रसिया बालम – जयशंकर प्रसाद | हिंदी कहानी | राजस्थानी लोक-कथा
'रसिया बालम' जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित हिन्दी कहानी है, जिसका कथानक राजस्थान के सिरोही जिले में प्रचलित एक लोककथा पर आधारित है।
'रसिया बालम' जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित हिन्दी कहानी है, जिसका कथानक राजस्थान के सिरोही जिले में प्रचलित एक लोककथा पर आधारित है।
“आज सात दिन हो गए, पीने को कौन कहे? छुआ तक नहीं! आज सातवाँ दिन है, सरकार! ” “तुम झूठे हो। अभी तो तुम्हारे कपड़े से महक आ रही है।”
ओ मस्तक विराट, अभी नहीं मुकुट और अलंकार। अभी नहीं तिलक और राज्यभार। तेजस्वी चिन्तित ललाट। दो मुझको सदियों तपस्याओं में जी सकने की क्षमता।
खेलन सिखए अलि भलैं चतुर अहेरी मार। कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार अर्थात ऐ सखी! चतुर शिकारी कामदेव ने कानों तक आने-जानेवाले
मेरी भव-बाधा हरौ राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँईं परैं स्यामु हरित दुति होइ॥1॥ अर्थात वही चतुरी राधिका मेरी सांसारिक बाधाएँ...
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।। तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई
हतभाग्य हिंदू जाति! तेरा पूर्वदर्शन है कहाँ? वह शील, शुद्धाचार, वैभव देख, अब क्या है यहाँ;
उन अग्रजन्मा ब्राह्मणों की हीनता तो देख लो, भू-देव थे जो आज उनकी दीनता तो देख लो।
साहित्य का विस्तार अब भी है हमारा कम नहीं; प्राचीन किंतु नवीनता में अन्य उसके सम नहीं।