामान, समूह-भोजन जिनमें सिद्ध हो सके ऐसे पीतल और ताँबे के बड़े-बड़े बरतन-भाँडे, टेण्‍ट-छोलदारियाँ। अयोध्‍यावासी ये लीलाधारी संख्‍या में छत्तीस और दस और एक— कुल मिलाकर सैंतालिस थे। छत्तीस थे प्रौढ़ पुरुष, अधिकतर साधु-महात्‍माओं की ड्रेस में; दो-चार छैल-चिकनियाँ भी जो दूर ही से नाटकीय दीखते थे। दस थे दस से अट्ठारह की वय के बालक और युवक। सारी जमात में मुश्‍की रंग का आठों गाँव कुम्‍मैत एक घोड़ा भी था। असल में नागा महन्‍त भागवतदास महाराज की यह जमात थी पंजाब-भ्रमण पर कटिबद्ध। जमात में विविध पदों के निशानधारी और बेनिशान नागा साधु थे। पंजाबी माताएँ श्रद्धालु होती हैं, प्रदेश धन-धान्‍य से परिपूर्ण है, यह सब मज़े में जानकर ये साधु लीलाधारी उधर जाते थे और जाकर कभी पछताते नहीं थे। घोड़ा था महन्‍त भागवतदासजी का। दाढ़ीधारी, छापा-तिलकधारी, उजले वस्‍त्रधारी महन्‍तजी आँखों पर चश्‍मा चढ़ाए, हाथ में बेंत की छोटी चँवरी लिये जब उस घोड़े पर सवारी करते थे, बड़ा चमत्‍कारी दृश्‍य उपस्थित हो जाता था। भागवतदास महन्‍त एक आँख के काने थे। उन्‍हें बंगड़ वैरागी ‘भागवतदास कानियाँ’ कहकर मन्‍द माना करते थे, क्‍योंकि त्‍यागी-वैरागी होकर भी भागवतदास पैसा-जोड़ थे, कौड़ी-पकड़। साधु-जमात और रामलीला-मण्‍डली की मूर्तियों की सम्‍यक् आर्थिक व्‍यवस्‍था महन्‍त भागवतदासजी के हाथों में थी। स्‍थान पर महन्‍तजी स्टील का एक मजबूत बक्‍स निकट रखते थे, जिसमें छोटे-मोट बैंक जितनी माया—रत्‍न, सुवर्ण, रजत-मुद्राएँ—रेज़गारी सेरों, चमाचम प्राय: हमेशा रहा करती थी। जमात पर महन्‍तजी का शासन कठोर था। ज़रा भी अनुशासनहीनता पर वह वैरागी या मण्‍डली के एक्‍टर पर चँवरी चला बैठते थे।

मिण्‍टगुमरी के भक्‍तों ने रामलीला-भूमि के निकट ही मण्‍डलीवालों के ठहरने की व्‍यवस्‍था की थी। माताएँ बड़ी श्रद्धा से स्‍वरूपों तथा अन्‍य साधुओं के लिए दूध, दही, मक्‍खन, मट्ठा, लस्‍सी, गुड़, बताशे, लड्डू, अन्‍न, वस्‍त्र, पुष्‍कल दे जाती थीं। सीता, राम, लक्ष्‍मण, भरत, शत्रुघ्‍न, वग़ैरह बनने वाले बालकों को मण्‍डलीवाले अपनी भाषा में ‘स्‍वरूप’ या ‘सरूप’ कहा करते थे। श्रृंगार के साथ हम स्‍वरूपों को भक्‍तों के हाथ से दूध पिलवाने या प्रेमियों के घर भोजन कराने के लिए महन्‍त

भागवतदास पंजाबी भक्‍तों से मोटी रकमें उतारते थे। भक्‍त लोग अक्‍सर साधुओं की जमात का भण्‍डारा अपने घर करते, तब महन्‍त के दल के नागा लोग सूरत के बने जरी के काम के खूबसूरत निशान, पताका, भाला, तलवार, तुरही से लैस बारात बनाकर भक्‍त के दरवाज़े पर जाते थे। बड़ी अभ्‍यर्थना, बड़ी पूजा, भक्‍त लोग इन साधुओं की करते थे। फिर पंगत बैठती थी, यानी जमात भोजन पाने बैठती। माल, मलाई, मिठाइयाँ, मालपुए, तरह-तरह की सब्जि़याँ, जिन्‍हें साधु लोग ‘साग’ नाम से भजते थे, परसी जातीं। फिर एक मुख्‍य साधु पंगत में टहल-टहलकर ‘जय’ बोलने-बुलाने लगता। यानि वह बोलता नाम दूसरे बोलते ‘जय!’ चारों धाम की—जय! सातों समुद्र की—जय! सातों पुरियों की—जय! श्री हनुमानजी की—जय! श्री सुग्रीवजी की—जय! श्री अंगदजी की—जय! यह जय-जय घोष कभी-कभी तो पूरे एक घण्‍टे तक होता, जिसमें महन्‍त के गुरु की तथा स्‍वयं महन्‍त भागवतदास की जय भी पुकारी जाती थी। महन्‍त की आज्ञा से जमात को सादर भोजन देने वाले भक्‍त के नाम की जय भी बुलवाई जाती। मालपुए ठंडे हो जाते, मलाई पर माखी भिनकने लगती, बढ़िया-से-बढ़िया बना हुआ सालन भी इस घंटे-भर की जयबाजी में ठंडा पड़कर सचमुच साग बन जाता था। जय बोलते-बोलते मारे थकावट और भूख के मुझे तो नींद आने लगती थी।

किसी एक दिन की बात। उस दिन धनुष-यज्ञ और लक्ष्‍मण-परशुराम संवाद की लीला होने वाली थी। मण्‍डली वाले मेक-अप रूम या ग्रीन रूम को श्रृंगार-घर कहते थे। ‘श्रृंगार’ होता था वहाँ का व्‍यवस्‍थापक, जिसके चार्ज में वस्‍त्र, आभूषण, मुखौटे, दाढ़ी, मूँछें और मेक-अप का आवश्‍यक सामान होता था। हम सरूपों के चेहरों पर मुर्दासंख और लाल सिमरिख के रंग बाक़ायदे चढ़ाने के बाद गालों और माथे पर चमकती डाक और सितारों से, गोंद के सहारे वह श्रृंगार करता—फूल या मछली बनाता। इस श्रृंगार में कम समय नहीं लगता था। फिर हमारे मस्‍तक पर ऊन के काकपक्ष या जुल्‍फ़ें अलकदार लटकाई जातीं, कानों में कुण्‍डल और मस्‍तक पर मुकुट-किरीट-चन्द्रिका कसकर बाँधी जाती। फिर नीचे और ऊपर के वस्‍त्र पहनाए जाते। साधारण लड़के को देवता की तरह सजाकर खड़ा कर देना श्रृंगारी का काम था।

धनुष-यज्ञ में मेरे बड़े भाई साहब दो-दो काम किया करते थे। वह पहले तो राजा जनक के बन्‍दीजन बनकर आते थे और हिन्‍दी, अंग्रेजी, बंगला, फ़ारसी वगैरह कई भाषाओं में जनकजी की प्रतिज्ञा बड़े रोब से सुनाते थे। फिर, धनुष टूट जाने के बाद वह परशुरामजी बनकर आते थे; तुलसीदास के कथनानुसार रूपधर : अरुन नयन, भृकुटी कुटिल… गौर सरीर भूति भलि भ्राजा, भाल बिसाल त्रिपुण्‍ड विराजा, सीस जटा… सहजहु चितवत मनहु रिसाने। खुले विशाल कन्‍धे, एक कन्‍धे पर दिव्‍य जनेऊ और माला और मृगछाला। कमर में मुनियों के वल्‍कल-वस्‍त्र, कन्‍धों के पीछे दो-दो तूणीर-तर्कश, हाथ में धनुष और बाण तथा वाम कन्‍धे पर विख्‍यात परशु। पहले तो सहज ही वेश में अपने भाई को देखते ही मेरी रूह फ़ना होती थी, तिस पर परशुराम का मेक-अप। प्राय: उनके रंग-मंच पर आते ही मेरी सिट्टी गुम हो जाती थी और अच्‍छी तरह याद किया हुआ संवाद भी सफाचट भूल जाया करता था। या लक्ष्‍मण का संवाद वीरतापूर्वक न कर केवल घिघियाया करता था। पार्ट भूलते ही परशुराम वेशधारी मेरा भाई स्‍टेज ही पर मुझे धमकाता कि चल अन्‍दर, तेरा भुरकुस न कर दूँ तो मेरा नाम नहीं। और परदा गिरते ही श्रृंगार में ही परशुरामजी लक्ष्‍मणजी को पीटने लगते। परदे के पीछेवाले उस परशुराम से लक्ष्‍मण की रक्षा राम ही नहीं राम के बाप दशरथ भी नहीं कर सकते थे। ख़ैर, इस धनुष-यज्ञ में बड़े पेटवाले राजा का मज़ाकिया काम करने वाला एक्‍टर भी मेरा ही भाई था — मझला श्रीचरण पाँडे जो साधु-कण्‍ठीधारी बनकर अब सियारामदास हो गया था। जहाँ तक एक्टिंग का सम्‍बन्‍ध है, मेरा बड़ा भाई मझले से श्रेष्‍ठतर अदाकार था। लेकिन स्‍टेज पर प्रसिद्धि मझला ही विशेष पाता था, क्‍योंकि उसे नाचना, गाना, बजाना तथा जनता की चुटकियाँ लेना ख़ासा आता था। ‘नाचे-गावे तोड़े तान तिसका दुनिया राखे मान’ कहावत उन दिनों काफ़ी प्रचलित थी। घर में न सही परेदस — रामलीला-मण्‍डलियों — में हम तीनों भाई साथ-ही-साथ रहे, और काफ़ी प्रेम से। घर में प्रेम इसलिए नहीं था कि खाना नहीं था। जब ‘भूखे भजन न होहि’ कहावत है तब भला भूखे प्रेम क्‍या होता! रामलीला-मण्‍डली में, दोनों ही, अपनी-अपनी स्‍वतन्‍त्र कमाई कर लेते थे। ऊपर से बुनियादी राशन मण्‍डली के पंचायती भण्‍डारे से मिल जाता था। बुनियादी राशन यानी साग-दाल, चावल, बड़ी-बड़ी रोटियाँ दोपहर को तथा घुइयाँ का साग और छोटी-छोटी पूरियाँ रात के ब्‍यालू में। मेरे बड़े भाई की तरह शौकीन एक्‍टर अपना खाना बिस्‍तर या आसन पर लेते, जो महन्‍त भागवतदास को बहुत बुरा लगता। वह चाहते कि जिसे भी भण्‍डारे में खाना हो पंगत में बैठकर जय बोलने के बाद प्रसाद पाए। जो पंगत से चूके उसका भाग भण्‍डारे के प्रसाद में नहीं। कहावत मशहूर — डार का चूका बन्‍दर, पाँत का चूका बैरागी। सो, जो एक्‍टर पंगत में न शामिल होना चाहता वह अपना प्रबन्‍ध अलग करता। महन्‍त भागवतदास मेरे बड़े भाई की क़द्र करते थे, क्‍योंकि वह उनका पत्र-व्‍यवहार सुन्‍दर अक्षरों, उत्तम हिन्‍दी में कर देते थे। फिर भी, नागा कानियाँ महन्‍त से दहशत सभी खाते थे। वह झक में आने पर अच्‍छे-अच्‍छों पर हाथ झाड़ देते थे। कोई भी एक्‍टर भागवतदास के सामने जाने में एक बार झिझकता था।

जमात के अधिकारियों में महन्‍तजी के अलावा एक ‘कुठारी’ जी थे, जिनके चार्ज में अन्‍न, घृत, बासन, वसनादि वस्‍तुएँ होती थीं। उन्‍हें ‘अधिकारीजी’ भी कहा जाता था। मण्‍डली में भागवतदास के बाद अधिकारीजी का ही मान था। वह साधुई किते से पहनी हुई लुंगी और बगलबन्‍दी धारण करते थे, टाट के जूते पहनते थे, ऊर्ध्‍वपुण्‍ड सह-श्री माथे पर लगाते थे, जिसका फैलाव उनक़ी नासिका तक होता था। वह बहुत अच्‍छे रामायण-भक्‍त भी थे। श्रृंगारी की तारीफ़ आप सुन ही चुके हैं। कुठारी, श्रृंगारी के बाद भण्‍डारीजी थे, जिनके हाथ में सारा भोजन-भण्‍डारा होता था। भण्‍डारी अक्‍सर उसी नागा साधु को बनाया जाता था जिसमें, आवश्‍यकता पड़ने पर, सौ-सवा सौ मूर्तियों के पाने (खाने) योग्‍य प्रसाद अकेले तैयार करने की क्षमता होती थी। वैसे साधारणत: उसको सहायक साधु स्‍वयं-सेवक सुलभ रहा करते थे। मण्‍डली की हर मूर्ति का आवश्‍यक कर्तव्‍य माना जाता था भण्‍डारी की हर तरह से सहायता करना। साग ‘अमनियाँ’ करना, पुष्‍कल आटा गूँधना, ईंधन की लक्‍कड़ चीरना, जल जुटाना, और सबके ऊपर भोजन के बाद बड़े-बड़े कड़े-जले बरतन माँजना-चमाचम! मँजे बासनों को कानियाँ भागवतदास आँख पर सोने के फ्रेम के चश्‍मे चढ़ाकर देखते और ज़रा भी मलिनता या मल मिलते ही माँजनेवाली वैरागी को चँवरी-मढ़े बेंत से मारते-मारते आदमी से टट्टू बना देते थे—टुटरूँ टूँ। इन्‍हीं सब फ़जीहतों, दिक्‍कतों से बचने के लिए मेरे भाई-जैसे शौकीन अपना खाना अलग बनाते थे। इससे इनको प्‍याज़, लहसुन वग़ैरह की सुविधा भी मिल जाती थी, जो नागाओं के भण्‍डारे में असम्‍भव थी। ऐसे लोगों का जमात के विधान से स्‍वतन्‍त्र आचरण महन्‍त भागवतदास को भला नहीं लगता था, फिर भी ‘नान’ वैरागियों को इतनी आज़ादी वह दे ही देते थे। महन्‍त भागवतदास हिम्‍मतवाले जीवटवाले साधु-महात्‍मा थे। तभी तो सन् 1910 ई. में सीमान्‍त प्रदेश के विख्‍यात शहर बन्‍नू में जाकर रामलीला दिखाने की जुरअत की उन्‍होंने। उन दिनों बन्‍नू तक रेल लाइन तैयार नहीं हो पाई थी। मिण्‍टगुमरी से कोहाट पहुँच वहाँ से ताँगों से शायद दो दिन की यात्रा के बाद मण्‍डली बन्‍नू पहुँची थी। ताँगे दिन में चलते ओर सायंकाल किसी डेरा या ‘खेल’ पर विश्राम करते। निशानेबाज, ख़ूँख्‍वार सरहदी डाकुओं का बड़ा भय था। मुझे याद है बन्‍नू की राह की किसी सराय में घोड़े की लीद-भरी कोठरी में सोना। मुझे मज़े में याद है शौच के लिए पहाड़ियों में जाने पर किसी महाभयानक पठान को देखते ही बिना निपटे ही भाग आना। मुझे बतलाया गया था कि सरहदी बदमाश लड़कों को ख़ासतौर पर पकड़ ले जाते हैं। बन्‍नू पहुँचने पर भी शहर देखने, घूमने-फिरने, बड़े लोग ही जा पाते थे। हम लड़के तो उसी अहाते में बन्‍द रखे जाते जिसमें रात को फाटक बन्‍द कर, केवल सौ-दो सौ हिन्‍दुओं की उपस्थिति में रामलीला दिखाई जाती थी।

बन्‍नू के भक्‍तों से विदाई में दक्षिणा भारी मिलने वाली थी, इसलिए विशेषत: महन्‍त भागवतदास पैसा-पकड़ मण्‍डली लेकर वहाँ गए थे। लौटे भी अच्‍छी रकम बनाकर। रुपये, पशम, ऊन, काठ का सामान, चाँदी के पात्र, सोने के आभूषण।

बन्‍नू हम गए थे कोटाह की तरफ से, लौटे डेरा-ग़ाज़ीखाँ की तरफ़ से।

मेरे बड़े भाई-जैसे हज़रत छिपे-छिपे फुसफुसाते कि महन्‍त बटुक-विलासी है। इसका कारण यह था कि स्‍वयं साढ़े चार बजे सवेरे स्‍नान के बाद महन्‍तजी उनके लड़कों को भी उसी वक्‍त नहलवाते थे जो स्‍वरूप (राम-लक्ष्‍मण-सीता) बना करते थे। सरदी के दिनों स्‍नान के बाद शीत से काँपते उन किशोरों को प्राय: नियम से महन्‍तजी अपने कोम इटालियन कम्‍बल में बुला लिया करते थे — एक, दो, तीन को — और उनके गाल हथेलियों से रगड़-रगड़कर गरमाया करते थे। मेरे मते यह क्रोधी, कठोर-स्‍वभावी महन्‍त का महज निर्विकार कोमल पक्ष था। महन्‍त भागवतदास सिद्धान्‍त और लँगोट के सच्‍चे थे।

बन्‍नू में अनेक सरहदी सौगात संग्रह करने के कारण बड़े भाई और मैं इसके बाद घर यानी चुनार लौट आए। हमारे आग्रह करने पर भी, माता के लिए भी, मझले साहब ने मण्‍डली छोड़कर चुनार आना स्‍वीकार नहीं किया।

 

राममनोहरदास

महन्तस भागवतदास ‘कानियाँ’ की नागा-जमात के साथ मैंने पंजाब और नार्थवेस्टइ फ्रण्टियर प्राविंस का लीला-भ्रमण किया। अमृतसर, लाहौर, सरगोधा मण्डीा, चूहड़ काणा, पिंड दादन खाँ, मिण्टीगुमरी, कोहाट और बन्नूो तक रामलीलाओं में अपने राम स्व रूप की हैसियत से शिरकत करते रहे। यह सब सन् 1911-12 ई. की बात होगी। मेरा ख़याल है उन्हींस दोनों बरसों में कभी दिल्लीत में वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम भी फेंका गया था। उसकी चर्चा रामलीला-मण्डहली वालों में भी कम गरम नहीं रही। फ्रण्टियर से चुनार लौटने के बाद शीघ्र ही हम दोनों भाई पुन: अयोध्यानजी चले गए थे। इसका ख़ास सबब था चुनार आते ही बड़े भाई साहब का पुन: जुआ-जंगाड़ी जमात में जुड़ जाना, जिससे खीसा काटते ज़रा भी देर न लगी। ऋणदाताओं के मारे जब घुटन महसूस करने लगते, तभी भाई साहब चुनार छोड़ दिया करते थे। अयोध्या से मझले भाई श्रीचरण पाँडे उर्फ़ सियारामदास ने पत्र दिया था कि वह इन दिनों महन्तछ राममनोहरदास की मण्डदली में है। महन्तणजी मालदार हैं, साथ ही भागवतदास कानियाँ से कहीं उदार। एक्टररों की तनख़ाहें पुष्टी, तुष्टिकारक हैं। मझले ने बड़े भाई से आग्रह किया था कि वह भी राममनोहरदास की मण्डीली में आ जाएँ। सो, हम जा ही पहुँचे।

राममनोहरदास की मण्डहली के साथ मैंने सी.पी. के कुछ नगरों तथा यू.पी. के अनेक नगरों का भ्रमण किया। मेरा काम था रामलीला में सीता और लक्ष्म ण बनना। इस तरह अयोध्या , फैज़ाबाद, बाराबंकी, परतापगढ़, दलीपपुर, अलीगढ़, बुलन्दाशहर, मेरठ, दिल्लीो, दमोह, सागर, गढ़ाकोटा, कटनी आदि स्थालनों में रामलीला का स्व,रूप बनकर ग्या्रह-बारह साल की उम्र में बन्देोखाँ ने सहस्र-सहस्र नर-नारियों के चरण पुजवाए हैं। इससे पूर्व ये ही चरण पंजाब और सीमाप्रान्त- के मण्डी्-नगरों में भी पब्लिक द्वारा परम प्रसन्नहतापूर्वक पूजे जा चुके थे। चरण ब्राह्मण के! छह साल की उम्र ही में चुनार में कुमार-पूजन के अवसर पर बहैसियत ब्रह्मकुमार मेरे चरण अक्सहर पूजे जा चुके थे। ब्राह्मण ने कैसा रंग समाज पर बाँध रखा था! भीख लेता था तनकर।

दान देते समय दानी भिखारी के चेहरे नहीं, चरणों की तरफ़ देखता था। राममनोहरदास की मण्डतली का सारा रंग-ढंग कमोबेश वही था जो भागवतदास की मण्ड ली का, इस फ़र्क के साथ कि पहली मण्ड्ली में साधुओं की संख्याढ नब्बेश प्रतिशत थी; पर दूसरी में सौ में नब्बेस एक्ट र व्याावसायिक, आवारा-मिज़ाज लोग थे। स्वजयं भागवतदास राममनोहरदास के मुकाबले में कहीं अधिक चरित्रवान् थे। राममनोहरदास वैरागी होने पर भी, रहते थे गृहस्थों के बाने में। पहनते थे कुरता, कमीज, धोती, कोट, मोटे चश्मेव, काली दाढ़ी, अलबर्ट कट, देह गुट्ठल, चेहरे पर बाईं तरफ़ नाक के निकट बड़ा-सा मस्सार। राममनोहरदास मैनेजर अच्छे थे। उनकी मण्डगली अधिक उत्तम ढंग से रामलीलाएँ दिखाती थी। लेकिन लंगोट के वह कच्चे् थे — भद्दे ढंग से।

वह किसी-न-किसी सुन्दीर ‘स्वसरूप’ पर रीझकर पहले सोने के गहनों से उसे लाद देते (दे नहीं डालते, केवल पहनने की सहूलियत देते)। फिर उसी को लोटे के कैश बाक्सह की कुंजी भी दे देते। सेक्रेटरी और शिष्यद के बीच के काम उससे इतना लेते कि अक्सउर थककर वह उन्हीं के गुदगुदे गदेले पर रात काट देता था। और सवेरे मण्ड्ली वालों में अनैतिक कानाफूसी चलती। फिर भी वातावरण ऐसा था कि स्व रूप-मण्ड ली के सभी बालक मन-ही-मन महन्तत राममनोहरदास की कृपा के आकांक्षी रहते थे। एक बार यह प्रकट हो जाने पर कि अमुक स्वडरूप महन्ती से ‘विलट’ गया, मण्डदली के दूसरे मनचले अधिकारी, भण्डा री, श्रृंगारी, लीलाधारी भी मौक़े-बे-मौक़े उस पर ज़रूर लपकते। फलत: स्वसरूप को कुरूप बनने में कुछ भी देर न लगती। मैं बच जाता था इन दुष्टव लीलाधारियों से अपने दो-दो भाइयों के सबब, जो तेजस्वी अदाकार और तगड़े जवान थे। फिर भी, मैं बिगड़ा नहीं, ऐसा कहना ‘बनना’ होगा, जो मेरी बान नहीं, बाना भी नहीं। असल में स्वतरूपों यानी लड़कों के रहने-सोने का प्रबन्धट अलग ही हुआ करता था। और मैं सोता था स्व रूपों में ही। नतीजा यह होता था कि बड़ों द्वारा कुरूप बना हुआ स्वोरूप बेहिचक, रूप की निहायत नंगी परिभाषा भोले संगियों को पढ़ाता था। यानी ख़रबूजे से ख़रबूजा रंग पकड़ता ही था। इस तरह राममनोहरदास की राम-मण्ड ली ज़बरदस्तख पाप-पार्टी भी थी।

मेरा ख़याल है इश्क़स क्या है, इसका पता मुझे इसी मण्डदली में बारह साल की वय में लग गया था। बारह साल की उम्र में मैं सत्रह साल की एक अभिरामा श्याममा पर ऐसा आशिक़ हो गया था कि ‘सीने में जैसे कोई दिल को मला करे है’ का अनुभव मुझे तभी हो गया था। उस सुन्द री के लिए मैं सारा दिन बेचैन रहा करता था कि कब रात हो, कब उसके मादक स्वामदक मयंक-मुख के दर्शन हों। मेरा प्रथम और अन्तिम प्रेम भी वही था। उसके बाद जो मामले हुए उसी शाश्व त साहित्य के संक्षिप्तम, सस्तेर संस्कउरण मात्र थे। हाँ, तो लीला बाराबंकी में दिखाई जा रही थी। प्रोग्राम एक मास तक का था। लीला-भूमि में महिलाओं के बैठने का प्रबन्धत लीला-मंच के बहुत ही निकट था। उन्हींए में वह सत्रह-साली, निराली ब्यूनटीवाली, कमल-लोचना भी, गैस लाइट में प्रफुल्लित नज़र आती थी। उसी कामिनी में कुछ देखने काबिल भी था, यह मैंने जाना मण्डेली के दिल-फेंक एक्टथरों और अपने बड़े भाई को भी उसकी तरफ़ बार-बार देखते देखने के बाद। बाल-उत्सु कतावश, सीताजी के मेक-अप में ही, रंग-मंच से ही, मैं भी उसे देखता और देखता और देखता। देखती थी वह भी मेरी तरफ़। शायद वह भी ताकझाँकवाली आली थी। सो, मैं देखता ही रहा, मन्त्रव–मुग्धऔ, लेकिन ऐय्यारों ने डोरे डाल, भक्ति-भावना में बहका, परदे के पीछे नज़दीक से रामजी के दर्शन कराने के बहाने अन्दर ले जा, पहले महन्त जी से उसका संयोग करा दिया। राममनोहरदास ने उसको एक महँगी बनारसी साड़ी दी, जिसे उसने ले भी लिया। बस यौवन के जादू का भाव खुल-जैसा गया। लेकिन वह वेश्या नहीं थी। उसका पति साल में दस-ग्यारह महीने बम्बई रहा करता था।

सो, यौवन की महावृष्टि में उसके चलन की क्या री फूटकर बह चली थी। लेकिन बदमाश लीलाधारियों के चक्र में पड़ते ही आठ ही दस दिनों में वह भयानक यौन-रोग-ग्रस्तल हो गई थी। और संयोगवश इसी बीच उसका पति बम्बनई से आ गया। शक्कीम मर्द उसी रात अपनी देवी की देह-दशा ताड़ गया। संदिग्ध भाव से घर में और भी कोई प्रमाण तलाशने पर बनारसी साड़ी भी उसके हाथ लगी। सुना, इसके बाद वह मर्द कुछ ऐसा उत्तेजित हुआ कि रसोई बनाती रामा रमणी को बाहर घसीट, मुँह में कपड़ा ठूँस, नंगी कर, हाथ-पाँव बाँध, उसे एक खम्भेय से बाँध दिया। इसके बाद चूल्हेो में लोहे की छड़ लाल करके पिशाच के उल्लासस से वह तरुणी का अंग-अंग दागने लगा। सारे शहर में कोहराम मच गया। बड़ा होहल्लाछ मचा। मरने के पहले उस औरत ने बयान दिया था कि उसे रामलीलावालों ने बरबाद किया है। लेकिन महन्त़ राममनोहरदास बड़े काइयाँ थे। जहाँ भी मण्ड ली जाती पहले वहाँ की पुलिस से ही प्रेम बढ़ाते थे। फिर राम का बलवान नाम लीलाधारियों के साथ था। साथ ही वह आदमी कोई बड़ा आदमी नहीं था। सारा दोष उसी के माथे मढ़ा गया। पाखण्डी लीलावाले फिर भी पुजते रहे। औरत अस्पवताल में मर गई थी। यह सब सुनकर पुलिस से प्रेम होने पर भी महन्त। राममनोहरदास मन-ही-मन डरे, साथ ही, कम्पयनी के अन्यब छिपे रुस्तेम भी प्रकम्पित हो उठे। फलत: येनकेनप्रकारेण प्रोग्राम पूरा कर मनोहरदास मण्डंली के साथ बाराबंकी से सागर प्रस्थाेन कर गए। फिर भी, मारी जाने, मर जाने, भस्मीमभूत हो जाने के बावजूद बाराबंकीवाली की वह बाँकी छवि, वह मादक, छलकती, छाती को छूती, अछूती जवानी की हवा मेरे हृदय से न गई, न गई। और मैं उदास-उदास रहने लगा, प्रेत-बाधित जैसा। मेरी चंचलता कम होने लगी, भीड़ छटने लगी। अब ध्या न होता सत्रह साल वाली का — और बारह साल के बेचन पाण्डे होते। और बेचैनी होती। ऐसा मचलता मन होता जिसका पता न चलता कि वह आख़िर मचल रह है क्योंत? वही उस्ता्द का शेर : ‘दिलेनादाँ, तुझे हुआ क्याआ है? आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?’ लेकिन मैंने पहले दर्द जाना, दवा के लिए तरसने का रस चखा, ‘ग़ालिब’ का शेर तो इस वाक़या के मुद्दतों बाद मैंने सुना। फिर भी कमाल! सारी ग़ज़ल दिल को छूने वाली—

हम हैं मुश्ताक़ और वह बेज़ार,

या इलाही! ये माजरा क्याज है?

ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं?

ग़म्ज़ी-ओ-इश्व‍–ओ अदा क्या है?

सब्ज़ा-ओ-गुल कहाँ से आते हैं?

अब्र क्या चीज़ है? हवा क्या है?

या इलाही! या इलाही! या इलाही! ये माजरा क्याद है? उसके सर्वनाश पर मेरे सीने में दर्द क्यों हुआ? जो हो, वही मेरे सीने में मुहब्बयत की आग कुछ ऐसी जगमगा गई, जो किसी क़दर आज तक मुझे गरमाती, तपाती, जलाती, यानी जिलाती रहती है। और मेरे सलोने सौभाग्य में बारह बरस की ही वय में मुहब्बतत बदी थी। उस शायर ने झूठ कहा होगा जिसने कहा, ‘मेरा मिज़ाज़ लड़कपन से आशिक़ाना था,’ लेकिन मैं सच कहता हूँ। कोई पूछ सकता है— इससे मेरा फ़ायदा हुआ या नुकसान? यह सवाल वही करेगा जिसे मुहब्बकत के राहोरस्म। का इल्मग मुतलक न होगा। मुहब्बात सांसारिक हानि-लाभ के तराजू पर तौली जाने योग्यक जिंस कदापि नहीं। इसका तो जीवन के सुदुर्लभ सुधा-मधुर स्वाबद से सम्ब न्धल है। कहा उस्तानद ने : इश्क़न से तबीअत ने ज़ीस्तं का मज़ा पाया, दर्द की दवा पाई, दर्द बेदवा पाया। इस बे-ऋतु के प्रेम ने मुझे अकारण प्रेम के मार्ग पर कुछ ऐसा उतार दिया कि आज तक मैं मन के मचलने से नहीं — न जाने क्यों — किसी को प्या्र करता हूँ। बक़ौल : दिल चाहेगा जिसको उसे चाहा न करेंगे, हम इश्क़ो हविस को कभी इक जा न करेंगे। मैं महसूस कर रहा हूँ — डूबकर निकलने वाले दोस्तह पूछना चाहते हैं कि साठ के हो गए आज तक जनाब दिल फेंक ही हैं? जी हाँ।

मैं बरसों से उम्र क्योंह गिनूँ? जीवन की गति से क्यों न जाँचूँ? अभी मेरी भाँवरें नहीं पड़ीं। विवाह नहीं, सगाई नहीं। उस बाराबंकी वाली से दिल लगने के बाद मैं बराबर कुआँरा ही रहा हूँ। लानत है साधारण गिनती पर! जोड़, बाक़ी, गुणा मेरे भाग में भगवान् की दया से कभी नहीं रहे। मैथमेटिक्सग में मैं इतना मन्दी कि साठ का हो जाने पर भी गधापचीसी के आगे जीवन जोड़ने की तमीज़ बिलकुल नहीं। आदमी के चेहरे की यह मूँछ-दाढ़ी, मेरे मते, व्यतक्ति की बंजरता विदित करने वाले कुशकास हैं। ख़ास-ख़ास देवताओं की मूर्तियों में उनकी वय किशोर और युवा ही क्योंस बतलाई जाती है? इसीलिए कि परम भागवत-तत्त्व व्यैक्ति में तभी तक रहता है जब तक मूँछ-दाढ़ी नहीं रहती। मर्यादा-पुरुषोत्तम होने पर भी राम या भगवान् स्ववयं कृष्ण की मूँछे और दाढ़ी किसी ने देखी हैं? इतने विकट भयंकर-प्रलयंकर होने पर भी शंकर के विग्रहों में दाढ़ी-मूँछ कहाँ होती है? क्यों? इसका अर्थ यही है कि कोई कृष्ण की तरह अमृत रस करने वाला हो या शंकर की तरह प्रलयंकर ताण्डव सृष्टि और नाश, दोनों ही आदमी के हाथ में तभी तक रहते हैं जब तक उसे मूँछ-दाढ़ी की दिक्क़कत दरपेश नहीं आती। यह मूँछ-दाढ़ी मूढ़ मानव के बाहर तो बाहर, अन्दर भी निकलती है। इनमें अन्दरवाली को आदमी सावधानी से साफ़ करता रहे तो बाहरवाली उतनी भयावनी नहीं साबित होती।

 

भानुप्रताप तिवारी

बचपन में मेरे मुहल्‍ले में दो हस्तियाँ ऐसी थीं जिनका कमोबेश प्रभाव मुझ पर सारे जीवन रहा। उनमें एक थे भानुप्रताप तिवारी (जब मैं सात बरस का था, वह साठ के रहे होंगे), दूसरे महादेव मिश्र उर्फ बच्‍चा महाराज, जो उन दिनों चालीस के भीतर की उम्र के रहे होंगे। भानुप्रताप तिवारी कि अच्‍छे-अच्‍छे दो-दो मकान, पर वह स्‍वयं मुख्‍य मकान के द्वार-देश की संडास के सामने की अंध-अँधेरी, सीलन-भरी बदबूदार कोठरी में रहा करते थे। पहनते थे गाढ़े के चारख़ाने का लम्‍बा रुईदार कोट और पुराने ढंग का पाजामा — रुईदार ही। भानुप्रताप तिवारी के ब्रह्माण्‍ड या बीच खोपड़ी में कोई ऐसा व्रण हो गया था जिसके सबब अधेड़ अवस्‍था ही में वह सहज, सामाजिक जीवन के अयोग्‍य हो गए थे। रोग असाध्‍य था, कर्म-भोग दारुण; फिर भी, तिवारीजी सारे जीवन-दर्प से डटे हुए मरण से लोहा लेते रहे। कुछ नहीं तो तीस-चालीस बरस उन्‍होंने उसी बदबूदार अँधेरी कोठरी में काटे। उस घोर दु:ख को बड़ी ही शान से वह झुठलाते रहे। मस्तिष्‍क में व्रण होने के बावजूद पण्डित भानुप्रताप तिवारी अँधेरी कोठरी में, खाट पर रज़ाई ओढ़े तीस-चालीस बरस तक या तो उत्तम, गम्‍भीर ग्रन्‍थों का अध्‍ययन किया करते थे अथवा किसी सद्ग्रन्‍थ का अनुवाद, भाष्य, समीक्षा आदि। कहते हैं सिर में घाव पैदा होने के काफ़ी पहले से उन्‍हें लिखने-पढ़ने का शौक़ था। मिर्ज़ापुरी बोली में उन्‍होंने तुलसीकृत रामायण की एक टीका भी तभी शुरू कर रखी थी। भानुप्रतापजी ने रामायण की अपनी टीका में रघुनन्‍दन राम को तुलसीदास की तरह परब्रह्म स्‍वरूप नहीं स्‍वीकारा था। दुख या लोअर लाइन्‍स के अंग्रेज़ों की संगत से मुहल्‍ले के ब्राह्मणों की दृष्टि में भानुप्रतापजी नास्तिक बन चुके थे। रामायण की उस टीका में अनेक अवसरों पर उन्‍होंने ऋषि-मुनियों की खिल्‍ली भी ख़ूब उड़ाई थी। कहते हैं, चुनार में एक बार कोई सन्‍त अयोध्‍यावासी आए और संयोग से भानुप्रताप तिवारी तक उनकी रसोई हो गई। तिवारीजी महात्‍मा को, छेड़छाड़ की अदा में, निजकृत तुलसीकृत रामायण की टीका सुनाने लगे। उसमें, बालकांड में, मिथिला की महिलाओं ने ब्रह्मर्षि विश्‍वामित्र को इसलिए भला-बुरा कहा था कि उनकी दृष्टि में चक्रवर्ती दशरथ के राजमहल के सुखों से छुड़ा जंगल-जंगल बहकाकर किशोर कुमार राम-लक्ष्‍मण के साथ उन्‍होंने क्रूरता दिखलाई थी। ऋषि विश्‍वामित्र के प्रति भानुप्रतापजी की छिछली भावना भाँपते ही वह अवधवासी महात्‍मा मारे रोष के स्‍वयमेव क्रोधी कौशिक बन उठे— ‘चपल चाण्‍डाल!’ उन्‍होंने शाप दिया था— ‘इस टीका की समाप्ति के पूर्व ही तेरी टीका विदीर्ण हो जाएगी।’ और वह महात्‍मा वहाँ से अविलम्‍ब चलते बने। और अनतिदूर भविष्‍य में ही भानुप्रतापजी की खोपड़ी के मध्‍य में वह घाव अनायास ही प्रकट होने, बढ़ने, रिसने, जि़न्‍दगी हराम करने लग पड़ा था।

तिवारीजी के पिता सरकारी नौकरी में नाज़िर थे। उनका तहसील चुनार में आदर-मान था। स्‍वयं भानुप्रताप भी चुनार के किले में कोई अधिकारी थे। अवश्‍य ही उन्‍हें आरम्‍भ ही से लिखने-पढ़ने का व्‍यसन रहा होगा। वह अरबी, फ़ारसी, उर्दू, अंग्रेजी, ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली के मर्मी ज्ञाता थे। जब बनारस में ‘भारतेन्‍दु’ हरिश्‍चन्‍द्र थे, तभी चुनार में भानुप्रताप तिवारी जवानी पर रहे होंगे। तिवारीजी के दोनों घरों में कुछ नहीं तो दस हज़ार जिल्‍द पुस्‍तकें विविध भाषाओं की, बहुमूल्‍य एवं अमूल्‍य, संग्रहीत रही होंगी। उनकी अंध-अँधेरी कोठरी में तो चारों ओर किताबों से भरी आलमारियाँ और रैकें ठसी थीं। उनकी लिखी एकाधिक छोटी-छोटी किताबें बीसवीं सदी के आरम्‍भ के पहले ही छप चुकी थीं, स्‍वान्‍त: सुखाय, अमूल्‍य-वितरणार्थ। उनमें एक पुस्‍तक चुनार पर थी। चुनार का संक्षिप्‍त इतिहास और समसामयिक नागरिक कुलों का परिचय। उस पुस्‍तक में भानुप्रतापजी ने मेरे ख़ानदान की चर्चा भी कुछ तो उसकी विचित्रता के कारण और कुछ इसलिए की है कि वह हमारे यजमान थे। भानुप्रतापजी के हम पुरोहित थे। उसी पुस्‍तक में तिवारीजी ने मेरे एक प्रपितामह का वर्णन किया है, जो पढ़े-लिखे मुतलक नहीं थे, फिर भी प्रसिद्ध-सिद्ध थे। हमारी कुल-देवी भगवती दुर्गा दुर्ग-विनाशनी सुदर्शन पाँडे—यही उनका नाम था—पर रीझ गई थीं। सो, मेरे प्रपितामह के संकेत-मात्र से राजद्वार का भैंसा शास्‍त्रार्थ करने काबिल हो जाता था। सिद्ध सुदर्शन पाँडे अपने घर की टूटी चारदीवारी पर बैठे दातुन कर रहे थे कि किसी ने सुनाया कि कोई भारी सिद्ध उनसे मिलने को सिंह पर सवार, हाथ में सर्प का चाबुक लिये आ रहा है। सुनते ही सुदर्शन पाँडे ने टूटी चारदीवारी को एड़ लगाई— ‘चल तो। महात्‍मा का इस्‍तक़बाल आगे बढ़कर करें।’ और चारदीवारी उन्‍हें लेकर चल ही तो पड़ी। मेरे परदादा का प्रतापी चमत्‍कार देख वह सिंह-सवार सिद्ध उनके चरणों में लोटने लगा था।

वही अनपढ़ सिद्ध सुदर्शन पाँडे एक दिन स्‍नान-सन्‍ध्‍या के बाद घुटनों तक गंगा में खड़े सूर्य को अर्घ्‍य दे रहे थे कि बीच धारा से तत्‍कालीन काशीराज का राजबजड़ा गुजरा। अमित तेजस्‍वी ब्राह्मण पर नज़र पड़ते ही राजा ने जलयान-चालकों को उधर ही चलने का इशारा किया। राजा के निकट कोई ऐसा भी था जो सिद्ध सुदर्शन पाँडे से भली भाँति परिचित था। उसने देखते ही काशिराज को बतलाया कि वह तेजस्‍वी ब्राह्मण है कौन। दुनिया की नज़रों में महामूर्ख, मगर भगवती का भारी साधक—सिद्ध। सुदर्शन पाँडे के निकट जा राजा ने पूछा— ‘महाराज, गंगा-गर्भ में क्‍या-क्‍या चीज़ें हो सकती हैं?’

‘गंगा-गर्भ में?’ चमत्‍कारी सुदर्शन ने सुनाया — ‘गंगा-गर्भ में ख़रगोश का बच्‍चा होता है। और क्‍या?’ ख़रगोश का बच्‍चा? गंगा के अंदर? राजा बनारस को ऐसा लगा गोया ब्राह्मण ने उनका उपहास किया अनुचित असम्‍भव उत्तर देकर। राजा के नथने ईषत् फूले, भवें तनीं, होंठ असन्‍तुष्‍ट फड़के: ‘महाजाल डाला जाए गंगा में और जाँचा जाए कि क्‍या पानी के अन्‍दर ख़रगोश का बच्‍चा भी बसता है? एक बार जाल डाला जाए, दो बार, तीसरी बार भी अगर ख़रगोश के बच्‍चे का सूराग़ न लगे तो राज-अपमान के लिए धृष्‍ट ब्राह्मण का मैं शासन करना चाहूँगा।’ सो, महाजाल डाला गया— एक बार, दो बार। लो, तीसरी बार जंगी जाल में फँसा सुंदर ख़रगोश का बच्‍चा! राजा ने स्‍तम्भित हो दाँतो अँगुली दाबी और सुदर्शन पाँडे को एक सौ आठ बीघे ज़मीन, जिसमें चार कुएँ और दो आम की बगियाँ, उसी समय दान में दी। इस घटना के बाद सुदर्शनजी जब घर लौट रहे थे तो राह के जंगल में एकाएक किसी ने तेज़ चाँटा उनके गाल पर जड़ा। ‘मूर्ख कहीं के! देख तो मेरी चूँदरी चिन्‍दी-चिन्‍दी हो गई कटीली झाडि़यों में ख़रगोश का बच्‍चा ढूँढ़ते-ढूँढ़ते।’ चकित सुदर्शन ने देखा, सामने चिथी चूँदरी पहने खड़ी कुमारी के रूप में स्‍वयं जगज्‍जननी वात्‍सल्‍यमयी सर्वकल्‍याणी सर्वमंगला को!

यह सच भी है, जिसका इशारा भानुप्रतापजी की पुस्‍तक में भी है कि मेरे खानदान के लोग हरसू (पाँडे) नामक ब्रह्म के वंश के हैं, जिनका परम प्रसिद्ध स्‍थान उत्तर प्रदेश-बिहार की सीमा पर स्थित चैनपुर में है। इन्‍हीं हरसू ब्रह्म को स्‍वर्गीय परम विद्वान डॉ. रामदास गौड़ आदर से मानते थे। इन हरसू ब्रह्म की तो सोलह-पेजी जीवनी छपकर भक्‍त जनता में सहस्र-सहस्र की संख्‍या में बिकती है। कैसी जीवनी! मेरे विख्‍यात पितामह हरसू पाँडे जिस राजा के राजपुरोहित या गुरु थे, एक बार उसने नई-नई कोई शादी की। रात को जब वह चौमंज़िले के रनिवास में गया, विलास का अवसर आया, तब अचानक नई रानी की नज़र सामने मगर दूर से आते प्रकाश पर पड़ी, जो राजभवन के बराबर ही किसी महल के चौमं‍ज़िले की खिड़की से आ रहा था!

‘यह किसकी खिड़की है मेरे कक्ष के सामने?’ ज़रा रोष में रानी राजा को और भी रमणीय मालूम पड़ी। ‘यह प्रकाश मेरे कुल-गुरु हरसूजी के निवास की‍ खिड़की से आ रहा है।’

‘राज-भवन के बराबर महज़़ ब्राह्मण का भवन! छि:!’

‘मगर?’

‘क्‍या अगर? क्‍या मगर…?’

‘वह परम सिद्ध पुरुष—हरसू पाँडेजी—हमारे पुरोहित, पिता से बढ़कर हैं।’

‘पिता से बढ़कर कोई परम पिता हो, परन्‍तु शयनकक्ष के सामने किसी की भी खिड़की-दरवाज़ा मुझे नापसन्‍द है। सामने वाले घर का एक खण्‍ड पहले गिराया जाए, फिर आप राजा, फिर मैं रानी…।’

‘स्‍त्री…!’

रानी के बिगड़े दिल पर राजा के मुख से ‘स्‍त्री’ शब्‍द, हीन-भाव से निकलते ही साँप-सा लोट गया। वह फूल-सेज से सर्पिणी-सी सरककर कक्ष के बाहर जाने लगी — ‘आप मेरे प्राण ले सकते हैं — राजा हैं, मैं अबला हूँ, पर मुझे अपने मन के खिलाफ़ आचरण करने पर विवश नहीं कर सकते। मैं बाज़ार से ख़रीदकर नहीं लाई गई हूँ— पाणिगृहीता, कुलीना, राज्‍य-कन्‍या हूँ। अभी मेरे पिता जीवित और समर्थ हैं।’

कहते हैं कई दिन तक रूपवती यौवनगर्विता रानी ने हठ नहीं छोड़ा। तब, विवश हो, काम-मोहित राजा ने पुरोहित हरसू पाँडे से पूछा कि रानी को प्रसन्‍न करने के लिए यदि वह अपने भवन का एक खण्‍ड गिरा दें तो कोई बड़ी हानि होगी क्‍या?

‘हानि?’ तेजस्‍वी हरसू पाँडे ने दुहराया— ‘कामिनी का आग्रह रहे, गुरु की मर्यादा चूल्‍हे-भाड़ में जाए—इसमें कोई हानि ही नहीं? मैं कहता हूँ औरत के मोह से जिस राजा की मति मलीन हुई उसके नाश में अधिक देर नहीं लगती।’ राजा स्‍तब्‍ध, सुन्‍न, चुप रहा। प्रचण्‍ड पुरोहित के आगे विशेष बोलने की उसकी हिम्‍मत न हुई। हरसू पाँडे का सारे राज्‍य में दिव्‍य ब्राह्मण होने के कारण बड़ा मान था। उनके दर्शनों में बरकत मानी जाती थी। बचपन ही से राजा के मन में हरसूजी के प्रति श्रद्धा थी। लेकिन नई रानी, कल की आई। उसे तो अपनी सौतों को यह दिखलाना था कि राजा पर उसी का एकाधिकार है। सो, दिनों तक खींचातानी चलती रही। न रानी ने स्‍त्री-हठ छोड़ा, न हरसू पाँडे को ही अपना मान मर्दित कराना मंजूर हुआ और न राजा ही की हिम्‍मत पड़ी कि रानी के लिए पुरोहित-भवन का एक खण्‍ड बलात् गिरवा दे। लेकिन एक दिन जो न होना था वही हुआ और राजा ने पुरोहित-भवन का एक खण्‍ड बलात् गिरवा दिया। इसको अपमान मान राजपुरोहित हरसू पाँडे ने राज-द्वार पर आमरण अनशन ठान दिया था। अनशन के इक्‍कीसवें दिन हरसू पाँडे के प्राण जाते रहे थे। प्राण त्‍यागने के थोड़ा ही पहले राजा की पहली रानी की कन्‍या के हाथों कटोरा भर दूध ग्रहण करते हुए हरसूजी ने राजपुत्री को आशीर्वाद दिया था ‘जा, केवल तेरा वंश बचेगा।’ विख्‍यात है कि हरसू पाँडे मरने के बाद प्रचण्‍ड ब्रह्म-प्रेत हो गए। साथ ही, सहसा, पड़ोसी राजा ने उस राजा पर चढ़ाई कर दी। उसको पराजित कर, सारा राजपाट, ठाठ-बाट विध्‍वस्‍त, अग्निसात् कर दिया था। उसी ध्‍वंसावशेष के बीच में हरसू ब्रह्म की भारत-प्रसिद्ध समाधि है। हरसू ब्रह्म बिहार और उत्त्‍र प्रदेश के अनेक भागों में देवताओं से भी अधिक पुजते हैं। बुरा-से-बुरा भूत-प्रेत-बाधिक व्‍यक्ति हरसू ब्रह्म जाकर चंगा हो जाता है। हरसू ब्रह्म के मेले में सारे देश से प्रेत-बाधित प्राणी—प्राय: स्त्रियाँ—हर साल आते हैं। वीरान-उजाड़ में पचासों हज़ार आदमियों की भीड़ लगती है; लाखों का व्‍यापार-धंधा होता है; दसों हज़ार रुपए वहाँ के पण्‍डे प्राप्‍त करते हैं। ऊपर से माल-मलाई, रेशम, कम्‍बल, रज़ाई भी। मैं पाण्‍डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ हरसू ब्रह्म के कुल का हूँ — निस्‍संदेह। विदित विद्वान, प्रेत-पंडित रामदासजी गौड़ ने लिखा है कि हरसू ब्रह्म के यज्ञोपवीत संस्‍कार में गोस्‍वामी तुलसीदासजी शामिल हुए थे।

लेकिन ब्रह्म या प्रेतात्‍मा अथवा भूतों के अस्तित्‍व पर मेरा विश्‍वास ज़रा भी नहीं। संसार का सबसे भयानक भूत मैं पंचभौतिक आदमी को मानता हूँ। मैंने भयानक-से-भयानक भवन, सन्‍नाटे-से-सन्‍नाटे मैदान, ऊजड़-वीरान में भी ढूँढ़ने पर जब एक भी भूत, भूतनी या भूतनी-कुमार को नहीं पाया, तब भूतों पर से मेरी आस्‍था भले ही न उठ गई हो, पर यह विश्‍वास दृढ़ हो गया है कि आदमी से भयभीत हो भूत भी भागा-भागा फिरता है।

पर, मैं भानुप्रताप तिवारी की चर्चा कर रहा था। तिवारीजी जिस कोठरी में रहा करते थे उसके पूरबी द्वार के सामने ही बड़ा भारी पीपल का पेड़ था। चिलकती दुपहरी या चमकती चाँदनी में पीपल के पेड़ के निकट खड़े-खड़े पेशाब करते हुए भानुप्रताप तिवारी पूरे प्रेत मालूम पड़ते थे — हड्डीले, रक्‍तरहित, उजले—धँसी आँखें, चेहरे पर सारी दृष्टि के श्‍मशानी-शाप। मैले चारख़ाने का रुईदार पायजामा और उसी रंग का लम्‍बा दगला रुईदार। बहुत लड़कपन में मैं तो तिवारीजी के सामने तक जाने से डरता था और यदि उस गली से गुज़रना ही होता, तो जहाँ तक उनका मकान था उतनी गली मैं भयभीत दौड़ता पार करता था। लेकिन जब भी उनकी कोठरी में नज़र जाती वहाँ कोई साहब अंग्रेज़ बैठा होता, या मेमसाहब गोरी होती, या बंगाली मोशाई होते। तहसील के अधिकारी या ईसाई मिशनरी या साधु या फ़कीर। और भानुप्रताप तिवारी उसी ड्रेस में खाट पर अध-पड़े फर्राटी इंग्लिश या हिन्‍दुस्‍तानी गड़गड़़ाती आवाज़ में बोलते होते। भानुप्रताप तिवारी जब तक जीवित रहे, चुनार में विश्‍वकोश माने जाते थे। कबीर, दादू, दरिया, मलूकदास, रैदास आदि अ-ब्राह्मण सन्‍तों के प्रति उनका अनुराग-विशेष था। इनकी रचनाओं की उन्‍होंने टीकाएँ तथा समीक्षाएँ लिखीं। तुलसी की रामायण पर भी जिल्‍द-की-जिल्‍द, रजिस्‍टर-के-रजिस्‍टर भरे। एक-दो नहीं, पचासों पुस्‍तकें उन्‍होंने स्‍वान्‍त:सुखाय, चिद्विलास के लिए लिखीं। आगन्‍तुक विद्वानों से उन्‍हीं विषयों पर तिवारीजी चतुर चर्चाएँ चलाया करते थे। मैं काफी बड़ा होने पर स्‍कूल में दाख़िल हुआ। चौदह साल की उम्र में नेहरू जवाहरलाल लन्‍दन में शिक्षा पाते थे, लेकिन बेचन पाँडे का नाम चौदह साल की उम्र में चुनार के चर्चमिशन स्‍कूल में, थर्ड क्‍लास में लिखा गया। तब मुझे पुरोहित-वंश का जानकर—या क्‍यों— भानुप्रतापजी ने मुंशी मथुराप्रसाद-रचित त्रिलिंगुअल डिक्‍शनरी दी थी। वह आज भी मेरे घर की पुस्‍तकों में हो तो ताज्‍जुब नहीं। तिवारीजी की दो-दो ब्‍याहता बेटियाँ थीं—मैना और गिरजा। एकमात्र पुत्र था रामगुलाम तिवारी, जिसका पुकारने का नाम ‘मलुक्‍की’ था। मिडिल पास रामगुलाम तिवारी तहसीली रजिस्‍ट्रार का क्‍लर्क था। रामगुलाम तिवारी विवाहित था। भानुप्रतापजी की पत्‍नी तगड़ी, मालकिन-मुखी, निहायत नेक-दिल थीं। लेकिन मारे दुलार के उन्‍होंने अपने पुत्र रामगुलाम तिवारी को बरबाद कर डाला था। मारे मोह के वह माता अपने बिगड़े बेटे को दारू पीने और जुआ तक खेलने के लिए रुपए ही नहीं देती थी बल्कि दूसरे के घर में जाकर पूत संकट में न पड़े, अतएव अपने दूसरे घर में जुए की फड़ लगाने देती थी। उस दूसरे घर में मलुक्‍की कुछ भी करता था। इस लड़के को लेकर भानुप्रताप और उनकी पत्‍नी में प्राय: विवाद होता। भानुप्रताप शासन करना चाहते (असाध्‍य रोग-पी‍ड़ित खाट पकड़े प्राणी) पर पत्‍नी के आगे उनकी एक न चलती—सिवाय ज़बान के। और तिवारीजी सारी ज़िन्‍दगी अपनी पत्‍नी को धारावाहिक भाषा में गालियाँ सुनाते रहे। रामगुलाम तिवारी भानुप्रताप के सामने ही पहली बार जुए में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन भानुप्रताप के प्रभाव से तहसील के नेक-दिल अधिकारियों ने उसे बचा दिया था। इसके बाद भानुप्रतापजी का देहान्‍त हुआ और रामगुलाम तिवारी सरकारी रुपयों से जुआ खेलने के बाद अमानत में ख़यानत, ग़बन में गिरफ़्तार हुआ। मुक़दमा बरसों चलता रहा। दरमियान में रामगुलाम की पत्‍नी मर गई। पुलिस को बेटे की कुशल के लिए रिश्‍वत देती-देती मोहमयी माता मालकिन से भिखारिन बन गई, फिर भी, इस भ्रम में कि उसके पास छिपा धन है, एक पुलिस-अधिकारी ने उस बेचारी को वो-वो गालियाँ सुनाईं, ऐसी-ऐसी कमीनी धमकियाँ दीं कि सारा मुहल्‍ला त्रस्‍त हो उठा। अन्‍त में जिस बेटे के मोह में वह माता मर मिटी उसको दो वर्ष की सख्‍़त सज़ा हो गई। इसी बीच में भानुप्रताप तिवारी का सारा बहुमूल्‍य पुस्‍तकालय, उनकी लिखी पाण्‍डुलिपियाँ बेचकर मलुक्‍की ने जुआ खेल लिया था। उसके जेल जाते ही वह मोहमयी माता मर ही गई। ऐसे भयानक दुख से विदीर्ण होकर भानुप्रताप का मकान भी ‘भहरा’ पड़ा, जिसकी एक-एक ईंट या ढोंका दुनियादार पड़ोसी चुन ले गए।

अन्‍त में जुआड़ी कुलांगार रामगुलाम तिवारी का पुत्र बच रहा था — नंदन — तेरह-चौदह साल का; जो दिन में सज्‍जन पड़ोसियों के यहाँ पशुवत परिश्रम करने और रात में दुष्‍टों के साथ कुकर्म करने पर टुकड़े पाता था। देखते-ही-देखते भानुप्रताप तिवारी के वंश का ऐसा हाल हुआ कि : जिनके महलों में हज़ारों रंग के फ़ानूस थे, झाड़ उनकी क़ब्र पर है और निशाँ कुछ भी नहीं!

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